Friday, September 25, 2020 09:28 AM

राज्य की छवि में निजी क्षेत्र

इतिहास, संस्कृति और प्रगति से निकली हिमाचल की छवि का एक हिस्सा सरकारों के हवाले से लिखा गया, लेकिन अब प्रदेश की ब्रांडिंग में निजी क्षेत्र के सफल कारनामे अग्रणी भूमिका में दर्ज हो रहे हैं। ऐसे में यह नए हिमाचल का दस्तूर है जहां अब सार्वजनिक भूमिकाओं के सामने निजी क्षेत्र बड़े पैमाने पर प्रदेश की ब्रांडिंग कर रहा है। बहुत पहले से हिमाचल ने अपने लिए ब्रांड तैयार किए और इसी वजह से यह प्रदेश सेब राज्य के रूप में अंगीकार हुआ, लेकिन एक ठहराव भी पैदा हुआ और बागबानी के असरदार रुतबे से अन्य फल नीचे उतर गए। इसी तरह पर्यटन राज्य की ब्रांडिंग में कभी पर्यटन विकास निगम आगे चला, लेकिन इसके अपने ही परिसर नाकारा हो गए। कभी परवाणू के फल विधायन केंद्र की बदौलत पूरे देश ने हिमाचल का जूस पिया, लेकिन अब सारा मुलम्मा उतर गया।

यह इसलिए कि धीरे-धीरे विकास की राजनीति ने राज्य के प्रति अपना दायरा संकुचित कर दिया और जनप्रतिनिधि केवल एक सीमित परिधि में अपनी बादशाहत जोड़ने लगे। जनता को वोट का विकास तो मिल गया, लेकिन इसके भीतर का उपभोक्ता मन अपनी क्षमता के दरवाजे पर निजी क्षेत्र को पुकारने लगा। इसीलिए पहले निजी स्कूल आगे आए और अब हिमाचल स्कूल शिक्षा बोर्ड को खारिज करते हुए अभिभावकों ने सीबीएसई और आईसीएसई जैसे केंद्रीय शिक्षा बोर्ड को अपनी क्षमता और संभावना के साथ जोड़ लिया। आश्चर्य यह कि हर सरकारी कालेज एक जैसी लकीरों को पीट रहा है, लिहाजा हिमाचल की क्षुधा को तृप्त करने के लिए शिक्षा का कोई ब्रांड तैयार नहीं हुआ। कुछ हद तक सेंट बीड्स, जेपी विश्वविद्यालय व शूलिनी यूनिवर्सिटी अपने दम पर राज्य का शिक्षा क्षेत्र में परचम फहरा रही है, वरना प्रदेश तो संस्कृत विश्वविद्यालय के जरिए, ज्ञान की परिभाषा को महिमामंडित कर रहा है। एक अदद प्रयास अगर ‘साइंस सिटी’ के नाम पर हो जाता, तो शिक्षा का यही ब्रांड ज्ञान की चांदनी बिखेर देता।

हिमाचल वर्षों से बालीवुड के अलावा कई क्षेत्रीय फिल्मों की पृष्ठभूमि में अपना छायांकन करता है, लेकिन इस रास्ते भी राज्य ने खुद को ब्रांड नहीं बनाया। सिने पर्यटन पर तवज्जो दी होती या हैल्थ टूरिज्म की अधोसंरचना को संवारा होता, तो कितना अंतर आता। राज्य के अपने लक्ष्य न तो स्पष्टता से परिभाषित हैं और न ही बजट की मूल अवधारणा में उत्थान का मकसद, संपूर्ण छवि से ताल्लुक रखता है। ऐसे में जहां राज्य अपनी ब्रांडिंग कर सकता है, वहां राजनीति अपराधी हो जाती या बजट ही दरक जाता है। स्मार्ट सिटी परियोजनाएं इसी तरह सरकार के हाथों में किरकिरी का आलम लिए भटक रही हैं। हिमाचल के ब्रांड को तहस नहस करने के लिए वन संरक्षण कानून भी एक हथकंडा रहा है। ऐसे में अब उपभोक्ता की पसंद बन रहे निजी क्षेत्र के मार्फत हिमाचल बुलंदी हासिल कर सकता है, बशर्ते पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप की वजह और विशेषता समझी जाए।

यह साबित हो रहा है कि शिक्षा-चिकित्सा, परिवहन व निर्माण उद्योग में निजी क्षेत्र पर भरोसा बढ़ रहा है, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के प्रति जनता की राय कमजोर हो रही है। आज अगर हिमाचल की कुल्लू शाल जगत प्रसिद्ध हुई, तो इसका एकमात्र श्रेय भुट्टिको को देना होगा या बीडीएम जैसे उत्पादों की गुणवत्ता से प्रदेश आगे बढ़ा, तो यह निजी क्षेत्र को तसदीक करता है। प्रदेश की ब्रांडिंग में निजी क्षेत्र का योगदान और बढ़े इसके लिए राज्य को अपनी नीयत साफ करनी होगी, जबकि सरकार को भी अपने सेवा क्षेत्र तथा लक्ष्यों के साथ अपनी ब्रांड वैल्यू की जरूरत समझनी होगी और यह फोकस, जवाबदेही तथा गुणवत्ता के बिना हासिल नहीं होगी।

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