Friday, September 24, 2021 07:56 AM

कबाड़ी का सिक्का

सिक्का जमाना और सिक्का ढूंढ लाना उतना ही मुश्किल है जितना खुद सिक्का हो जाना है, फिर भी असली सिक्का तो वह है जिसे किसी कबाड़ से खोज लाएं। हैरत होती है कि अब सरकारी नौकरी दरअसल कबाड़ से सिक्का खोजने की प्रतियोगिता ही तो है। कई बार खुशी होती है कि जिन सरकारी स्कूलों को हम कोसते रहे, उन्हीं से कोई न कोई बड़ा नेता निकल आता है। भारत में भले ही जन्म से मृत्यु तक चलना कबाड़ से जूझना है, लेकिन जिस दिन कोई कबाड़ी वास्तव में आपको चुन लेगा, आपका सिक्का जम जाएगा। इसलिए कबाडि़यों पर भरोसा करो और सोचो कि आजादी के बाद इन्हीं की बदौलत सिक्के चल रहे हैं। लीडरशिप में कबाड़ी मानसिकता बेहद जरूरी है, क्योंकि कबाड़खाने में हमेशा अपनी ही तूती बोलती है। एक बड़ा कबाड़ी अपनी संपत्ति बढ़ाते हुए यह नहीं सोचता कि वह किस तरह की गंदगी में हाथ डाल रहा है। उसे हर गंदगी मंजूर है, बशर्ते गंदगी भी संपत्ति की तरह तोली जा सके।

 हमने पश्चिम बंगाल में सारी गंदगी को जिस तराजू पर तोलते हुए देखा, उससे पता चलता है कि वास्तव में हमारा लोकतंत्र भी अब एक तरह की संपत्ति है। उम्मीद करनी होगी कि आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में हम फिर से गंदगी बटोरेंगे और लोकतंत्र को अपनी निजी संपत्ति बना लेंगे। देश के बुद्धिजीवियों को नहीं मालूम कि जिस सिक्के को खोजते-खोजते वे दरकिनार हो रहे हैं, दरअसल वह अब कबाड़ी के पास मिलेगा या किसी गंदगी के ढेर के नीचे दबा होगा। मैं तो अपने गली के कबाड़ी पर भरोसा ही नहीं करता, बल्कि उसके भीतर देश को देखने लगा हूं। आवाजें देता हुआ कबाड़ी, दरअसल नेता की तरह देश को बटोर रहा होता है। अब किसी राजनीतिक मंच पर शक नहीं होता और न ही बदबू का आलम दिखाई देता है, बल्कि एक भरोसा है कि जब सारी गंदगी के ढेर इस मंच पर बिक जाएंगे, तो देश कितनी दूर तक साफ नजर आएगा। कबाड़ी अब भारतीय पुरुषार्थ का अनडिवाइडिड डिवीडेंट है। देश का सबसे बड़ा पुरुषार्थ देखना हो तो हर सत्ता को कबाड़खाने की तरह देखो, फिर मालूम होगा कि अगर यह कबाड़ हम करोड़ों भारतीयों को मंजूर है, तो इसकी वजह हमारी औकात है।

 कबाड़ी को गूंजते हुए सुनना है, तो कबाड़खाने की धुन में बजते सामान को सुनो। दरअसल असली नेता जब धुन में होता है, तो चारों तरफ मौजूद कबाड़खाने ही बज रहे होते हैं। भारतीय नेताओं के बीच लोकप्रियता का अंतर भी यही है और यह हर घर की गंदगी से पूछो कि उसे हर दिन सबसे पहले किसका इंतजार होता है। हर घर की मालकिन रोज सुबह अपने कूड़े को ठिकाने लगा रही होती है, तो एक संवाद पैदा होता है। एक अजीब सा संतोष और कबाड़ी भाई के प्रति कृतज्ञता का आभास। देश यूं तो हर घर में गंदा हो रहा है। हम सभी रात-दिन अपनी गंदगी से जूझते हैं और फिर सोचते हैं कि हमारे सामने कोई अवतार आकर उद्धार कर दे। यह गलत है और नामुमकिन भी, क्योंकि हमें ऐसा फेरी लगाने वाला कबाड़ी चाहिए जो हमसे सीधा राफ्ता कायम करे। इसलिए वही नेता चलेगा जो फेरी लगा कर हमारी गंदगी से रूबरू होगा। कबाड़ी की भाषा में हमें मोहित करेगा और हम विश्वास करेंगे कि जो गंदगी उठा सकता है, हमें भी उठा लेगा। गंदगी में जो देश ढूंढ सकता है या देश को हर तरह की गंदगी में अपने होने का भरोसा दिला सकता है, वह वास्तव में सिक्का है। यही सिक्के चल रहे हैं और करोड़ों गंवार लोग पढ़ व सोच कर और गंवार हो रहे हैं। देश की गंदगी में उतर जाओ, कोई आपसे फिर यह नहीं पूछेगा कि आप कितने गंदा हो। फिर कोई कबाड़ी आएगा और आगामी चुनाव की गंदगी में हम उसे चुन लेंगे, सदा की तरह।

निर्मल असो

स्वतंत्र लेखक