Tuesday, December 07, 2021 05:45 AM

इंसाफ मांगे ‘मिनी पंजाब’

उप्र के लखीमपुर खीरी को ‘मिनी पंजाब’ भी कहते हैं। जिले की आबादी में करीब 6.5 लाख सिख हैं, जो उप्र में सबसे ज्यादा सिख आबादी है। वे किसान आंदोलन में सिखों का समर्थन करते आए हैं। उस इलाके में सिख पहचान और उसके कृषि संबंधी अधिकारों की गूंज सुनाई देती रही है। उप्र के इस क्षेत्र में जातीय और धार्मिक विभाजन की स्थितियां हैं। हिंदू तथा उच्च वर्ग के अन्य समुदाय इन सिख किसानों को ‘अतिवादी’ करार देते हैं, क्योंकि किसान आंदोलन को लेकर उनमें स्पष्ट विरोधाभास हैं। अधिकतर सिख परिवार भारत-विभाजन के बाद पाकिस्तान से भाग कर यहां आए और तराई के इस इलाके में बस गए। वे शुरू से ही अल्पसंख्यक रहे हैं। सिखों ने इलाके के आदिवासियों और स्थानीय लोगों से ज़मीनें खरीदीं और खेती का दायरा बढ़ाते रहे। अलबत्ता उप्र सरकार ने एक कानून पारित कर आदिवासियों से ज़मीन खरीदने पर पाबंदी लगा दी थी। ज़मीन पर आदिवासियों का ही हक घोषित किया गया। चूंकि लखीमपुर के सिख किसान पंजाब, हरियाणा, दिल्ली की सीमाओं पर और पश्चिमी उप्र में जारी किसान आंदोलन के समर्थक रहे हैं और सार्वजनिक तौर पर विवादित कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन करते रहे हैं, लिहाजा प्रतिक्रिया में आंदोलन-विरोधी भी उग्र होते रहे हैं। बीती तीन अक्तूबर का मौत-कांड या हत्याकांड उसी विरोध और टकराव की एक परिणति है।

 सिखों को लेकर भी सियासत शुरू हो चुकी है, लेकिन मृतकों के परिजन सिर्फ इंसाफ़ चाहते हैं। उन्हें मुआवजा नहीं चाहिए, लेकिन न्यायालय की निगरानी में एक तटस्थ और ईमानदार जांच की उन्हें दरकार है। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी पंजाब के दलित-सिख मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को साथ लेकर लखीमपुर में पीडि़त परिजनों से मिलने गए। उनके साथ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और प्रियंका गांधी वाड्रा भी थे। दोनों मुख्यमंत्रियों ने मृतक किसानों के परिजनों को 50-50 लाख रुपए देने की घोषणा की है, जबकि उप्र सरकार ने सभी मृतकों, पत्रकार और भाजपा कार्यकर्ता समेत, के परिवारों को 45-45 लाख रुपए के चेक सौंप भी दिए हैं। घायलों को भी 10 लाख रुपए दिए जा रहे हैं। मुआवजे की सियासत बिल्कुल स्पष्ट है। पंजाब में राजनीतिक तौर पर सक्रिय ‘आप’ के नेता भी पीडि़त परिवारों की दहलीज़ तक गए और फोन पर दिल्ली के मुख्यमंत्री एवं ‘आप’ के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल से भी बात कराई। संवेदना और सहानुभूति के सिलसिले जारी हैं, क्योंकि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा आदि भी पीडि़तों के आंसू पोंछ चुके हैं। पंजाब में फरवरी और उप्र में अप्रैल, 2022 में चुनाव हैं, लिहाजा सिख किसानों का वोट बैंक याद आ रहा है। सभी किसानवादी बनने की हुंकार लगा रहे हैं।

 पंजाब के कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने भी 200 गाडि़यों का काफिला लखीमपुर तक ले जाने का ऐलान किया है। उत्तराखंड से 1000 गाडि़यां लखीमपुर जाएंगी, ऐसा दावा पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने किया है। हरियाणा की कांग्रेस अध्यक्ष सैलजा ने भी पानीपत से वाहनों का काफिला कूच कराने की घोषणा की है। पीडि़तों को दिलासा देने की कोशिश की जा रही है अथवा उनके घरों से कुछ दूर सियासी मेला आयोजित करने की कवायद है? पुलिस प्रशासन ने 5-5 नेताओं के समूह को ही पीडि़त परिवारों तक जाने की अनुमति दी है, तो बाकी गाडि़यां भीड़ के अलावा और क्या भूमिका अदा कर सकती हैं? गौरतलब यह है कि जब कांग्रेस आलाकमान राहुल और प्रियंका गांधी, पंजाब और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों समेत, पीडि़त परिजनों से मुलाकात कर चुके हैं और प्रियंका तो बहराइच भी गई हैं, तो कांग्रेस नेता अपने-अपने काफिले ले जाकर क्या  साबित करना चाहेंगे? इस तरह कांग्रेस उप्र में अपनी प्रासंगिकता को बचाए नहीं रख सकती। उसके लिए कई और मुद्दे और विभिन्न वोट बैंकों का समर्थन जुटाना जरूरी है। बहरहाल राज्यपाल ने उच्च न्यायालय के रिटायर्ड न्यायाधीश प्रदीप श्रीवास्तव की अध्यक्षता में आयोग गठित कर दिया है और उसका कार्यकाल दो माह तय किया गया है। समूची जांच उनके ही निर्देशन में होगी। इधर सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय न्यायिक पीठ ने सुनवाई शुरू कर दी है। कमोबेश न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा होना चाहिए।