रसोड़े में कुकर, थाली में छेद: अजय पाराशर, लेखक, धर्मशाला से हैं

अजय पाराशर

लेखक, धर्मशाला से हैं

‘रसोड़े में कुकर, थाली में छेद’ जैसा अनाप-शनाप बकते हुए पंडित जॉन अली अचानक नींद से उठ बैठे। उठते ही मुझे लात जमाते हुए बोले, ‘‘लाहौल वला कूव्वत! पंडित को नींद नहीं और दोस्त को देखो, ऐसे खर्राटे मार कर सो रहा है जैसे सत्ताधारी दल ने विपक्ष की गैर-हाज़िरी में सारे बिल पास करवा लिए हों।’’ पंडित जी के लात के प्रहार से घबरा कर मैं वैसे ही उठ बैठा जैसे ब़कौल बकवादी मीडिया राफेल की गर्जना से चीन या पाकिस्तान बौखला जाता है। मैं आंखें मलते हुए बोला, ‘‘क्या पंडित जी, सोने भी नहीं देते? हमेशा उलझे रहते हो। बतोले बाबा की तरह चैन से बैठना क्यों नहीं सीखते? लोगों से तभी मु़खातिब हुआ करो, जब अपनी हांकनी हो। वैसे आप नींद में क्या बुड़बुड़ा रहे थे?’’ ‘‘कुछ नहीं यार! रामलीला मैदान से देश में घूमते-घुमाते, मैं छेद तक तो आ पहुंचा। पर समझ में नहीं आ रहा था कि थाली में छेद है या छेद में थाली। फिर हर जगह छेद ही छेद नज़र आने लगे और मैं घबरा कर उठ बैठा।’’ जॉन अली बोले। मैं एक बार फिर याचक बनते हुए बोला, ‘‘पंडित जी, अपनी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा। कृपया विस्तार से विवेचन करें।’’ जॉन अली किसी ़फल्स़फी की तरह अपने भीतर गहरे उतरने लगे थे। देश की आर्थिकी की तरह धीरे-धीरे उनकी आंखें बंद होने लगीं।

विपक्ष की आवाज़ की तरह उनकी धीमी आवाज़, कहीं भीतर से आते हुए महसूस हो रही थी, ‘‘यार, मैं सपने में अपना जमा-जमाया काम छोड़कर, देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने के लिए तिरछी टोपी वाले और दूधाधारी बाबा के आंदोलन में शामिल होने के लिए रामलीला मैदान पहुंच गया था। तब यह बात समझ नहीं आई थी कि जब यहां हर साल रावण को जलाने के बावजूद देश से एक भी सामाजिक बुराई ़खत्म नहीं हुई तो यह आंदोलन क्या कर लेगा? दिन ढलने के बाद शराब और ड्रग्स मा़िफया सक्रिय हो जाता। भारी अंशदान और एक अरसे तक बतौर सक्रिय कार्यकर्ता काम करने के दौरान जब अलग-अलग रसोड़ों में मु़खतलि़फ दलों और लोगों के स्वार्थों को पकते देखा तो निराश होकर वापस लौट आया। लेकिन सबसे बड़ी घटना थी, मुख्य रसोड़े में बतोले बाबा द्वारा चूल्हे पर रखा प्रैशर कुकर। पपलू बाबा तो तमाम संसाधनों के बावजूद तुतलाते ही दिखे और बतोले बाबा का प्रैशर कुकर सीटियां बजाता रहा। लोगों की अब समझ में आ रहा है कि ़खाली प्रैशर कुकर भी सीटियां मार सकता है।

़गुलामी के दौरान लोगों ने सोचा कि सदियों  से थाली में पड़े छेद को आज़ाद भारत भर लेगा। लेकिन छेद है कि भरता ही नहीं। हां, रसोड़ा, चूल्हा, थाली के साथ ़खास लोग भी बदलते रहते हैं, लेकिन छेद? जहां देखो वहीं छेद नज़र आता है चाहे थाली नैतिकता, सदाचार या मूल्यों की हो या फिर ़गरीब की। सिनेमा नगरी में तो पहले से ही छेद है। कुछ कलाकार अपनी कमाई थालियां दिखाने में व्यस्त रहे लेकिन बकवादी मीडिया द्वारा सृजित बवंडर में खनखती बाई ने छेद का बायस्कोप दिखाकर बहुत कुछ जुगाड़ लिया। अब कोई बड़ी बात नहीं कि यह बाई कुछ अरसे बाद माननीयों की श्रेणी में शामिल हो जाए। पता नहीं मीडिया को आम आदमी की थाली का छेद कब दिखेगा?’’अपने उवाच के बाद पंडित जी फिर कहीं गहरे खो गए और मैं अपनी थाली के छेद की चिंता में दुबला हुआ जा रहा था।

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