सच में ही नामवर थे ‘डा. नामवर’

जाहिद खान

लेखक मध्यप्रदेश से हैं

हिंदी साहित्य के आकाश में नामवर सिंह उन नक्षत्रों में से एक हैं, जिनकी विद्वता का कोई सानी नहीं था। साहित्य, संस्कृति और समाज का कोई सा भी विषय हो, वह धारा-प्रवाह बोलते थे। उनको सुनने वाले श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाया करते थे। हिंदी साहित्य में उनका स्टार जैसा मर्तबा था। कुछ लोग जो जिंदगी भर नामवर सिंह के विचारों से असहमत रहे और उनकी आलोचना करते रहे, वे भी अब आज किसी न किसी बहाने उन्हें याद करते हैं। आलोचना, आरोप और विरोध की तो उन्होंने अपने जीवन भर कभी परवाह नहीं की। 28 जुलाई 1926 को चंदौली जिले के एक गांव जीयनपुर में जन्मे नामवर सिंह हिंदी साहित्य में अकेले ऐसे साहित्यकार थे, जिनके जीते जी साल 2001 में सरकारी स्तर पर देश के पंद्रह अलग-अलग स्थानों दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, भोपाल, लखनऊ, बनारस आदि में उन पर एकाग्र कार्यक्रम ‘नामवर निमित्त’ आयोजित हुए जिसमें बड़ी संख्या में लोगों ने भागीदारी की। नामवर सिंह तकरीबन छह दशक तक हिंदी साहित्य में आलोचना के पर्याय रहे। डा. रामविलास शर्मा के बाद हिंदी में वह प्रगतिशील आलोचना के आधार स्तंभ थे। 19 फरवरी 2019 को उन्होंने इस दुनिया से अपनी आखिरी विदाई ली। वह आखिरी दम तक हिंदी साहित्य की सेवा करते रहे। उनके जाने से हिंदी आलोचना का जैसे एक युग खत्म हो गया। हिंदी साहित्य में नामवर सिंह जैसा कोई दूसरा साहित्यकार शायद ही कभी हो। नामवर सिंह ताउम्र धर्मनिरपेक्षता के पक्षधर रहे। उन्होंने अनेक मर्तबा हिंदी में सांप्रदायिकता विरोधी साहित्यिक मोर्चे की अगुआई भी की।

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