Friday, September 24, 2021 07:36 AM

कठघरे में राजद्रोह कानून

भारत के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति एन.वी.रमण, न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना और न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय की न्यायिक पीठ ने केंद्र सरकार से पूछा है कि देश की आज़ादी के 75वें साल में राजद्रोह कानून की ज़रूरत क्या है? जिस तरह अन्य अनावश्यक और अप्रासंगिक कानून समाप्त किए गए हैं, उसी तरह यह कानून भी हटाया क्यों नहीं जा सकता? यह अंग्रेजी हुकूमत के दौरान का औपनिवेशिक कानून है, जिसकी भारत जैसे लोकतंत्र में क्या ज़रूरत है? 1870 के राजद्रोह कानून के जरिए स्वतंत्रता संघर्ष को दबाने की कोशिशें की गईं। महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों पर बार-बार राजद्रोह कानून थोपा गया, ताकि उन्हें खामोश कराया जा सके। आज आईपीसी की धारा 124-ए का दुरुपयोग खतरनाक स्तर पर किया जा रहा है। किसी सुदूर गांव में कोई पुलिस वाला इस कानून के प्रावधानों का इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन उसकी जवाबदेही कुछ भी तय नहीं है। प्रधान न्यायाधीश ने 124-ए की तुलना आरी से की, जिसका इस्तेमाल एक बढ़ई पेड़ काटने के बजाय जंगल साफ करने के लिए करता है। यह कानून लोकतंत्र और संस्थाओं के संचालन के लिए गंभीर खतरा है, लिहाजा इसे हटाने में क्या दिक्कत है? प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने सेवानिवृत्त मेजर जनरल एस.जी.वोम्बटकेरे की याचिका समेत कुछ अन्य जनहित याचिकाओं की सुनवाई हो रही थी, जिनमें राजद्रोह कानून की संवैधानिकता को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ बताते हुए चुनौती दी गई है।

 वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी ने भी एनजीओ ‘कॉमन कॉज’ के जरिए इस कानून को ‘असंवैधानिक’ करार दिया है। इस तरह न्यायिक पीठ ने भारत सरकार को, राजद्रोह कानून के मद्देनजर, सवालों के कठघरे में खड़ा किया है। सरकार को जवाब देना ही पड़ेगा। हालांकि देश के एटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने यह जरूर कहा है कि राजद्रोह कानून को खत्म करने की ज़रूरत नहीं है, अलबत्ता नए दिशा-निर्देश जारी किए जा सकते हैं, ताकि कानून के दुरुपयोग को रोका जा सके। इस पर प्रधान न्यायाधीश की टिप्पणी थी कि दिशा-निर्देश से हल नहीं निकलने वाला है। आईटी एक्ट की धारा 66-ए को निरस्त करने के बावजूद देश भर में पुलिस इसके तहत ही केस दर्ज कर रही है। इन प्रावधानों के दुरुपयोग की जवाबदेही नहीं है। बहरहाल गंभीर सरोकार यह है कि राजद्रोह कानून हरेक सरकार को ‘प्रिय’ रहा है, लिहाजा आजादी के बाद भी इतने गले-सड़े कानून को बरकरार रखा गया, जबकि ब्रिटिश सरकार ने इसे निरस्त कर दिया है। बीते 10 साल के दौरान करीब 11,000 मामले राजद्रोह या देशद्रोह की धारा 124-ए के तहत दर्ज किए गए। मौजूदा मोदी सरकार के 2014-19 तक के कार्यकाल के दौरान 326 केस दर्ज किए गए, जिनमें 559 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया, लेकिन मात्र 10 को ही ‘दोषी’ तय किया जा सका। करीब 96 फीसदी मामले नेताओं और व्यवस्था की आलोचनाओं के मद्देनजर दर्ज किए गए।

 सजा की दर मात्र 3 फीसदी....! यदि लोकतांत्रिक देश में आम आदमी की आवाज़ इसी तरह दबाई जाती रही और औपनिवेशिक कानून का खौफ हावी रहा, तो संविधान के उन अनुच्छेदों का क्या होगा, जिनमें देश के नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं? सर्वोच्च न्यायालय के सामने कमोबेश यही यक्ष-प्रश्न है! हालिया दौर में वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ समेत कुछ अन्य प्रदर्शनकारियों के खिलाफ इस कानून का इस्तेमाल किया गया। यह दीगर है कि अदालतों में वे मामले टिक नहीं सके। अदालत ने या तो वे मामले खारिज कर दिए अथवा आरोपितों को जमानत पर रिहा करवा दिया। लेकिन यही समाधान नहीं है। बुनियादी सरोकार सरकार से सवाल पूछने का है, उसकी नीतियों और घोषणाओं से असहमति का है और उनका सार्वजनिक विरोध करने का है, लिखने और बोलने की आज़ादी का है। यदि यही औसत नागरिक से छीन लिया जाता है, तो फिर लोकतंत्र बेमानी है। भारतीय दंड संहिता में धारा 124-ए की परिभाषा में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति सरकार-विरोधी सामग्री लिखता या बोलता है अथवा ऐसी सामग्री का समर्थन करता है, राष्ट्रीय चिह्नों का अपमान करने के साथ संविधान को नीचा दिखाने की कोशिश करता है, तो उसके खिलाफ धारा 124-ए में राजद्रोह का मामला दर्ज किया जा सकता है। बहरहाल ऐसी परिभाषा भी अत्यंत खोखली है, नतीजतन ज्यादातर मामले ध्वस्त हो जाते हैं। अब न्यायिक पीठ ने कहा है कि इस कानून की संवैधानिकता को परखना होगा। यह कवायद किस स्तर पर होगी, यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा, क्योंकि संसद सत्र भी 19 जुलाई से आरंभ हो रहा है।