Saturday, August 15, 2020 10:58 PM

राजनीति के चाबुक से घायल पुलिस का जमीर : राजेंद्र मोहन शर्मा, सेवानिवृत्त डीआईजी

राजेंद्र मोहन शर्मा

सेवानिवृत्त डीआईजी

हाल ही में उत्तर प्रदेश में विकास दुबे गैंगस्टर द्वारा आठ पुलिस कर्मियों की हत्या कर दी गई तथा उसका राजनीतिक व पुलिस संपर्क इतना मजबूत था कि उसके विरुद्ध 71 आपराधिक मामले दर्ज होने के बावजूद वह हिस्ट्री शीटर नहीं था। इससे स्पष्ट होता है कि विकास दुबे को राजनीतिक व पुलिस दोनों का संरक्षण प्राप्त था तथा निश्चित तौर पर पुलिस की कारगुजारी पर प्रश्नचिन्ह लगता दिखाई देता है। पुलिस को राजनीतिक आकाओं के इशारों पर काम करना रोकना होगा तथा अपने जमीर को जागृत करना होगा…

समाज में उच्चकोटी का आदर्श एवं छवि बनाए रखने के लिए उच्चतम अनुशासन, कुशल नेतृत्व, कर्त्तव्यनिष्ठा एवं नैतिक बल की आवश्यकता रहती है। सरकार एक ऐसी राजनीतिक संस्था है जो अपने सत्ता व संगठन को चलाने के लिए विभिन्न विभागों की जिम्मेदारी तय करती है तथा ऐसे में कई बार अपनी सत्ता का दुरुपयोग भी करती रहती है। जहां तक पुलिस के दुरुपयोग की बात है तो देखा जाता है कि बिना किसी विशेष कारण से पुलिस गनमैन के रूप में तैनात करना व अनावश्यक रूप से पुलिस कार्यप्रणाली में अपने क्षेत्रों में तैनात करवाना या फिर विपक्षी पार्टी के लोगों को नाजायज तंग करवाना आदि यह सब कुछ देखने को मिलता है। सत्ताधारी लोग ऐसे पुलिसवालों की तलाश में रहते हैं जो उनकी अंगुलियों पर नाच सकें तथा बहुत से पुलिस कर्मी अपना जमीर बेचकर उनके आगे नतमस्तक होते रहते हैं तथा उनसे अमर रहने का आशीर्वाद लेते रहते हैं। इसका सीधा प्रभाव अधीनस्थ छोटे कर्मचारियों पर आवश्यक रूप से पड़ता है तथा वे अपने अधिकारी की प्रत्येक कानूनी व गैर कानूनी बात को मानकर अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करने लग पड़ते हैं। ऐसे में वे अपने पद की गरिमा को तिलांजलि देकर अपने नैतिक मूल्यों से समझौता कर अपने द्वारा ट्रेनिंग में ली गई समाज सेवा की शपथ पर ग्रहण लगा देते हैं तथा अपनी वर्दी को दागदार बना बैठते हैं। सत्ताधारी लोग अधिकारी व कर्मचारियों को फुटबाल खेल की तरह दो पक्ष व विपक्ष वाली टीमों में बांट देते हैं तथा अपनी-अपनी बारी में एक-दूसरे पर गोल करवाते रहते हैं तथा खुद स्टेडियम में वीआईपी की कुर्सियों में बैठकर मैच का लुत्फ  उठाते रहते हैं। जो कर्मी अपने नैतिक मूल्यों पर चलकर अपने जमीर को बनाए रखते हैं, उन्हें इन नेताओं के कोप का भाजन बनना पड़ता है। मगर शायद ऐसे ही कुछ चुनिंदा कर्मियों से ही न्याय की उम्मीद बनी रहती है जो वास्तव में पीडि़त व्यक्ति की सहायता करते हैं व उन्हें न्याय दिलवाते हैं। पुलिस प्रशिक्षण केंद्रों से प्रशिक्षित होकर निकले हुए अधिकारियों को एक निष्ठावान, ईमानदार, निष्पक्ष व बलिष्ठ अधिकारी बनकर इस शपथ के साथ तैयार करके भेजा जाता है कि वे किसी भी भेदभाव को नकार कर अपने निष्काम व मजबूत इरादों के साथ अपनी सेवाएं प्रदान करेंगे तथा समाज में पनपते हुए हर अपराध पर शिकंजा कसने की कोशिश करेंगे। आमतौर पर यह भी देखा गया है कि प्रशिक्षकों के सधे हाथों से मिले प्रशिक्षण का प्रभाव आरंभिक कुछ वर्षों तक तो आवश्यक रहता है, मगर कुछ ही वर्षों मे यह अधिकारी किसी न किसी विशेष कमी का शिकार होकर अपने अर्जित मूल्यों से समझौता करने के लिए मजबूर हो जाते हैं तथा जमीन से नाता तोड़ कर पतंग की तरह उड़ना शुरू कर देते हैं जिसकी डोर राजनीतिज्ञों के हाथ में थमा देते हैं तथा राजनीतिज्ञ उनकी पतंग की डोर मनमाने ढंग से खींचते रहते हैं तथा इन अधिकारियों के जमीर पर बट्टा लगना शुरू हो जाता है। आखिर ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि हर अधिकारी, कर्मचारी चाहता है कि वह अपने परिवार के साथ रहे या फिर उसकी तैनानी वहां हो, जहां से उसका आना-जाना आसान हो या फिर उसकी बीवी उसी के कार्यरत स्थान पर तैनात हो। ऐसे में इन अधिकारियों की हिम्मत नहीं होती कि वे राजनीतिक आकाओं की किसी अवांछित बात को अस्वीकार कर सकें। अपने स्वार्थ के लिए उन्हें किसी अधीनस्थ कर्मचारी को बलि का बकरा भी बनना पड़े तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि किसी कर्मचारी ने किसी राजनेता के चहेते का चालान कर दिया या उसकी इच्छानुसार काम नहीं किया तो उसे तुरंत पुलिस लाइन हाजिर कर दिया जाता है, जबकि होना तो यह चाहिए था कि उस घटना की निष्पक्ष जांच करवा ली जाती, मगर आकाओं को खुश करने के लिए संबंधित कर्मी को खीरे की तरह काट दिया जाता है। ऐसे में ऐसे कर्मचारी या तो नतमस्तक होकर अपने अधिकारियों की हर अच्छी या बुरी बात को स्वीकार करना शुरू कर देते हैं या फिर मानसिक तनावों का शिकार हो जाते हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश में विकास दुबे गैंगस्टर द्वारा आठ पुलिस कर्मियों की हत्या कर दी गई तथा उसका राजनीतिक व पुलिस संपर्क इतना मजबूत था कि उसके विरुद्ध 71 आपराधिक मामले दर्ज होने के बावजूद वह हिस्ट्री शीटर नहीं था। इससे स्पष्ट होता है कि विकास दुबे को राजनीतिक व पुलिस दोनों का संरक्षण प्राप्त था तथा निश्चित तौर पर पुलिस की कारगुजारी पर प्रश्नचिन्ह लगता दिखाई देता है। पुलिस को राजनीतिक आकाओं के इशारों पर काम करना रोकना होगा तथा अपने जमीर को जागृत करना होगा। जमीर के अनुशासन रूपी चाबुक से उसे अपनी प्रतिभा, क्षमता, चरित्र को इस तरह गढ़ना होगा जिससे राष्ट्रीय एवं वैश्विक चुनौतियों का कारगर हल ढूंढा जा सके।

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