Friday, September 25, 2020 09:34 AM

साहित्यिक समाज की घटती प्रासंगिकता

अमरदेव आंगिरस, मो.-9418165573

साठ के दशक में ‘सरिता’ पत्रिका के एक स्तंभ ‘यह किस देश-प्रदेश की भाषा है’ के अंतर्गत गद्य-पद्य की कुछ पंक्तियां प्रकाशित होती थीं जो आम पाठक को ही नहीं, साहित्यिकों के लिए भी दुरूह, जनजीवन से दूर, उलझी हुई और पांडित्यपूर्ण होती थीं। उदाहरण के लिए एक सुप्रसिद्ध कवयित्री की पंक्तियां एक अंक में थीं– ‘आ रही उषा ज्योति, स्मित।  आलोक दुकूलिनी  स्वर्गकन्या   नूतन, पूर्वायन शोभी उदित हुई उज्ज्वल तन, व्रतवती निरंतर दिग्-दिगंत से परिचित। आ रही उषा….’। ऐसा करने पर संपादक का उद्देश्य हिंदी साहित्य को ‘किताबी’ से हटाकर आम पाठक तक  प्रसारित करना था। साहित्य का मूल उद्देश्य लोकमंगल की कामना  है।

अतः उस कालखंड में महावीर प्रसाद द्विवेदी ही नहीं, अन्य साहित्यकारों की इस प्रकार की साहित्य की दृष्टि थी जो प्रेमचंद परंपरा में आगे बढ़ी। अंग्रेजी शासन के वक्त उपजी नवचेतना से  भारतीय जनमानस में राष्ट्रीयता, भारत के अतीत गौरव, राष्ट्रीय नायकों  तथा  लुप्त भारतीय साहित्य इतिहास को जानने की उत्कंठा उत्पन्न हुई। आजादी से पूर्व विद्वान एवं अनुसंधित्सु साहित्यकारों  टैगोर,  बंकिमचंद्र, शरत चंद्र, हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, बालकृष्ण भट्ट, गुलेरी तथा इनके असंख्य सहयोगी लेखक मंडल द्वारा भारतीय संस्कृति तथा गौरव का सूक्ष्म विवेचन तथा महिमामंडन हुआ, जो दबे-कुचले समाज के लिए आत्मिक आनंद प्रदान करता था।

इसी समय के बीच अनेक पत्र-पत्रिकाएं भी इतनी लोकप्रिय हुईं कि उनके अंकों को पढ़ने के लिए पढ़े-लिखे लोग ढूंढ-ढूंढ कर आदान-प्रदान करने लगे। यूं तो प्रत्येक युग का साहित्य अपनी विशेषताएं लिए होता है, किंतु यह सत्य है कि साठ के दशक पूर्व का साहित्य जन-जन में अपने भाषायी स्तर एवं श्रेष्ठता की दृष्टि से समृद्ध था। उस समय पत्र-पत्रिकाओं को पाठक संजोकर ही नहीं रखते थे, बल्कि कहा जाए कि लोग कचरे तथा रद्दी में पड़े कागजों को भी उठा कर पढ़ लेते थे, तो असंगत नहीं होगा।

इस परिदृश्य में आज का हिमाचल का साहित्य पर्याप्त समृद्ध तथा विपुल दिखाई देता है। अनेक लेखकों की रचनाएं प्रदेश तथा प्रदेश के बाहर भी प्रकाशित और चर्चित हो रही हैं। अनेक लेखक राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित भी हुए हैं। आज साहित्य की अधिसंख्य पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं जिनमें नए-नए लेखक लिख रहे हैं। प्रकाशन की सुविधा से पुस्तकों की भरमार हो रही है। व्यंग्य, कविता, कहानी, उपन्यास, समीक्षा, लोक साहित्य, यात्रा वृत्तांत आदि विधाओं में जमकर सृजन हो रहा है, किंतु इस सबके बावजूद आम पाठक पुस्तकों से दूर ही नहीं, पुस्तकों को उपेक्षा से देखता है।

कवि सम्मेलनों में आहूत साहित्यकार ही अंत तक बैठे होते हैं। यह बात हिमाचल में रचे जा रहे साहित्य को एक नए कोण से समझने के लिए विवश-सा करती है। बेहतर पढ़ने को न मिलने के चलते भी साहित्य के प्रति प्रदेश के युवा पाठकों में अरुचि पैदा हो रही है। वैसे डिजिटल युग के चलते ऑफलाइन पुस्तकों की उपेक्षा  के अनेक कारण हैं।

आज हर युवा के हाथ में मोबाइल, लैपटॉप, सोशल मीडिया के चलते साहित्य तथा संगीत, सहज उपलब्ध है। इसलिए आज ऑफलाइन पुस्तक खरीद कर क्यों पढ़ें? आज के भौतिक आपाधापी और उदारीकरण के युग में व्यक्ति की जीवन शैली व्यस्तता की है। उसके पास पढ़ने को तो छोडि़ए, अपने तक के लिए समय नहीं है। ऐसे में अगर वह साहित्य की ओर देखता भी है तो बस मात्र मनोरंजन की दृष्टि से ही देखता है। साहित्य की समाज में घटती उपयोगिता के पीछे अन्य कारण यह भी है कि साहित्य आज वर्गों में विभाजित हो गया है।

इसका जहां एक ओर लाभ भी है तो दूसरी ओर हानि भी। अपने वर्ग से बाहर का साहित्य कोई पढ़ ही नहीं रहा। मतलब, साहित्य के स्तर पर हम अधूरे से होते जा रहे हैं। बावजूद इसके बेशक आज हिमाचली साहित्य स्तरीय रूप में सामने आ रहा है, किंतु उसके लिए यह खतरे की घंटी तो है ही। क्योंकि साहित्य में कुछ तय हो या न, पर यह तय है कि कोई भी साहित्यकार साहित्य की क्या दशा-दिशा हो, दावा नहीं कर सकता, क्योंकि साहित्य किसी एक वर्ग का दर्पण नहीं होता, वह समूचे समाज का दर्पण होता है।

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