Friday, September 24, 2021 08:35 AM

साहिब नाराज हैं

दुनिया भर के विशेषज्ञ अभी तक पता नहीं लगा पाए हैं कि इतनी मन की फेंकने और बकध्यानी के बावजूद साहिब के चेहरे पर सदा नाराज़गी क्यों छाई रहती है। सवाल को लगता था कि साहिब आम आदमियों की परेशानियों और कठिनाइयों से दुखी रहते हैं। लेकिन साहिब की ऐय्याशी और आत्ममुग्धता देखने पर उसका यह भ्रम नोटबंदी की तरह टूट गया। फिर जवाब ने बताया, ‘साहिब के हिमालयी व्यक्तित्व में नाराज़गी नहीं, वह ओज रचा-बसा है, जो उन्होंने घर से भागने के बाद हिमालय की कंदराओं में तपी होकर पाया है।’ लेकिन सवाल के यह पूछने पर कि जो आदमी अपने घर में नहीं तप सका, वह कंदराओं में कैसे तपा होगा। अच्छे दिनों की आस की तरह जवाब की यह धारणा भी स्वच्छता आंदोलन की उथली नदी में बह गई। सवाल ने अंदेशा व्यक्त किया, ‘कहीं साहिब को यह मलाल तो नहीं कि देर से पैदा होने के कारण वह स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं ले पाए।’ उसने टाईम मशीन इस्तेमाल करने की सलाह देते हुए बताया कि अगर व़क्त को पीछे धकेलते हुए साहिब को आज़ादी की लड़ाई में उतार दिया जाए तो पूरी संभावना है कि वह गांधी, नेताजी, आज़ाद, भगत सिंह को भोथरा सिद्ध करते हुए दो-चार जुमलों में, अकेले ही अंग्रेज़ों से देश के लिए आज़ादी छीन लाएं। इस पर जवाब बोला, ‘अगर साहिब ने स्वतंत्रता आंदोलन में स्वयं के भाग लेने की बात सिद्ध करनी हो तो वह इसे अपनी डिग्रियों की तरह साबित कर सकते हैं।’ सवाल ने पूछा, ‘कहीं साहिब को भारत का पहला प्रधानमंत्री न बन पाने का क्षोभ तो नहीं।’ इस पर जवाब ने उत्तर दिया, ‘साहिब तो अभी भी अपने आपको भारत का पहला प्रधानमंत्री बताते हुए कहते हैं कि वह जहां खड़े होते हैं, लाईन वहीं से शुरू होती है। पुराने प्रधानमंत्रियों ने देश के लिए कुछ नहीं किया, जो कुछ हुआ है वह इन्हीं सात सालों में हुआ है।

बांग्ला देश की स्थापना भी इंदिरा गांधी और भारतीय सेना की बहादुरी और रणनीति से नहीं बल्कि साहिब के बांग्ला देश की आज़ादी की लड़ाई में शामिल होने से हुई है। तुमने मुक्तिवाहिनी के लड़ाकों के साथ साहिब का फोटो नहीं देखा?’ सवाल ने पुनः पूछा, ‘कहीं साहिब समय से पहले विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा स्थापित किए जाने से नाराज़ तो नहीं।’ इस पर जवाब ने ़िफकरा कसा कि जब साहिब विश्व के सबसे बड़े मोटेरा स्टेडियम का नामकरण अपने नाम पर कर सकते हैं तो मूर्ति पर अपना मुखौटा भी लगवा सकते हैं। सवाल ने पूछा, ‘कहीं साहिब नए जहाज़ ़खरीदने के बाद विश्वभ्रमण पर न निकल पाने की वजह से नाराज़ तो नहीं।’ जवाब गंभीर होते हुए बोला, ‘साहिब, बाबा बालक नाथ की तरह अपने मोर पर बैठ कर कहीं भी घूमने निकल जाते हैं। ये जहाज़ तो उन्होंने देश सेवा के लिए ़खरीदे हैं। चुनावों में रैलियों का संबोधन ही तो देश सेवा का दूसरा नाम है।’ सवाल ने पूछा, ‘यह सहकारिता मंत्रालय क्या बला है? क्या अब राज्य सूची के मुद्दे भी केंद्र संचालित करेगा?’ जवाब हंसते बोला, ‘जब केंद्र को अपने केंद्र का पता न हो तो ऐसा ही होता है।’ सवाल ने तंग होते हुए अपना अंतिम प्रश्र फैंका, ‘कम से कम इतना तो बता दो कि साहिब के चेहरे से नाराज़गी कैसे दूर हो सकती है?’ जवाब खिलखिलाते हुए बोला, ‘कैमरा देखते ही साहिब के मुखमंडल की आभा 360 डिग्री बदल जाती है। उनके सिर पर हैडगियर की जगह एक ठू कैमरा फिट करवा दो, फिर देखो, साहिब किसी आशि़क की तरह अपनी माशू़क यानी कैमरे के सामने हमेशा हंसते ही मिलेंगे।’ इतना सुनते ही सवाल ने साहिब के कैमरे के लिए ग्लोबल टेंडर आमंत्रित करने की प्रक्रिया आरंभ कर दी।

पी. ए. सिद्धार्थ

लेखक ऋषिकेश से हैं