Saturday, September 26, 2020 03:18 PM

राम नाम ही धर्मनिरपेक्ष

अयोध्या में प्रभु राम के भव्य मंदिर के भूमि-पूजन और उस समारोह में प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी पर सवाल उठाए जा रहे हैं, तो इस संदर्भ में एक पुराना प्रसंग आप से साझा कर रहे हैं। स्पष्ट हो जाएगा कि आस्था किसी भी संवैधानिक पद से ऊपर और महत्त्वपूर्ण है। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी बुनियादी तौर पर व्यक्ति हैं, जिनकी एक आध्यात्मिक आस्था और इबादतगाह भी है। उससे देश का धर्मनिरपेक्ष ढांचा और चरित्र प्रभावित नहीं होते। बहरहाल प्रसंग तब का है, जब राजेंद्र प्रसाद देश के राष्ट्रपति और पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे। गुजरात में भगवान महादेव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन किया जाना था। आमंत्रण राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के लिए स्वाभाविक था। चूंकि प्रधानमंत्री नेहरू खुद को ‘हिंदू’ नहीं मानते थे और उनका आध्यात्मिक जुड़ाव भी असमंजस में था, लिहाजा उन्होंने राष्ट्रपति को भी पत्र लिखा कि देश धर्मनिरपेक्षता के बुनियादी ढांचे पर खड़ा है। यदि आप सोमनाथ मंदिर के समाहोह में शिरकत करेंगे, तो एक धर्म-विशेष के साथ खड़े होंगे। उससे धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन होगा। प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद का जवाब था कि वह पहले ‘हिंदू’ हैं और उन्हें अपनी धार्मिक आस्था पर गर्व है।

अंततः राष्ट्रपति सोमनाथ मंदिर के समारोह में गए। मौजूदा परिदृश्य में भी यदि प्रधानमंत्री मोदी अयोध्या में राम मंदिर के भूमि-पूजन और शिलान्यास का आगाज कर रहे हैं, तो वह धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ  और संविधान की शपथ का उल्लंघन कैसे हो सकता है? अयोध्या विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक पीठ का अंतिम फैसला आ चुका है। उसके मुताबिक ही प्रभु श्रीराम का मंदिर बनना है। अदालती आदेश के मद्देनजर ही केंद्र सरकार ने ‘राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ का गठन किया था। तमाम सरकारी और दफ्तरी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं या पांच अगस्त के भूमि-पूजन से पहले कर ली जाएंगी। यदि देश का प्रधानमंत्री सर्वाधिक बहुसंख्यक समुदाय और आस्थावानों के ऐतिहासिक और अंतरराष्ट्रीय महत्त्व के मंदिर के भूमि-पूजन का सूत्रपात करता है, तो इसमें धर्मनिरपेक्ष या सांप्रदायिक क्या है? क्या देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे में हिंदू और मंदिरवादी शामिल नहीं होते? दरअसल धर्मनिरपेक्षता का भाव प्रभु श्रीराम ने ही मानवता को दिया। लंका पर विजय और लंकेश रावण के युद्ध में मारे जाने के बाद श्रीराम की सेना ने न तो कोई हमलावर रुख अपनाया और न उत्पात मचाया और न ही धर्म-परिवर्तन के लिए लंका की निरीह जनता को विवश किया। उन्होंने विभीषण को लंका का सिंहासन सौंपा। इसी तरह सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बनाया था। इससे बेहतर धर्मनिरपेक्ष सोच और क्या हो सकती है? प्रधानमंत्री की धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक शपथ पर सवाल एआईएमआईएम के सांसद ओवैसी ने उठाया है, जो खुद कट्टरपंथी और मुस्लिमवादी नेता हैं। धर्मनिरपेक्षता के मायने सिर्फ मुसलमान नहीं हैं। बहरहाल प्रधानमंत्री ने केदारनाथ, बद्रीनाथ समेत पशुपतिनाथ और काशी विश्वनाथ सरीखे मंदिरों और ज्योतिर्लिंगों में जाकर भगवान महादेव को नमन् किया है, पूजा-पाठ भी किए हैं। यही नहीं, रामलीला के मंच से ‘जय श्रीराम’ के नारे भी लगवाए हैं।

और ऐसी तमाम धार्मिक गतिविधियां प्रधानमंत्री के तौर पर की हैं। अयोध्या के राम मंदिर के संदर्भ में ही आपत्तियां क्यों जताई जा रही हैं? हालांकि ओवैसी के अलावा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे, एनसपी प्रमुख शरद पवार और सीपीएम के राज्यसभा सांसद बिनॉय विश्वम् आदि नेताओं ने भी सवाल किए हैं, लेकिन धर्मनिरपेक्षता के नाम पर छाती नहीं पीटी। शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने भूमि-पूजन के समय को ‘अशुभ’ करार दिया है। दरअसल अयोध्या विवाद के संदर्भ में मंदिर और मस्जिद से जुड़ी तमाम कहानियां, किस्से, पुरातात्त्विक दावे आदि पर सर्वोच्च अदालत एक निष्कर्ष दे चुकी है। अब ओवैसी का यह प्रलाप मिथ्या है कि अयोध्या में 400 साल तक मस्जिद मौजूद थी, जिसे 1992 में ‘शहीद’ कर दिया गया। यह प्रलाप ही ‘सांप्रदायिक’ है और 2020 में देश के माहौल को नए सिरे से विषाक्त कर देना चाहता है। प्रधानमंत्री का धार्मिक जुड़ाव ‘हिंदू धर्म’ से है, यह पूरा देश अच्छी तरह जानता है। राम मंदिर के लिए जो आंदोलन किए गए और आडवाणी के नेतृत्व में रथयात्रा निकाली गई, तो मोदी उसके संयोजक थे। यह तथ्य भी असंख्य बार देश के सामने से गुजरा है। यदि श्रीराम के भव्य मंदिर निर्माण के जरिए 500 साल पुराना मिशन पूरा हो रहा है और प्रधानमंत्री हिंदुओं को ही नहीं, पूरे देश को संबोधित करना चाहेंगे, तो उस पर धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता के सवाल मत चिपकाओ। देश का धर्म के नाम पर विभाजन मत करो। अयोध्या का कायाकल्प हो रहा है। प्रधानमंत्री 500 करोड़ रुपए से अधिक की योजनाएं देंगे। कुछ का लोकार्पण भी होना है। यह दौर ऐसा है कि देश के अस्तित्व और विकास की बात की जाए, तो कुछ सार्थक लगता है।

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