साहित्य में गुलेरी जी का योगदान : डा. अदिति गुलेरी, लेखिका साहित्यकार हैं

डा. अदिति गुलेरी

लेखिका साहित्यकार हैं

गुलेरी जी में शैशवकाल से ही अद्भुत प्रतिभा के लक्षण प्रकट होने लगे थे। उनकी बुद्धि बड़ी प्रखर थी। घर में संस्कृतमय वातावरण उपलब्ध हुआ और चार-पांच वर्ष की आयु में ही इन्होंने संस्कृत बोलने का अच्छा अभ्यास कर लिया। बाल्यावस्था में संस्कृत का अभ्यास इनकी माता ने ही करवाया था और संस्कृत के मूर्धन्य विद्वान शिवराम जी के समुचित निर्देशन ने सोने में सुहागे का काम किया। इनकी विलक्षण प्रतिभा, मेधा देखकर बड़े-बड़े विद्वान दंग रह जाते थे…

हिंदी साहित्य की 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक चरण का युग युगांतरकारी परिवर्तनों, परिवर्द्धनों और नव उत्थानात्मक दृष्टियों से सदैव स्मरणीय रहेगा। इस कालखंड में भाषा, साहित्य और रचना-शिल्प की दृष्टि से समृद्धि के साथ-साथ साहित्य की विभिन्न विधाओं के पदार्पण से हिंदी साहित्य भी संपन्न हुआ। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक साहित्योत्थान में पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी का नाम प्रथम पंक्ति के साहित्य सेवियों में लिया जाता है। गुलेरी जी उन हिंदी प्रेमियों में से हैं जिन्होंने स्वभाषा की संगठनात्मक, प्रचारात्मक और रचनात्मक दृष्टि से भरपूर सेवा की। कदाचित इसीलिए उनकी गणना आधुनिक हिंदी साहित्य के कर्णधारों में होती है। राज-सम्मान प्राप्त महान संस्कृतज्ञ, दार्शनिक और लब्ध प्रतिष्ठ विद्वान पंडित शिवराम जी शास्त्री के घर उनकी तृतीय पत्नी लक्ष्मी से अमर कहानीकार चंद्रधर शर्मा गुलेरी का जन्म सात जुलाई 1883 को जयपुर में हुआ। उस दिन शनिवार था। चंद्रधर शर्मा गुलेरी अपने पिता के चिर प्रतीक्षित ज्येष्ठ पुत्र थे। इनकी जन्म कुंडली में कर्क राशि का स्वामी चंद्र था। इसीलिए पिता ने इनका नाम चंद्रधर रख दिया। शिवराम जी के परिवार में मुख्य कार्य पौरोहित्य का था। वह स्वयं तो पुरोहित थे ही, उनके दोनों भाई भी यही काम करते थे। चंद्रधर शर्मा गुलेरी अपने कुल की परंपरानुसार बड़े मेधावी थे। यथा नाम तथा गुण की कहावत को चरितार्थ करके वे अनुदित चंद्रकलाओं की भांति वृद्धि को प्राप्त होकर प्रकाशित होने लगे। गुलेरी जी में शैशवकाल से ही अद्भुत प्रतिभा के लक्षण प्रकट होने लगे थे। उनकी बुद्धि बड़ी प्रखर थी। घर में संस्कृतमय वातावरण उपलब्ध हुआ और चार-पांच वर्ष की आयु में ही इन्होंने संस्कृत बोलने का अच्छा अभ्यास कर लिया। बाल्यावस्था में संस्कृत का अभ्यास इनकी माता ने ही करवाया था और संस्कृत के मूर्धन्य विद्वान शिवराम जी के समुचित निर्देशन ने सोने में सुहागे का काम किया। इनकी विलक्षण प्रतिभा, मेधा देखकर बड़े-बड़े विद्वान दंग रह जाते थे। पांच-छह वर्ष की अवस्था में इन्हें संस्कृत के तीन-चार सौ श्लोक और अष्टाध्यायी के दो अध्याय एवं कई सूत्र कंठस्थ थे। बालक चंद्रधर ने सन् 1893 में महाराजा कालेज जयपुर में प्रवेश लिया। इस प्रकार यहीं से इनकी अंग्रेजी शिक्षा का श्रीगणेश हुआ।  सन् 1897 में उन्होंने द्वितीय श्रेणी में मिडिल पास किया। सन 1899 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एंट्रेंस की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की और सभी रिकार्डों को तोड़कर सर्वप्रथम रहे। इसी वर्ष इन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इनकी अपूर्व सफलता पर महाराजा जयपुर ने जयपुर राज्य की ओर से इन्हें एक स्वर्ण पदक और कई अन्य पुरस्कार प्रदान किए। बालक गुलेरी विविध विषयों के ज्ञानार्जन में रुचि रखते थे। उन्होंने एमए की परीक्षा में तर्कशास्त्र, ग्रीक तथा रोमन, इतिहास, भौतिकी, रसायन शास्त्र, संस्कृत और गणित विषय लिए। एमए की परीक्षा में गद्य के परचे में उन्होंने कलकत्ता के सभी कालेजों में दूसरा स्थान प्राप्त किया था। सन 1902 में जब कर्नल सर स्विंटन जेकब और कैप्टन एएफ गेरेट जयपुर वेधशाला के जीर्णोद्धार के लिए नियुक्त हुए तो उन्हें ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो संस्कृत का प्रकांड पंडित, ज्योतिष शास्त्र का वेत्ता तथा पश्चिम की दो-तीन भाषाओं में भी पारंगत हो। इस कार्य में विदेशियों की सहायता के लिए युवक चंद्रधर शर्मा को चुना गया। लगभग 22 वर्ष की अवस्था में गुलेरी जी का विवाह पद्मावती से हुआ। पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी साहित्याकाश के ऐसे नक्षत्र थे, जो अपनी अमर कथा रचना ‘उसने कहा था’ के द्वारा न केवल अपने समकालीन, बल्कि हिंदी की परवर्ती पीढ़ी के स्मृति पटल पर सदैव अंकित हो गए। उन्होंने मात्र तीन कहानियां- सुखमय जीवन (1911), बुद्धू का कांटा (1915) और उसने कहा था (1915) लिखीं। कहानी कला के विकास क्रम की दृष्टि से हिंदी कहानी के शुरुआती दौर में गुलेरी जी का स्थान निश्चय ही महत्त्वपूर्ण है। इनकी कहानियां कहानी कला के विकास के सिंह द्वार हैं। प्रभाव और प्रेरणा की दृष्टि से इनका स्थान एकांत स्वतंत्र है। अतः ऐतिहासिक एवं कलात्मक दृष्टि से गुलेरी जी की कहानियों का पृथक रूप से अध्ययन-अनुशीलन अलग मूल्य रखता है। साहित्य सर्जक, संस्कृति एवं पुरातत्त्ववेत्ता, प्राच्य विद्याविशारद, प्रकांड भाषाविद, ज्योतिर्विज्ञानी तथा पत्रकार के रूप में गुलेरी जी ने हर क्षेत्र में अपना बहुमूल्य योगदान दिया। उन्होंने समालोचक (1902-1907) तथा काशी नागरी प्रचारिणी पत्रिका (1920-1922) का संपादन भी बड़ी योग्यता से किया। इनके कई पत्र-पत्रिकाओं में शोधपूर्ण लेख तथा निबंध भी प्रकाशित हुए। गुलेरी जी साहित्याकाश का वह धु्रव तारा हैं जिनका लेखन कार्य आने वाली पीढि़यों के लिए सदैव प्रेरणादायी रहेगा।

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