संसदीय प्रणाली का भ्रष्टाचार: पी. के. खुराना, राजनीतिक रणनीतिकार

पीके खुराना

राजनीतिक रणनीतिकार

एमेजॉन पर उपलब्ध मेरी पुस्तक ‘भारतीय लोकतंत्र : समस्याएं और समाधान’ में इस घटना का विस्तृत विवरण शामिल है। यह कोई छोटा-मोटा खुलासा नहीं है, लेकिन अपने देश में चोर-चोर मौसेरे भाई के ऐसे उदाहरण हमें बार-बार देखने को मिलते हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि ऐसा केवल संसदीय प्रणाली में ही संभव है क्योंकि संसदीय प्रणाली में सरकार ही कानून बनाती है और सरकार ही उन्हें लागू करती है और अगर कहीं सरकार कोई भ्रष्टाचार करे तो अपने भ्रष्ट आचरण को छुपाने के लिए वह संविधान में संशोधन कर सकती है। इस प्रकार वह काम जो कल तक अवैधानिक था, अब रातों-रात अचानक कानून-सम्मत और वैधानिक हो जाता है…

संसद अथवा विधानसभाओं में जब किसी विधेयक यानी बिल पर मतदान होना होता है तो पार्टियां ह्विप जारी करती हैं, जिसके दो अर्थ हैं। पहला कि संबंधित सदस्य सदन में उपस्थित रहें और दूसरा यह कि वे उस बिल पर पार्टी के स्टैंड के मुताबिक वोट दें। हमारे देश में विधायक और सांसद किसी बिल को लेकर अपनी इच्छा से मत नहीं दे सकते, अपने विवेक के अनुसार उस पर टिप्पणी नहीं कर सकते। स्वतंत्र मत रखने वाले लोग महत्त्वपूर्ण हों, प्रभावी हों, लोकप्रिय हों, काबिल हों, तो भी वे उपेक्षित ही रहते हैं, वे चाहे कोई भी क्यों न हों। सुब्रह्मण्यम स्वामी का उदाहरण हमारे सामने है। वे भिन्न-भिन्न जनहित याचिकाओं के माध्यम से अपनी सक्रियता के कारण मीडिया में तो बने हुए हैं, पर पार्टी में उनकी पूछ नहीं है क्योंकि वे अक्सर ऐसी बातें भी कह डालते हैं जो भाजपा के वर्तमान आलाकमान को स्वीकार्य नहीं हैं। सुब्रह्मण्यम स्वामी वित्त मंत्री बनने के लिए मरे जा रहे हैं, कई बार गुहार लगा चुके हैं लेकिन अगर उन्हें इस काबिल नहीं समझा जा रहा तो इसका कारण यही है कि वे स्वतंत्र विचारधारा रखते हैं और भाजपा आलाकमान को लगता है कि वे ‘खतरनाक’ भी साबित हो सकते हैं। आज हर राजनीतिक दल को तोतों की जरूरत है जो बिलों पर मतदान के समय हाथ उठाकर सहमति दे दें, मेजें थपथपाएं और चुप रहें। ‘चुप्पी’ और ‘सहनशीलता’ अब एक ऐसा गुण है जो हर दल के आलाकमान को पसंद है। यही कारण है कि सन् 1990 में दो घंटे के वक्फे में 18 बिल पास हो गए, यानी हर 6 मिनट में एक बिल पास हुआ।

सन् 2001 में तो कमाल ही हो गया जब सिर्फ  15 मिनट में 33 बिल पास कर दिए गए, यानी हर 25 सेकंड में एक बिल पास हुआ। यह क्रम सन् 2008 में एक बार फिर दोहराया गया जब 8 महत्त्वपूर्ण बिल 17 मिनट में पास हो गए और किसी भी बिल पर कोई बहस नहीं हुई। ये आंकड़े लोकसभा के आधिकारिक रिकार्ड में दर्ज हैं। चूंकि बिलों पर स्वतंत्र मत देना संभव नहीं है, इसलिए विधायकों और सांसदों में उन बिलों को लेकर कोई उत्साह नहीं है। वे अपनी पार्टी की नीति के अनुसार मशीनी ढंग से ‘हां’ या ‘न’ कह डालते हैं। परिणाम यह हुआ है कि सरकारों को कैसा भी कानून बनाने और कुछ भी करने की छूट मिल गई है। इसमें एक और तथ्य यह जुड़ गया है कि वित्त विधेयक पर राष्ट्रपति को भी कुछ कहने का अधिकार नहीं है। कानूनन वे उन पर सहमति देने के लिए विवश हैं। यही कारण है कि सन् 2016 में भाजपा की ‘देशभक्त सरकार’ ने चुपचाप एक खेल खेला, जिसका जिक्र बहुत ज्यादा नहीं हो पाया। यह तमाशा शुरू हुआ सन् 2014 में जब दिल्ली उच्च न्यायालय ने पाया कि दो राष्ट्रीय राजनीतिक दलों, भाजपा और कांग्रेस को लंदन में स्थित कुछ कंपनियों से बार-बार फंड आ रहा है, जो कानूनन मान्य नहीं है। न्यायालय ने यह अवैधानिक कृत्य रंगे हाथों पकड़कर चुनाव आयोग को सूचित कर दिया ताकि वह इन दलों यानी भाजपा और कांग्रेस के विरुद्ध उचित कार्रवाई कर सके। अब सरकार सक्रिय हो गई। सन् 2016 में पेश वित्त विधेयक में 2010 एफसीआरए यानी ‘विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम’ (एफसीआरए) में विदेशी स्रोत की परिभाषा बदल दी। यानी सरकार ने बिना कोई संवैधानिक संशोधन बिल पेश किए ही संविधान में संशोधन कर डाला।

 पर यहां एक छोटा-सा फच्चर फिर भी रह गया। मोदी की सरकार ने यह संशोधन 26 सितंबर 2010 की पिछली तारीख से लागू किया था ताकि न्यायालय और चुनाव आयोग के हाथ बंध जाएं, पर बाद में यह पकड़ में आया कि एफसीआरए कानून 5 अगस्त 1976 को अस्तित्व में आया था और यदि यह संशोधन उस तारीख से लागू न किया गया तो भी अवैधानिक विदेशी फंडिंग के कारण भाजपा और कांग्रेस दोनों ही न्यायालय और चुनाव आयोग की जद में आ जाएंगे। फिर क्या था, सरकार ने एक बार फिर कल्पनाशीलता से काम लिया और 6 फरवरी 2018 को जब तत्कालीन वित्त मंत्री श्री अरुण जेतली ने अपना वित्त विधेयक पेश किया तो उसमें बड़ी चालाकी से इस तारीख को फिर से बदल कर 5 अगस्त 1976 कर दिया गया और दोनों दल सुर्खरू हो गए। वित्त विधेयक में शामिल मात्र 34 शब्दों ने भाजपा और कांग्रेस के गैरकानूनी काम को वैधानिक मान्यता दे दी। ये 34 शब्द अंग्रेजी भाषा में थे। राजनीतिक धूर्तता से परिपूर्ण इन 34 शब्दों का भावार्थ है कि सन् 2016 के वित्त विधेयक के सेक्शन 236 के शुरुआती पैराग्राफ में ‘26 सितंबर 2010’ में शामिल शब्दों, अंकों और अक्षरों को ‘5 अगस्त 1976’ से बदल दिया माना जाए। यानी एक बार फिर बिना कोई संविधान संशोधन बिल पेश किए सरकार ने संविधान में संशोधन कर डाला। कांग्रेस ने चुपचाप इस खेल का समर्थन किया क्योंकि विदेशी फंड भाजपा को ही नहीं, कांग्रेस को भी मिलते रहे हैं और दोनों ही दल कानूनन दोषी थे।

एमेजॉन पर उपलब्ध मेरी पुस्तक ‘भारतीय लोकतंत्र ः समस्याएं और समाधान’ में इस घटना का विस्तृत विवरण शामिल है। यह कोई छोटा-मोटा खुलासा नहीं है, लेकिन अपने देश में चोर-चोर मौसेरे भाई के ऐसे उदाहरण हमें बार-बार देखने को मिलते हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि ऐसा केवल संसदीय प्रणाली में ही संभव है क्योंकि संसदीय प्रणाली में सरकार ही कानून बनाती है और सरकार ही उन्हें लागू करती है और अगर कहीं सरकार कोई भ्रष्टाचार करे तो अपने भ्रष्ट आचरण को छुपाने के लिए वह संविधान में संशोधन कर सकती है। इस प्रकार वह काम जो कल तक अवैधानिक था, अब रातों-रात अचानक कानून-सम्मत और वैधानिक हो जाता है। इसके उलट अमरीकी राष्ट्रपति प्रणाली में ऐसा संभव ही नहीं है क्योंकि वहां सरकार कोई विधेयक पेश नहीं करती, सरकार कोई कानून नहीं बनाती, सरकार सिर्फ संसद के बनाए कानूनों के अनुसार काम करती है। संसदीय प्रणाली में ही ऐसा संभव है कि सरकार अपने काले कारनामों को छिपाने के लिए संविधान में मनचाहा संशोधन कर ले। अक्सर तो विपक्ष को भी पता ही नहीं होता कि सरकार ने कौन सा संशोधन कर डाला है। इसके भी दो कारण हैं। पहला तो यह कि सदन में विपक्ष की कोई सार्थक भूमिका न होने के कारण विपक्ष बिलों की ओर ध्यान ही नहीं देता। दूसरे, चूंकि बिल ध्वनि मत से पास हो जाने की प्रथा जोर पकड़ती जा रही है तो कई बार तो सदस्यों के पास विधेयक को देखने तक का समय नहीं होता, उसे पढ़ना और उसकी धाराओं, उपधाराओं को समझना या उन पर कोई विचार कायम कर पाना तो सिरे से ही संभव ही नहीं है। इससे ज्यादा दुखद स्थिति क्या हो सकती है कि संसदीय व्यवस्था में संविधान ही संवैधानिक भ्रष्टाचार की इजाजत देता है?

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