राजनेताओं पर भारी पड़ती नौकरशाही, राजेंद्र मोहन शर्मा, सेवानिवृत्त डीआईजी

जब यह दोनों आपस में घुल-मिल जाते हैं तो फिर एक- दूसरे के काले कारनामों में मददगार हो जाते हैं। नेता लोग अपनी राजनीति में व्यस्त रहकर अपना जीवन पूरे रौब-ठौब व शानोशौकत से जीते हैं। उनका मुख्य कार्य विरोधी पक्ष के लोगों को तंग करवाना या फिर उन्हें अनचाहे स्थानों पर स्थानांतरित करने तक ही सीमित रहता है तथा सरकार का अन्य सारा कार्य अफसरशाहों पर ही छोड़ दिया जाता है। इसी तरह चुनावों के दिनों में जनता से कई लुभावने वायदे करते रहते हैं। इन वायदों को पूरा करने के लिए नौकरशाह ही कोई न कोई तरीका निकालते हैं…

राजनीतिक व्यवस्था का स्वरूप चाहे लोकतंत्रात्मक हो अथवा तानाशाही या पूंजीवाद वाला हो, सरकार की नीतियों को कार्यरूप देने का कार्य अफसरशाही द्वारा ही किया जाता है। भारत जैसे विकासशील देश जहां के अधिकतर लोग लिखना-पढ़ना भी नहीं जानते, में राजनीति का नेतृत्व एवं विधायिका का स्वरूप प्रशासन की बारीकियों व जटिलताओं से अनभिज्ञ रहता है तथा नौकरशाही ही शक्तिशाली बनी रहती है। हमारे देश में राजनीतिज्ञों की न कोई न्यूनतम योग्यता और न ही कोई आयु सीमा रखी गई है तथा कोई भी व्यक्ति चाहे आपराधिक पृष्ठभूमि वाला क्यों न हो, मंत्री बन कर देश-प्रदेश में हुक्म चला सकता है। राबड़ी देवी जो कि मुश्किल से मिडल क्लास पढ़ी होंगी, बिहार जैसे बड़े प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं। इसी तरह शिबू सोरेन जैसे क्रिमिनल रिकार्ड वाले व्यक्ति केंद्र में मंत्री व झारखंड राज्य के तीन बार मुख्यमंत्री रहे तथा यदि देश-प्रदेश की बागडोर ऐसे व्यक्तियों के पास आ जाए तो अफसरशाही का राजनीतिज्ञों पर हावी होना स्वाभाविक है। जब ऐसे जनप्रतिनिधि जो अक्षम, असमर्थ व अल्पज्ञानी होंगे, तब वे अपने कार्यों को चलाने के लिए नौकरशाही से उचित व अनुचित कार्य करवाने के लिए मजबूर हो जाते हैं तथा उनके साथ सांठ- गांठ करके अपना स्वार्थ भी उठाते रहते हैं। ऐसे नेताओं को राजनीतिक व व्यक्तिगत लाभ पहुंचाने के बदले में नौकरशाह, मलाईदार पद प्राप्त करते रहते हैं तथा नेताओं के भ्रष्टाचार मामलों में न केवल लीपापोती होती रहती है बल्कि वे खुद भी कई प्रकार के अवांछित व भ्रष्ट कार्य करते रहते हैं तथा इनका यह मक्कड़जाल देश के लोकतंत्र को घुन की तरह चाटता रहता है।

जब ये दोनों आपस में घुल-मिल जाते हैं तो फिर एक- दूसरे के काले कारनामों में मददगार हो जाते हैं। नेता लोग अपनी राजनीति में व्यस्त रहकर अपना जीवन पूरे रौब-ठौब व शान-औ-शौकत से जीते हैं। उनका मुख्य कार्य विरोधी पक्ष के लोगों को तंग करवाना या फिर उन्हें अनचाहे स्थानों पर स्थानांतरित करने तक ही सीमित रहता है तथा सरकार का अन्य सारा कार्य अफसरशाहों पर ही छोड़ दिया जाता है। इसी तरह चुनावों के दिनों में जनता से कई लुभावने वादे करते रहते हैं। इन वादों को पूरा करने के लिए नौकरशाह ही कोई न कोई तरीका निकालते हैं। ऐसे में नौकरशाह अपने मनमाने ढंग से कार्य करना आरंभ कर देते हैं  तथा इनसानियत की सभी हदों को तिलांजलि देना शुरू कर देते हैं। नौकरशाहों को मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है। पहली श्रेणी के नौकरशाह सत्ताधारी दल के साथ मिलकर काम करते हैं तथा उन्हें सरकार बदलने का कोई फर्क नहीं पड़ता। दूसरी श्रेणी वाले जो कि अल्पसंख्या में होते हैं, तटस्थता को अपना आदर्श मानकर कार्य करते हैं जबकि तीसरी श्रेणी के नौकरशाह बीच का रास्ता अपना कर अपना कार्य चलाते हैं। नौकरशाहों को पता लग जाता है कि उनका घुड़सवार कितना निपुण, कार्यकुशल व ईमानदार है तथा उनकी कमजोरियों को भांप कर मनमाने ढंग से फुदकते रहते हैं। यदि घुड़सवार खुद कमजोर हो तो ये घोड़े उन्हें कभी भी गिराकर खुले घूमते रहते हैं। वास्तव में ऐसे नौकरशाह ही किसी सत्तारूढ़ दल के पतन का कारण भी बनते हैं। आमतौर पर यह भी देखा गया है कि कुछ अफसर इतने अपरिहार्य हो जाते हैं कि वे अपनी सेवानिवृत्ति के बाद भी सत्तारूढ़ दल से या तो अपना सेवा प्रसार पाते रहते हैं या फिर कई असंवैधानिक पदों पर तैनात होकर जनता का खून चूसते रहते हैं। भले ही चुनावों के दिनों में विरोधी दल ऐसे थके व सेवानिवृत्त अधिकारियों को कोई भी तरजीह न देने की बात करते हैं, मगर जैसे ही वह सत्ता में आते हैं वे भी वो ही खेल खेलना शुरू कर देते हैं तथा यह सिलसिला लगातार चलता रहता है। मगर ऐसे कारनामों से ऐसे नौकरशाहों में रोष पनपने लगता है जो ईमानदारी व निष्ठा से काम करते हैं और वे अपना एक अलग ग्रुप बना कर सरकार को नीचा दिखाने में सक्रिय हो जाते हैं, परिणामस्वरूप सत्तारूढ़ दल अपनी सत्ता खो बैठता है।

अफसरशाही व नौकरशाही पर नियंत्रण रखने के लिए किसी प्रदेश के मंत्रियों व मुख्यमंत्री को सबल, सक्षम व सुयोग्य होने की जरूरत है तथा तभी वे बेलगाम नौकरशाहों पर अपना नियंत्रण रखकर आम जनमानस की सच्ची सेवा कर पाएंगे। हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री श्री शांता कुमार का यदि उदाहरण दिया जाए तो शायद यह अतिशयोक्ति नहीं होगी जिन्होंने बेलगाम मुख्य सचिव को भी सस्पेंड कर दिया था तथा प्रशासन चलाने का एक उच्चतम उदाहरण दिया था। इसी तरह दिल्ली पुलिस में कमिश्नर पद पर रहे स्वर्गीय वेद मरवाह की मिसाल भी कुछ ऐसी ही है। आज देश को ऐसे राजनीतिज्ञों व अफसरों की जरूरत है, जो एक-दूसरे के लिए रोल मॉडल का काम करें तथा जनता की नसों में नवचेतना का संचार कर सकें। बड़प्पन एवं महत्त्व की निकृष्ट इच्छा यदि रौब-ठौब-ठाठ-बाठ-उन्माद व उत्तेजित ओछेपन का रूप धारण कर लेती है तो दूसरों के आत्म सम्मान, गुण, कर्मयोग्यता तथा व्यक्तित्व का अनादर अवश्य रूप से होता है  तथा कर्मचारी जानबूझ कर उल्लंघन करने पर उतारू हो जाते हैं। समाज की सूरत बदलने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों व राजनीतिज्ञों को सकारात्मक योगदान देना होगा।

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