रशिया में रक्षा मंत्री

कर्नल (रि.) मनीष धीमान

स्वतंत्र लेखक

भारत के रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह इस सप्ताह तीन दिन के दौरे पर रूस में विक्ट्री डे परेड में हिस्सा लेने के लिए गए। इस समारोह में भारत के साथ-साथ दूसरे विश्व युद्ध में रूस के सहयोगी देशों की सैन्य टुकडि़यों ने हिस्सा लिया। इसके अलावा नाजी सेनाओं की तरफ  से लड़ने वाले मुल्कों ने भी इसमें शिरकत की। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जब जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर ने 30 अप्रैल 1945 को गोली मारकर आत्महत्या कर ली तो उसके बाद सात मई 1945 को जर्मन सेना ने फ्रांस में आत्मसमर्पण कर दिया था,  जिसमें अंतिम हस्ताक्षर नौ मई तक हो गए। पर तत्कालीन रूस के नेता स्टालिन चाहते थे कि नाज़ी सेना की उसी तरह की आत्मसमर्पण प्रक्रिया बर्लिन में भी हो क्योंकि तब तक रूसी सेना अपने उत्तरी क्षेत्र में जर्मनी के साथ लड़ रही थी। आखिर चर्चिल की मध्यस्थता के बाद  रूस मान गया और पहली बार रूस ने विक्ट्री डे परेड 24 जून 1945 को  निकाला। पर उसके बाद  इस दिन को 9 मई को मनाया जाता है। 1991 में  यूएसएसआर के विभाजित होने के बाद यह उत्सव मॉस्को के रेड स्क्वेयर में मनाया जाता है जिसमें रूस अपनी सैन्य शक्ति तथा आधुनिक हथियारों का प्रदर्शन करता है। इस बार कोविड की वजह से यह समारोह 24 जून को मनाया गया। रूस के विक्ट्री डे समारोह में भारत के अलावा चीन के विदेश मंत्री तथा उनकी सैन्य टुकड़ी ने भी इस परेड में हिस्सा लिया। एक तरफ  यह दोनों देश 75 साल पहले एक साथ सहयोगी बनकर लड़े युद्ध की विजय का जश्न मना रहे थे तो दूसरी तरफ  दोनों देशों के बीच बार-बार अलग-अलग स्तर की बातचीत के बावजूद आपसी सीमा विवाद कम होने का नाम नहीं ले रहा है। पैंगोंग झील तथा गलवान वैली में चीन की घुसपैठ तथा जरूरत से ज्यादा सेना के कैंप स्थापित करने के विरोध के चलते दोनों देशों में युद्ध जैसे हालात बन गए हैं। इसी बीच दो दिन पहले खबर आई थी कि कोर कमांडर लेबल की बातचीत के दौरान दोनों देश 15 मई से पहले वाली स्थिति में जाने के लिए तैयार हो गए हैं, पर उसके बाद भी चीन का लगातार सीमा पर सेना का बढ़ाना तथा अब डेपसांग के मैदानी इलाके में सैन्य प्रभुत्व को ताकतवर बनाने की कोशिश से चीन की मंशा पर शक होना लाजिमी है क्योंकि अतीत में भी हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा देकर ड्रैगन द्वारा दिए गए धोखे के दंश को हम झेल चुके हैं। ऐसी स्थिति में आवश्यक है कि भारत आज किसी तरह के झांसे में न फंस कर अपनी सामरिक रणनीति को और भी सुदृढ़ करते हुए न केवल सैन्य शक्ति से बल्कि अपनी विदेश नीति व आर्थिक नीति में सही बदलाव करते हुए बिगड़ैल अहंकारी पड़ोसी पर दबाव बनाए। इसके लिए भारत को विश्व के विभिन्न देशों का समर्थन हासिल करना होगा। वैश्विक दबाव बनाकर ही हम चीन को सीमा पर बिगड़ैल होने से रोक सकते हैं। अमरीका के साथ-साथ रूस से भी समर्थन हासिल करने की कोशिश की जानी चाहिए।

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