Sunday, March 07, 2021 11:19 PM

बढ़ती अराजकतावादी राजनीति

यह उस देश के लिए लज्जाजनक है जिसका प्रधानमंत्री काफी लोकप्रिय है तथा जिनका सम्मान दुनियाभर में भी किया जाता है। मेरे विचार में अब विकल्प यही है कि संविधान के मुताबिक कार्रवाई की जाए। संविधान के अनुसार कानून-व्यवस्था तथा कृषि जैसे विषय विभिन्न सरकारों के अधीन आते हैं। अगर केंद्र सरकार ने समवर्ती सूची में विषय होने के कारण अपने अधीन आते इस मामले में कानून बनाया है, तो इसे लागू करने का दायित्व राज्यों पर है। जो राज्य इसे लागू करना चाहें, वे कर सकते हैं तथा जो राज्य लागू न करना चाहें, वे इसे लागू न करें। वैसे अधिकतर राज्य इन कानूनों के पक्ष में हैं। इस तरह किसान वही लागू करें जो उन्हें पसंद है तथा जो राज्य इसके पक्ष में नहीं हैं, वे इन्हें लागू न करें। यदि किसान और सरकारें इससे सहमत न हों, तो विकल्प यही है कि कानून-व्यवस्था को लागू किया जाए। भारत में आजकल लोकतंत्र कठिन चरण से गुजर रहा है...

लोकतंत्र के बारे में प्रसिद्ध राजनीतिक विज्ञानी हारोल्ड लास्की ने एक बार कहा था कि यह एक ऐसा हैट है जो कि अपना स्वरूप खो चुका है, क्योंकि इसे असंख्य लोगों द्वारा पहना जाता है। अमरीका के कैपिटल हिल में जो कुछ घटित हुआ तथा अब दिल्ली में किसानों की राजनीति में जो कुछ हो रहा है, ये दोनों लोकतंत्र के विलक्षण उदाहरण हैं। अमरीका के मामले में एक वैधानिक चुनाव तथा जो बाइडेन की जीत के खिलाफ यह एक हिंसक प्रदर्शन था। जो बाइडेन अमरीका के नए राष्ट्रपति के रूप में शपथ ले चुके हैं। इधर भारत में वैधानिक रूप से चुनी गई सरकार के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। भारत में किसानों का प्रदर्शन ज्यादा विचित्र है। किसानों के प्रदर्शन में अब तक कोई हिंसा नहीं हुई है, किंतु यह उद्दंड प्रकार का है तथा यह बिना किसी प्रत्यक्ष न्यायिक कारण के ही है। इस आंदोलन के कारण क्या हैं? किसानों की मांग है कि उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाए। सरकार का इस पर कहना है कि यह पहले से दिया जा रहा है तथा आगे भी जारी रहेगा, किंतु किसानों को ज्यादा कीमत दिलाने के लिए वे अपनी फसल को खुले बाजार में बेचने के लिए स्वतंत्र होने चाहिएं। किसान चाहते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाया जाए। सरकार इसके विषय में लिखित आश्वासन देने को राजी है, किंतु किसान इस पर सहमत नहीं हैं। वे चाहते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी रूप दिया जाए। अगर किसान विवाद को चार प्वाइंट तक घटाते हैं और समझौते के लिए आगे बढ़ने के लिए दो प्वाइंट पर सहमत होते हैं तो वे फिर पीछे हट जाते हैं और कहते हैं कि वे प्वाइंट वाइज चर्चा नहीं चाहते हैं। अब तक सरकार और किसानों में नौ वार्ताएं हो चुकी हैं, फिर भी कोई समाधान नहीं निकला और न ही भविष्य में कोई समाधान निकलता दिखाई दे रहा है।

किसान पिछले 90 दिनों से दिल्ली जाने वाले मार्गों को रोके हुए हैं। इससे सामान्य आवाजाही बाधित हुई है तथा इन मार्गों से रोज गुजरने वाले लोगों के सामने नई समस्या खड़ी हो गई है। किसान सुप्रीम कोर्ट भी जाते हैं, लेकिन वे कोर्ट के फैसले से भी सहमत नहीं हैं। वे न तो सरकार की बात सुनने के लिए तैयार हैं, न ही कोर्ट की बात मानने को तैयार हैं। अब सरकार के पास भी कोई विकल्प नहीं बचा है। किसान तीनों कृषि कानूनों को रद करने की मांग पर अड़े हैं। सरकार कहती है कि ये कानून किसान हित में ही बनाए गए हैं, इसलिए वह इन्हें रद नहीं करेगी। सरकार ने किसानों को अन्य विकल्प देने के लिए कहा, किंतु किसान कोई अन्य विकल्प देने के लिए तैयार नहीं हैं। यह भी एक तथ्य है कि कोर्ट का काम कानून बनाना नहीं होता, बल्कि वह संविधान की व्याख्या करती है तथा कानून का औचित्य जांच सकती है। अब अगर कोर्ट कुछ हद तक आगे जाती है, तो सरकार को लगेगा कि न्यायपालिका प्रशासन में दखल देने लगी है, जो कि उसका काम नहीं है, बल्कि यह काम सरकार का है। ऐसी स्थिति के कारण ही कोर्ट ने मामले को अपने हाथ में लेने से उसे रोक दिया है। सरकार पर दबाव बनाने के लिए किसान अब दिल्ली में हजारों ट्रैक्टर लेकर आना चाहते हैं। उन्हें यह कार्य करने में कोई संकोच नहीं है, जबकि 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रीय समारोह होने जा रहा है। इससे आम नागरिकों के सामान्य जनजीवन में भी बाधा पहुंचेगी। किसान प्रदर्शन के लिए अपने साथ महिलाएं और बच्चे भी ले आए हैं। प्रदर्शन में शामिल कई किसानों की ठंड के कारण मौत भी हो चुकी है। प्रदर्शन में सबसे लज्जाजनक यह है कि किसानों के साथ आई महिलाएं वह कर रही हैं, जिसे पंजाब में ‘स्यापा’ कहा जाता है। यह प्रथा किसी व्यक्ति की मौत पर निभाई जाती है। प्रदर्शनकारी देश के प्रधानमंत्री को भी आपत्तिजनक शब्दों में गालियां दे रहे हैं।

यह उस देश के लिए लज्जाजनक है जिसका प्रधानमंत्री काफी लोकप्रिय है तथा जिनका सम्मान दुनियाभर में भी किया जाता है। मेरे विचार में अब विकल्प यही है कि संविधान के मुताबिक कार्रवाई की जाए। संविधान के अनुसार कानून-व्यवस्था तथा कृषि जैसे विषय विभिन्न सरकारों के अधीन आते हैं। अगर केंद्र सरकार ने समवर्ती सूची में विषय होने के कारण अपने अधीन आते इस मामले में कानून बनाया है, तो इसे लागू करने का दायित्व राज्यों पर है। जो राज्य इसे लागू करना चाहें, वे कर सकते हैं तथा जो राज्य लागू न करना चाहें, वे इसे लागू न करें। वैसे अधिकतर राज्य इन कानूनों के पक्ष में हैं। इस तरह किसान वही लागू करें जो उन्हें पसंद है तथा जो राज्य इसके पक्ष में नहीं हैं, वे इन्हें लागू न करें। यदि किसान और सरकारें इससे सहमत न हों, तो विकल्प यही है कि कानून-व्यवस्था को लागू किया जाए। भारत में आजकल लोकतंत्र कठिन चरण से गुजर रहा है। सरकार कृषि सुधारों पर आगे बढ़ता चाहती है, जो आज की निहायत जरूरत भी है। इसके बावजूद वह आगे नहीं बढ़ पा रही है। उसके कदम रोके जा रहे हैं। इस तरह तो किसी भी सरकार के लिए काम करना मुश्किल हो जाएगा। यह स्थिति सरकार और लोगों को यह सोचने पर विवश कर रही है कि देश में किस प्रकार की सरकार होनी चाहिए। यह एलेक्जेंडर पोए थे जिन्होंने लिखा ः ‘सरकार के प्रकार के लिए मूर्खों को लड़ने दें, जो सबसे बढि़या है, शासित ही सबसे बढि़या है।’

मेरे विचार में सरकार को अब यह करना चाहिए कि इन कानूनों को लागू करने के लिए राज्य सरकारों पर छोड़ देना चाहिए। जो राज्य सहमत हों, वे इन्हें लागू करेंगे और जो सहमत न हों, वे इन्हें लागू न करें तथा अपनी पसंद के अनुसार कोई नया कानून बना लें। कोई राज्य अगर न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी रूप देना चाहे तो वह इसके लिए स्वतंत्र है। इस तरह अपनी-अपनी इच्छानुसार काम करने की स्वतंत्रता सभी राज्यों को मिल जाएगी। इससे राज्य का शासनतंत्र भी चलता रहेगा तथा किसान भी अपनी पसंद के अनुसार कानून बनवा सकेंगे।

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