Saturday, August 15, 2020 09:50 PM

साहित्यिक आयोजनों में बदलाव की गुंजाइश

डा. शंकर वासिष्ठ, मो.-9418905970

हर स्तर पर साहित्यक आयोजनों के उद्देश्य तभी प्राप्त हो सकते हैं या इनकी भव्यता, सफलता तभी सार्थक हो सकती है जब परिणाम में समाज पर इनका प्रभाव पड़े। समाज आज भौतिकता की ऊहापोह में बहुत कुछ होते हुए भी निराश है, असंतुष्ट है। इस नैराश्य-भाव से छुटकारा व संतोष की सांस इन आयोजनों की सफलता है। संक्षेप में अधिकाधिक प्रचार-प्रसार से श्रोताओं को इन आयोजनों से जोड़ना व नकारात्मक सोच से सकारात्मक सोच की ओर प्रेरित करना है। उनके अंतर्मन में संवेदनशीलता की उर्वर भूमि तैयार करना है। यह तभी संभव है जब हमारे साहित्यिक आयोजन रुचिकर होंगे। इसके लिए पुख्ता वातावरण निर्माण की आवश्यकता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जो दशा और दिशा साहित्यिक समाज व आयोजनों की है, वह अति निंदनीय नहीं तो गरिमापूर्ण या प्रशंसनीय भी नहीं है। समय रहते सरकारी, गैर-साहित्यिक संस्थाओं व ख्याति-प्राप्त साहित्यकारों ने वांछित चिंतन व आवश्यक कार्यवाही को रचनात्मक रूप नहीं दिया तो साहित्यिक अंतरिक्ष में संकट के काले मेघ और गहरा जाएंगे। यह अति विचारणीय विषय है। प्रायः देखने में आया है कि सरकार द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में गहमा-गहमी मुख्य अतिथि के आगमन, अभिनंदन, आशीर्वाद, जलपान व प्रस्थान तक ही सीमित रहती है। इन आकाओं का स्वागत व स्तुतिगान आयोजकों की विवशता व व्यवस्था का अपरिहार्य अंग है।

इसके समाप्त होते ही समस्त उत्सुकता शिथिल हो जाती है। मुखिया के जाते ही सभागार का परिदृश्य बदल जाता है। खाली कुर्सियां वक्ताओं को चिढ़ाती हैं, सुनने-सुनाने वाले मात्र आमंत्रित साहित्यकार ही रह जाते हैं। आयोजकों का समय अभाव त्रासदी बन जाता है। शोध-पत्र वाचक जिसने सामग्री एकत्रित करने में समय लगाया है, संक्षेप की परिधि में आकर हतप्रभ हो जाता है। निहत्था सा जैसे-कैसे अपनी बात रखता है। समीक्षा तो हास्यास्पद है, कभी दो-चार को कुछ क्षण मिल जाएं तो वे सौभाग्यशाली समझे जाते हैं। कुछ साहित्यकार अपनी बात कह कर पतली गली से खिसक लेते हैं। बस, अंत यक्ष विवशतावश, दो-चार सुनाने वाले और विभागीय कर्मचारी। ऐसी स्थिति में अध्यक्षीय संप्रेषण की दुर्गति का पाठक स्वयं अनुमान लगा सकते हैं। इस दुर्गति का धनाभाव भी एक कारण है, क्योंकि दूर-दराज से आए साहित्यकारों का रहना-सहना व खान-पान में मिलने वाले मानदेय से कहीं अधिक व्यय हो जाता है, इसलिए वे खिसकने में ही भलाई समझते हैं। आयोजक निर्धारित बजट नियमों से बाहर जा नहीं सकते।

अतीत में साहित्यिक आयोजन सोत्साह लंबे समय तक चलते थे। मुख्य कारण था रुचिकर मंत्री व अधिकारी के पास विभाग का होना। मुझे वे दिन याद हैं जब स्व. डा. परमार, स्व. प्रार्थी, स्व. पदमदेव, श्री शांताकुमार व स्व. पाराशर सरीखे लोग आयोजन की समाप्ति तक समय दिया करते थे, स्वयं भी आनंदित होते थे और श्रोता भी भरपूर मनोरंजन किया करते थे। इसी कड़ी में स्व. काव, श्रीनिवास जोशी, के.सी.शर्मा, डा. बाल्दी, के.आर. भारती व राकेश कंवर सदृश प्रशासनिक अधिकारियों ने अपने-अपने समय में साहित्यिक आयोजनों को ऊंचाइयां प्रदान कीं। साहित्यिक समाज सरकार से अब भी यही अपेक्षा रखता है। गैर सरकारी संस्था अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार आयोजन करती है, भले ही व्यापकता न हो परंतु भव्यता गरिमापूर्ण रहती है। इनमें प्रारंभ से समापन तक एक सी स्थिति रहती है।

कुल मिलाकर सफल कार्यक्रम। इनमें उपस्थिति के अतिरिक्त गुणवत्ता भी होती है, परंतु ऐसे कार्यक्रम होते बहुत कम हैं। कुल मिला कर यदि बदलाव की गुंजाइश टटोलनी है तो हमें ग्रामीण स्तर से शहरी स्तर तक इन आयोजनों को करवाना चाहिए। यह भी देखा गया है कि जब स्थानीय संस्था के सहयोग से आयोजन करवाए जाते हैं तो वे संख्या, व्यवस्था व गुणवत्ता में श्रेष्ठ रहते हैं। स्थापित साहित्यकारों के मार्गदर्शन में नवोदितों को प्रोत्साहन व आशीर्वाद मिलना चाहिए। ग्रामीण स्तर तक साहित्यिक इकाइयां स्थापित हों। आयोजनों को विद्यालयों, नेहरू युवा केंद्रों व महिला संगठनों के माध्यम से विस्तार दिया जाना चाहिए। साहित्यिक आयोजनों में पूर्वाग्रह रहित सभी को समान अवसर मिलें, सरकारी आयोजनों में कुछ चेहरों को सदा ही देखा जा सकता है, उपेक्षित साहित्यकार गुमनामी व उपरामता में चले जाते हैं।

मेरा मानना है कि यदि पारदर्शिता व नैतिकता के साथ साहित्यिक आयोजन करें तो साहित्य के प्रति जनमानस का आकर्षण बढ़ेगा व समृद्धता भी होगी। आयोजनों में पठित पत्र, कविता, कहानी व गीत प्रकाशित होने चाहिएं ताकि लेखक प्रोत्साहित हो, परिणामतः उनकी रुचि बढ़ेगी। आयोजन की गरिमा को ध्यान में रख कर योजना बने। शोधपत्र की कॉपी समीक्षकों को यथा समय मिल जाए ताकि अनावश्यक पिष्टपेषण से बचा जा सके। कभी-कभार एक कवि, लेखक या कथाकार पर समीक्षा करवाई जाए ताकि उचित मार्गदर्शन हो सके। कुल मिलाकर साहित्यिक आयोजनों की गरिमा के लिए इनकी सकारात्मकता व सार्थकता को ध्यान में रखना आवश्यक है। ऐसा न हो किन्हीं और कार्यों में ही आयोजन के उद्देश्य गौण हो जाएं। इसमें ख्याति प्राप्त साहित्यकारों व आयोजकों के समन्वय व समर्पित अनुभव की नितांत आवश्यकता है। इस प्रकार का प्रयास और बदलाव निश्चित रूप से साहित्यिक संपदा के लिए वरदान सिद्ध होगा।

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