Monday, October 18, 2021 03:32 PM

टीकाकरण में नस्लभेद

ब्रिटेन ने कोविशील्ड टीके को मान्यता देने पर पाबंदी लगाने का फैसला लिया है। यदि आप भारतीय हैं और कोरोना वायरस के संदर्भ में आपने कोविशील्ड टीके की दोनों खुराकें ली हैं, तो हवाई यात्रा के बाद ब्रिटेन पहुंचने पर उस टीकाकरण को स्वीकार नहीं किया जाएगा। आपको तय ब्रिटिश नियमों के मुताबिक क्वारंटीन में रहना होगा। ब्रिटेन के अंतरराष्ट्रीय विमान-यात्रा के नियमों में संशोधन किया गया है, जो 4 अक्तूबर से लागू होंगे। कमोबेश भारत और विकासशील देशों के लिए यह निर्णय ‘नस्लभेद’ से कम नहीं है। भारत के टीकाकरण में कोविशील्ड का करीब 90 फीसदी योगदान है, लिहाजा इतनी बड़ी आबादी को ब्रिटेन ने ‘टीकाहीन’ करार देने का फैसला लिया है। भारत सरकार ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है और चेतावनी दी है कि भारत आने वाले ब्रिटिश और यूरोपीय यात्रियों के साथ ऐसा ही ‘पलट व्यवहार’  किया जा सकता है। हालांकि भारत सरकार ने मान्यता संबंधी नए नियमों को खारिज करने का आग्रह किया है। कोविशील्ड टीके का उत्पादन भारत का ‘सीरम इंस्टीट्यूट’ करता है। यह विश्व में सर्वाधिक टीके बनाने वाली कंपनी है, यह ब्रिटेन भी बखूबी जानता है।

 टीके का आविष्कार एस्ट्राज़ेनेका और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने किया है, जो मूलतः ब्रिटिश संस्थान हैं। टीके का लाइसेंस और पंजीकरण भी ब्रिटिश हैं। सीरम को टीके के उत्पादन का लाइसेंस दिया गया है। भारत में इसका नाम कोविशील्ड है और ब्रिटेन तथा यूरोपीय देशों में ब्रांड ‘एस्ट्राज़ेनेका’ के नाम से प्रचलित है। टीका-निर्माण की पद्धति और वैज्ञानिक समीकरण समान हैं। अजीब विरोधाभास है कि एस्ट्राज़ेनेका टीका लगवाने वाले लोग ‘टीकाकृत’ माने जाएंगे और भारत तथा अन्य छोटे, विकासशील देशों में कोविशील्ड की खुराक लेने वालों को ‘टीकाहीन’ माना जाएगा। यह वैज्ञानिक भेदभाव और नस्लवाद का भी उदाहरण है। ब्रिटेन ने अमरीका और यूरोप समेत कनाडा, ऑस्टे्रलिया, एंटीगुआ, बारबाडोस, बहरीन, ब्रुनेई, डोमिनिका, इजरायल, जापान, कुवैत, कतर, मलेशिया, न्यूज़ीलैंड, सऊदी अरब, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया और ताइवान आदि देशों को प्रवेश की अनुमति दी है। इनमें से ज्यादातर देश सम्पन्न आय वाले हैं। सवाल है कि ब्रिटेन को स्पष्टीकरण देना होगा कि इन देशों के नागरिकों का टीकाकरण और भारत में कोविशील्ड की खुराक लेने वालों में क्या फर्क है? बुनियादी और शोधात्मक तौर पर टीका एक ही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एस्ट्राज़ेनेका के साथ कोविशील्ड टीके को भी मान्यता दी है। ब्रिटेन में अभी तक 4.80 करोड़ आबादी को ही टीका लगा है, जबकि भारत में करीब 83 करोड़ लोग टीके की खुराकें ले चुके हैं। यदि हमारे टीकाकरण में करीब 90 फीसदी भागीदारी कोविशील्ड की है, तो ब्रिटेन 72-73 करोड़ से अधिक आबादी के टीकाकरण को नकार रहा है। यह कैसे स्वीकार्य हो सकता है?

इतना टीकाकरण लगभग आधी दुनिया के सुरक्षा-कवच को नकारने की नकारात्मक कोशिश है। यह मुद्दा भी विश्व स्वास्थ्य संगठन को ही निपटाना चाहिए। हालांकि भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ब्रिटिश समकक्ष को पुरजोर लहजे में नए नियमों को हटाने का आग्रह किया है और ब्रिटेन को सचेत भी किया है। दुनिया को ऐसे टकरावों से बचना चाहिए। यदि भारत को इसी कड़ी मुद्रा में ब्रिटेन को जवाब देना पड़ा, तो एक बड़े भू-भाग में अफरातफरी मच सकती है,  क्योंकि करोड़ों यात्री एक-दूसरे देश में आते-जाते हैं। लाखों छात्रों की पढ़ाई और भविष्य पर वज्रपात हो सकता है। चीन के बाद भारत ही ऐसा देश है, जहां से सर्वाधिक छात्र उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाते हैं। भारत ब्रिटेन का छठा सबसे बड़ा गैर-यूरोपीय देश है, जो कारोबार का साझेदार है। कोरोना महामारी के प्रकोप और लॉकडाउन के बाद अर्थव्यवस्था की बहाली की जो संभावनाएं पुख्ता बन रही हैं, उन्हें भी भारी झटका लगेगा, क्योंकि हवाई यात्रा पर टीकाकरण की पाबंदियांे से कारोबार भी प्रभावित होगा। ब्रिटेन को नहीं भूलना चाहिए कि कोविशील्ड टीका 18 यूरोपीय देशों में ‘टीकाकरण पासपोर्ट’ की जरूरतों को भी पूरा कर रहा है। आश्चर्यजनक है कि सीरम द्वारा बनाए गए एस्ट्राज़ेनेका टीके की 50 लाख से ज्यादा खुराकें ब्रिटेन में दी जा चुकी हैं। क्या उन्हें ‘टीकाहीन’ माना जाएगा? कमोबेश महामारियों के टीके और दवाओं के संदर्भ में ऐसी एकतरफा धक्काशाही नहीं चलती और यह कूटनीति के सिद्धांतों के खिलाफ भी है। यह हर्ष का विषय है कि बाद की सूचनाओं के अनुसार ब्रिटेन ने इस विवादास्पद फैसले को वापस ले लिया है तथा कोविशील्ड को मान्यता प्रदान कर दी है।