Friday, September 25, 2020 09:16 AM

सामाजिक चिंतन के वर्तमान आयाम में

हिमाचली लेखन

साहित्य के कितना करीब हिमाचल-12

अतिथि संपादक : डा. हेमराज कौशिक

हिमाचल साहित्य के कितना करीब है, इस विषय की पड़ताल हमने अपनी इस नई साहित्यिक सीरीज में की है। साहित्य से हिमाचल की नजदीकियां इस सीरीज में देखी जा सकती हैं। पेश है इस विषय पर सीरीज की 12वीं किस्त…

विमर्श के बिंदु

* हिमाचल के भाषायी सरोकार और जनता के बीच लेखक समुदाय

* हिमाचल का साहित्यिक माहौल और उत्प्रेरणा, साहित्यिक संस्थाएं, संगठन और आयोजन

* साहित्यिक अवलोकन से मूल्यांकन तक, मुख्यधारा में हिमाचली साहित्यकारों की उपस्थिति

* हिमाचल में पुस्तक मेलों से लिट फेस्ट तक भाषा विभाग या निजी प्रयास के बीच रिक्तता

* क्या हिमाचल में साहित्य का उद्देश्य सिकुड़ रहा है?

* हिमाचल में हिंदी, अंग्रेजी और लोक साहित्य में अध्ययन से अध्यापन तक की विरक्तता

* हिमाचल के बौद्धिक विकास से साहित्यिक दूरियां

* साहित्यिक समाज की हिमाचल में घटती प्रासंगिकता तथा मौलिक चिंतन का अभाव

* साहित्य से किनारा करते हिमाचली युवा, कारण-समाधान

* लेखन का हिमाचली अभिप्राय व प्रासंगिकता, पाठ्यक्रम में साहित्य की मात्रा अनुचित/उचित

* साहित्यिक आयोजनों में बदलाव की गुंजाइश, सरकारी प्रकाशनों में हिमाचली साहित्य

विजय विशाल,  मो.-9418123571

आज पूरा विश्व बाजार में तब्दील हो चुका है। इस बाजार में अनवरत तमाशा चलता रहता है-पूंजी का। सभ्यता के विकास के साथ-साथ बाजार का प्रचलन हुआ। वह स्थान जहां तरह-तरह की चीजों की दुकानें हुआ करती थीं, उसे बाजार कहा गया। ध्यातव्य है कि हाट-बाजार में केवल चीजों की खरीद-फरोख्त ही नहीं होती थी, बल्कि ये स्थल सूचना-केंद्र के रूप में भी अपनी भूमिका निभाते थे। जहां भावों का आदान-प्रदान होता था। मानव-बंधन को बढ़ावा मिलता था। बाजार तब भी थे और आज भी हैं। लेकिन तब के और अब के बाजार में कितना अंतर आ गया है? आज के दौर में बाजार ने अपनी स्थानीयता खोकर वैश्विक रूप पा लिया है। बिजली, सड़क, शिक्षा आदि से वंचित गांवों में भी ‘ग्लोबल मार्केट’ की वस्तु बेची जा रही है।

पूरी दुनिया को बाजार में तब्दील करने की संकल्पना बाजारवाद कहलाती है। बाजारवाद में जिस मूल्य को बढ़ाया जाता है, वह है गुड्स की वेल्यू। मानव मूल्य से उसका कोई रिश्ता नहीं है। हम इस बाजार के सामने अपने घुटने टेक देते हैं। नियंत्रण की डोर उसे पकड़ा देते हैं। यह अत्यंत चिंता का विषय है, बाजार तो चाहेगा कि विचार न हों, उनका अंत हो जाए। परंतु इससे व्यथित होते हैं रचनाकार। बाजार और उपभोक्तावाद के दौर में हिमाचल के लेखक क्या सोच रहे हैं, खास करके बाजार की सख्त गिरफ्त के बारे में तथा ‘यूज एंड थ्रो’ वाली मानसिकता के विषय में, इस पर चर्चा अपेक्षित है। हिमाचल की समकालीन कविता अन्याय और अत्याचार, विडंबनाओं के विरोध में खड़ी होकर ललकारने वाली कविता है। यह उपेक्षितों और शोषितों के साथ खड़ी है। बाजार की चाल हो या पूंजी का शोषण, सत्ता की क्रूरता हो या धर्म के नाम पर फैलाई जा रही सांप्रदायिकता, रचनाकारों ने इनका विरोध किया ही है, पाठकों को भी सचेत किया है।

हिमाचल के अनेक कवियों की कविताएं छोटे-मोटे सपनों को एक महान सपने की बुनावट में बदल देने की आकांक्षा की कविताएं हैं। निरंतर साहित्य साधना विशेषकर कविता के क्षेत्र में सृजनशील अनेक कवि अपने समय की तमाम उन चुनौतियों पर पैनी नजर रखे हुए हैं जिन चुनौतियों व स्थितियों का वर्णन इस आलेख के शुरू में किया हुआ है। इनकी कविताओं का फलक विस्तृत है, जिसमें सुरेश सेन ‘निशांत’ व मधुकर भारती जैसे कवि भी थे जो दुर्भाग्य से आज हमारे बीच नहीं हैं। हिमाचली में ऐसे कवियों की एक लंबी फेहरिस्त है जिनकी कविताओं में सामाजिक चिंताओं को भावाभिव्यक्ति मिलती रही है या मिल रही है। इनमें कई वरिष्ठ कवि हैं तो कई नव आगंतुक भी हैं।

श्रीनिवास श्रीकांत, दीनू कश्यप, सुंदर लोहिया, वरयाम सिंह, योगेश्वर शर्मा, कुमार कृष्ण, तुलसी रमण, यादविंद्र शर्मा, कुल राजीव पंत, रेखा वशिष्ठ, चंद्ररेखा ढडवाल, सरोज परमार, रूपेश्वरी शर्मा आदि वरिष्ठ कवि व कवयित्रियां यहां हैं तो गणेश गनी, द्विजेंद्र द्विज, आत्माराम रंजन, नवनीत शर्मा, अजेय कुमार, कुलदीप शर्मा, गुरमीत बेदी, प्रदीप सैनी, मोहन साहिल, विजय विशाल, दिनेश शर्मा, अनंत आलोक, ओम भारद्वाज, पवन चौहान, मनोज चौहान, पवन ठाकुर, अतुल अंशुमाली जैसे अनेकों युवा कवि अपनी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक चिंताओं की इन चुनौतियों से जूझ रहे हैं। हिमाचल की समकालीन हिंदी कविता का विश्लेषण करें तो इतना कहा जा सकता है कि यह कविता समाज के सांस्कृतिक विकास के मार्ग पर रोड़ा डालने वाली ताकतों के विरुद्ध संघर्षरत है। यह चालाक चुप्पी नहीं साधे रहती।

मात्र शब्द उत्पन्न करने वाली मशीन नहीं है यह कविता। यह कविता हमारे समय के संकट से पहचान करवाती है। कविता की तरह हिमाचल की हिंदी कहानी में भी बाजार और उपभोक्तावादी समाज की नियति की चिंता है। बाजार और उपभोक्तावाद के प्रभाव नगरों, महानगरों या कस्बों तक ही सीमित नहीं हैं। पिछले दो दशकों की उथल-पुथल से दूर-दराज के गांव तक प्रभावित हुए हैं। गांव तेजी से बदल रहे हैं। भूमंडलीकरण का बाजार गांव तक पहुंच चुका है।

कहने वाले कहते हैं कि यह विकास का संकेत है। लेकिन बाजार की मूल्यहीनता जब गांव को घेरे रखती है, तब उसे कैसे विकास का नाम दिया जा सकता है? गांव जो प्रेमचंद के साहित्य में थे, आज वैसे नहीं रह गए हैं। प्रेमचंद का गोबर शहर से गांव वापस गया था, परंतु आज के गोबर शहरों की ओर केवल भाग नहीं रहे हैं, बल्कि शहरी बाबू बनने का सपना पालकर जीवन गुजार रहे हैं। हिमाचली कहानीकारों ने मानवीय संबंधों में पसरे बाजारवादी ताकतों, भोगवादी तत्त्वों और उपभोक्तावादी प्रवृत्तियों के चित्रों को रूपायित किया है।

वरिष्ठ कथाकारों में सुंदर लोहिया, योगेश्वर शर्मा, केशव, रेखा, सुशील कुमार फुल्ल, श्रीनिवास जोशी, राजकुमार राकेश, बद्री सिंह भाटिया, सुदर्शन वशिष्ठ, गंगाराम राजी, राजेंद्र राजन, तारा नेगी जैसे अनेक कथाकार हैं तो समकालीन कहानीकारों में एस.आर. हरनोट, मुरारी शर्मा, हंसराज भारती, मृदुला श्रीवास्तव, संदीप शर्मा, मनोज शिव, शेरसिंह जैसे कहानीकार भी हैं जो अपनी रचनाओं में इन वैश्विक समस्याओं को बड़ी प्रमुखता से उठा रहे हैं। जबकि इसी कड़ी में दिवंगत कहानीकारों में रतन सिंह हिमेश, जिया सिद्दीकी, अरुण भारती, केशव चंद्र, नरेश पंडित आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। कविता-कहानी के अतिरिक्त साहित्य की अन्य विधाओं में भी हिमाचल में विचारशील लेखन सामाजिक चिंताओं को केंद्र में रख कर रचा जा रहा है।

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