Sunday, January 24, 2021 04:43 AM

रात कितने पहर चलेगी

कोई यकीन से नहीं कह सकता, लेकिन दिशा विहीन हुए तो खतरों के गड्ढे चारों ओर रहेंगे। बेशक कोरोना की रात के उपाय पहले भी थे और अब पुनः हिमाचल सहित सारा देश हिफाजत की अर्जियों पर गौर कर रहा है। कोविशील्ड टीके की ईजाद में भारतीय इंतजामों की पोटली खुल भी जाए, लेकिन इससे पहले कुछ महीनों तक बाजू बचा कर रखने होंगे। ये बाजू मरहम के हैं और मेहनत के भी। विडंबना यह है कि आर्थिकी के निम्न स्तर और जीडीपी के नकारात्मक रुख के बदौलत, देश अपने मुहानों से लड़ रहा है। राष्ट्र को ऐसे मरहम की जरूरत है जो अनुशासन, संयम व शांति सिखा सके ताकि बढ़ता इंतजार कहीं घातक स्वच्छंदता का मोह न पाल ले। दूसरी ओर रोटी के लिए मेहनत का बाजार चाहिए। हिमाचल में ही कोरोना काल के दौरान पांच सौ लोग अगर आत्महत्या के घाट पर उतर गए, तो इनके इर्द-गिर्द की पांच सौ कहानियां, पांच सौ व्यथाएं या पांच सौ मजबूरियों को भी समझना होगा। हिमाचल के जनजातीय क्षेत्रों में दस फीसदी छात्र ही अगर ऑनलाइन पढ़ाई कर पा रहे हैं, तो इसे तकदीर का फिसलना कहें या वास्तविकताओं के चाबुक का चलना मानें। ढाई सौ के करीब कबाइली स्कूलों के छात्र मौसम की कठोर चादर के नीचे ही आहत नहीं, बल्कि उनकी पहुंच से स्मार्ट फोन और इंटरनेट भी दूर है।

 इसी तरह तमाम छात्रों से अटे हिमाचल के कमोबेश हर घर की विवशताओं में शिक्षा के चंद्रग्रहण को देखा जा सकता है। सरकार को उन सभी प्रकार की परिस्थितियों पर गहन चिंतन करना चाहिए जिनसे आजिज छात्र समुदाय अपने ‘एकांत’ की कोठरी में कैद है। विद्युत आपूर्ति को ही लें तो कोई भी ऐसा दिन नहीं जिसकी इस मामले में कोई रात न हो। क्या विद्युत विभाग को ऑनलाइन पढ़ाई के पार्टनर के रूप में देखा या जोड़ा गया। जाहिर तौर पर हर आवश्यक फैसला भी किसी हथौड़े से कम नहीं। दरअसल हिमाचली दुनिया का सार्वजनिक पक्ष ही सुरक्षा के गहने पहनना चाहता है, जबकि निजी क्षेत्र के बीहड़ को काटने-छांटने की जुर्रत भी नहीं होती। कोरोना काल में फैसलों की जुंबिश में सरकार अपने पक्ष का बचाव कर लेती है, लेकिन सूलियों पर खड़ी निजी क्षेत्र की अमानत लहूलुहान है। पचास फीसदी सरकारी कर्मचारी बेहतर काम कर सकते हैं, लेकिन सौ फीसदी तनख्वाहों की भरपाई उसी बजट से होगी जिसकी भरपाई आम नागरिक करता है। दूसरी ओर जीने की आरजू में मरने की आफत जहां मची है, उस हालात पर चस्पां निराशावाद के चक्र में निजी क्षेत्र तबाह है। कठिन पहरों से गुजर कर जो हिमाचली बेरोजगार होकर घर लौटे, उनके लिए नौकरी का आशावान परिदृश्य कैसे बनेगा। जिनकी पगार कट गई, उनके जीवन की खुशहाली कैसे लौटेगी। रात के पहर में सन्नाटे ही नहीं उभर रहे, बल्कि बंदिशों की दीवार पर फिर से कहीं लॉकडाउन उभर रहा है। निजी क्षेत्र रात को जागता है, तो ही देश की आर्थिकी का सवेरा होता है।

यहां नाइट कर्फ्यू से मानसिक विकार की उत्पत्ति का खतरा है और इसके लिए सर्वेक्षण की जरूरत है। भले ही हिम सुरक्षा अभियान के तहत 27 दिसंबर तक कुछ बीमारियों के लक्षणों का पता लगाया जाएगा, लेकिन कहीं घुटन के कोने में पारिवारिक लाचारियों का मुआयना भी तो हो। कोरोना काल केवल चिकित्सकीय आपदा नहीं, इसके उपायों या सुरक्षा चक्रों ने लगातार लोगों की बेचैनियां बढ़ाई हैं। दरअसल सरकारों को यह तय करना है कि कोरोना के खिलाफ कहां और कब तक आर्थिकी को लड़ाई लड़नी है। वैक्सीन आने तक चिकित्सकीय समाधान न के बराबर रहेंगे, तो भी इस दौर की अन्य जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसे में ढाबा व रेस्तरां मालिकों की फरियाद का कम से कम एक पहलू जरूर सुना जाना चाहिए ताकि कोरोना काल के बीच जिंदगी की वजह भी तो बची रहे। चौकसी-सतर्कता के बीच अगर दरवाजे बंद करने की नौबत है, तो भी आर्थिक खिड़कियां खुली रखनी होंगी।

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