सरकारी टिड्डा और होरी, अशोक गौतम

अशोक गौतम

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गांव आकर होरी सबसे पहले अपने गिरे कच्चे घर का छप्पड़ ठीक करने में जुट गया। अभी वह आधा छप्पड़ ही ठीक कर पाया था कि पता नहीं कहां से टिड्डियों का दल भी वहां आ पहुंचा तो अपने आंचल से टिड्डियों को भगाते धनिया ने होरी से कहा, ‘रे होरी! लगता है बदकिस्मती हमें अब यहां भी नहीं छोड़ने वाली। यहां भी अकाल खाने के दिन आ गए!‘ ‘पगला गई क्या गांव आकर? यहां अब हमारे खेत, फसल ही कहां है जो…’ कह होरी चुपचाप अपने घर का छप्पड़ ठीक करता रहा। तभी होरी ने अपने घर के छप्पड़ से देखा कि भोला अपने खेत की फसल को तबाह करती टिड्डियों से बचाने के लिए थाली, कनस्तर बजाने के बदले उन्हें फटाफट पकड़ता बोरे में डाल रहा है। उसे टिड्डियां भगाने के बदले टिड्डियां पकड़ते देख उसने विस्मित होते भोला से पूछा, ‘रे भोला, ये क्या?’ ‘आत्मनिर्भर होने के लिए टिड्डियां पकड़ रहा हूं।’ ‘आत्मनिर्भर होने के लिए टिड्डियां पकड़़ना नहीं, टिड्डियां मारना जरूरी होता है भोला!’ ‘चल, तू भी पहले मेरे साथ टिड्डियां पकड़, शाम को रोटी खानी है तो। बाद में सब बताऊंगा। ऐसा न हो कि टिड्डियां उड़कर उसके खेत में चली जाएं। पता है सरकार ने टिड्डियों का रेट क्या तय किया है?’ ‘क्या?’ ‘हां! पूरे बीस रुपए की एक किलो।’ ‘बीस रुपए किलो?’ होरी ने जब उसके मुंह से ये सुना तो देखते ही देखते उसने अपना पूरा परिवार टिड्डियों को पकड़ने के लिए उसी के खेत में बटाई पर लगा दिया। बटाई बोले तो आधा उसका तो आधा उसका। होरी ने अपने परिवार के साथ पकड़ी सारी टिड्डियों को एक बोरे में डाला और बिन आराम किए अपनी कमर तहमद से बांध टिड्डियों से भरा बोरा उठाए रेस्ट हाउस रुके नोडल अफसर की ओर चल पड़ा। थकाहारा होरी जब वहां पहुंचा तो उसने टिड्डियों से भरा बोरा नोडल अफसर के चरणों में रख अपनी कमर सीधी करते कहा, ‘ये तोल लो साहेब!’  ‘क्या है इसमें?’ ‘अनाज तो होने से रहा साहेब! आपकी टिड्डियां हैं।’ ‘चल, कांटे पर रख दे।’ टिड्डियों के नोडल अफसर ने बोरे को घूरते कहा तो होरी ने मुस्कुराते हुए टिड्डियों से भरा बोरा पास लगे कांटे पर दे धरा। बोरा पूरा पचास किलो! मतलब, हजार! हजार हाथ में आने की सुखद सोच भर से ही होरी की आंखों की चमक दुगनी हो गई। ‘कितनी हैं?’ ‘साहेब! पूरी पाचस किलो।’ नोडल अफसर के साथ के मजदूर ने कहा। ‘क्या?’ ‘हां साहेब! पूरी पचास किलो।’ ‘बोरे में पत्थर तो नहीं डाल रखे हैं तुमने होरी?’ ‘साहेब! ऐसा करूं तो अगले जन्म में होरी नहीं, गधा बनूं। साहेब! होरी हर जन्म में किसी और बात के लिए जाना गया हो या नए पर अपनी ईमानदारी के लिए वह स्वर्गलोक में भी बखाना जाता रहा है।’ नोडल अफसर ने एक रजिस्टर में कुछ लिख होरी को उस पर अंगूठा लगाने को कहा तो होरी बोला, ‘साहेब दस्तखत!’ ‘ठीक है। ले कर।’ रजिस्टर पर हजार वाले खाने में होरी से दस्तखत करा उसने सरकारी बैग से हजार के बदले पांच सौ निकाल होरी को दिए और उसके वहां होने पर भी उसकी ओर से बेखबर हो वहीं इधर-उधर घूमने सा लगा। होरी को तय था कि वह पांच सौ उसे अभी और देगा। सो हाथ में पांच सौ ले वहीं रुका रहा। पर सरकार के टिड्डियों के खरीद अफसर ने जब बड़ी देर तक उससे कोई बात नहीं की तो होरी ने ही हाथ जोड़े, पूछा, ‘साहेब! बाकी पांच सौ?’ ‘टिड्डा खा गया। अब खुश! अब जाता है या…’

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