Friday, September 25, 2020 09:09 AM

सेज को प्रभावी बनाना जरूरी: डा. जयंतीलाल भंडारी, विख्यात अर्थशास्त्री

डा. जयंतीलाल भंडारी

विख्यात अर्थशास्त्री

गौरतलब है कि देश में वर्ष 2000 से शुरू हुई सेज की अवधारणा का मकसद निर्यात आधारित इकाइयों को विशेष प्रोत्साहन देना है। निर्यात को बढ़ाने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था को गति देने और रोजगार के अवसर बढ़ाना भी सेज का प्रमुख उद्देश्य है। सेज के तहत निर्यात आधारित उद्योगों को न्यूनतम कागजी कार्यवाही और नियमों के साथ अच्छे इन्फ्रास्ट्रक्चर और आकर्षक वित्तीय सुविधाएं देने की व्यवस्था की गई है। सेज का मकसद घरेलू और विदेशी निवेशकों को आकर्षित करना है। ज्ञातव्य है कि देश में मार्च 2020 के अंत तक 238 सेज के तहत 5000 से अधिक औद्योगिक इकाइयां काम कर रही हैं, जिनमें 21 लाख से अधिक लोग काम कर रहे हैं…

यकीनन इस समय चीन को आर्थिक मोर्चे पर टक्कर देने के लिए सरकार के द्वारा देश में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को अधिकतम प्रोत्साहन और निर्यात में तेज वृद्धि की जाना जरूरी है। इस परिप्रेक्ष्य में देश में कार्यरत विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी स्पेशल इकोनॉमिक जोन (सेज) को प्रभावी बनाया जाना आवश्यक दिखाई दे रहा है। गौरतलब है कि कोविड-19 के बीच दुनिया में चीन के प्रति बढ़ी हुई नकारात्मकता के मद्देनजर इस समय वैश्विक निर्यात बाजार में भारत के कदम आगे बढ़ाने तथा चीन से निकलती वैश्विक निर्यातक कंपनियों को भारत की ओर आकर्षित करने के लिए सेज का अधिकतम उपयोग किया जाना होगा। साथ ही तटीय आर्थिक क्षेत्र (सीईजेड) की नई स्थापना को मूर्तरूप दिया जाना होगा। ऐसा किए जाने पर भारत वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग और वैश्विक निर्यात के हब के रूप में उभरकर दिखाई दे सकता है।

निःसंदेह भारत के अब तक निर्यात मोर्चे पर पीछे रहने के मद्देनजर एक बड़ा कारण सेज का अपने मकसद में कामयाब नहीं होना भी है। हाल ही में प्रकाशित विदेश व्यापार संबंधी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2019-20 में देश से किया गया निर्यात 314 अरब डॉलर का रहा है, जो लक्ष्य से बहुत कम है। गौरतलब है कि देश में वर्ष 2000 से शुरू हुई सेज की अवधारणा का मकसद निर्यात आधारित इकाइयों को विशेष प्रोत्साहन देना है। निर्यात को बढ़ाने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था को गति देने और रोजगार के अवसर बढ़ाना भी सेज का प्रमुख उद्देश्य है। सेज के तहत निर्यात आधारित उद्योगों को न्यूनतम कागजी कार्यवाही और नियमों के साथ अच्छे इन्फ्रास्ट्रक्चर और आकर्षक वित्तीय सुविधाएं देने की व्यवस्था की गई है। सेज का मकसद घरेलू और विदेशी निवेशकों को आकर्षित करना है। ज्ञातव्य है कि देश में मार्च 2020 के अंत तक 238 सेज के तहत 5000 से अधिक औद्योगिक इकाइयां काम कर रही हैं, जिनमें 21 लाख से अधिक लोग काम कर रहे हैं।

सेज में करीब 5.37 लाख करोड़ रुपए का निवेश किया गया है। पिछले वित्त वर्ष 2019-20 में सेज इकाइयों से करीब 7.85 लाख करोड़ रुपए का निर्यात किया गया था। विभिन्न अध्ययन रिपोर्टों में पाया गया है कि सेज से निर्यात बढ़ाने के लक्ष्य की प्राप्ति असंतोषजनक रही है। भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग मंडल (एसोचैम) की सेज से संबंधित एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में जितने सेज हैं, उनमें आधे से अधिक बेकार पड़े हैं और निर्यात बढ़ाने में सेज अधिक उपयोगिता सिद्ध नहीं कर पाए हैं। यदि हम सेज के अब तक के कार्यकलापों का अध्ययन करें तो पाते हैं कि बड़ी संख्या में सेज की अधिसूचना रद्द किए जाने तथा अधिसूचित सेजों के खाली पड़े रहने का कारण इसके तहत दिए जाने वाले कर लाभ एवं छूट को लेकर नीतियों की अस्थिरता प्रमुख कारण है।

यदि हम पिछले पांच वर्षों के बजट प्रावधानों को देखें तो पाते हैं कि सेज के लिए अनुकूल प्रावधान नहीं होने से सेज से निर्यात वृद्धि के लक्ष्य पूरे नहीं हो सके। निःसंदेह इस समय सेज के अच्छे प्रस्तुतीकरण से भारत के लिए फिनिश्ड उत्पादों के नए हब बनने और देश से निर्यात बढ़ाने की संभावनाओं को साकार किया जा सकता है। हाल ही में प्रख्यात वैश्विक कंपनी ब्लूमबर्ग के द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना वायरस महामारी के कारण चीन के प्रति नाराजगी से चीन में कार्यरत कई वैश्विक निर्यातक कंपनियां अपने मैन्युफैक्चरिंग का काम पूरी तरह या आंशिक रूप से चीन से बाहर स्थानांतरित करने की तैयारी कर रही हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन से बाहर निकलती कंपनियों को आकर्षित करने के लिए भारत इन्हें बिना किसी परेशानी के जमीन मुहैया कराने पर काम कर रहा है।

खासतौर से जापान, अमरीका, दक्षिण कोरिया और ब्रिटेन की कई कंपनियां भारत को प्राथमिकता देते हुए दिखाई दे रही हैं। ये चारों देश भारत के टॉप-10 ट्रेडिंग पार्टनर्स में शामिल हैं। चूंकि इस समय दुनिया में दवाओं सहित कृषि, प्रोसेस्ड फूड, गारमेंट, जेम्स व ज्वैलरी, लेदर एवं लेदर प्रोडक्ट, कारपेट और इंजीनियरिंग प्रोडक्ट जैसी कई वस्तुओं के निर्यात की अच्छी संभावनाएं हैं। अतएव ऐसे निर्यात क्षेत्रों के लिए सरकार के रणनीतिक प्रयत्न लाभप्रद होंगे। इसमें कोई दो मत नहीं है कि भारतीय फार्मा उद्योग पूरी दुनिया में अहमियत रखता है। भारत अकेला एक ऐसा देश है जिसके पास यूएसएफडीए के मानकों के अनुरूप अमरीका से बाहर सबसे अधिक संख्या में दवा बनाने के प्लांट हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि भारत के आईफोन मैन्युफैक्चरिंग और इसके निर्यात क्षेत्र में आगे बढ़ने की संभावनाएं तेजी से बढ़ती जा रही हैं। आईफोन बनाने वाले दुनिया के दो बड़े कॉन्ट्रेक्टर्स फॉक्सकॉन और विस्ट्रॉन ने भारत सरकार की ओर से घोषित प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना में आवेदन किया है।

ऐसे में सरकार के द्वारा इन्हें अनुमति दी जाने पर भारत आईफोन का सबसे बड़ा हब बन सकता है और भारत से इसके निर्यात तेजी से बढ़ाए जा सकते हैं। निःसंदेह दुनिया के निर्यात बाजार में चीन को टक्कर देने के लिए जहां एक ओर सेज को प्रभावी बनाना होगा, वहीं दूसरी ओर बंदरगाहों के आसपास सीईजेड की नई स्थापना को मूर्तरूप दिया जाना होगा। कई रिपोर्टों में यह पाया गया है कि सेज के उत्पादन को किसी नजदीकी बंदरगाह तक ले जाने में लॉजिस्टिक और कनेक्टिविटी की बड़ी समस्या आती है। ऐसे में यदि देश के पूर्वी और पश्चिमी तटों पर दो-दो, तीन-तीन सीईजेड को उपयुक्त बुनियादी ढांचे के साथ विकसित किया जाए तो इससे लॉजिस्टिक्स और कनेक्टिविटी की समस्या काफी सीमा तक दूर हो सकती है। सीईजेड के कारण विदेशों से कच्चे माल के आयात तथा विदेशों के लिए तैयार माल के निर्यात में आसानी हो सकती है। विश्व के अनेक देशों के साथ कारोबार बढ़ाने का अवसर भी मिल सकता है। इससे निर्यात बढ़ाने, अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्राप्त करने तथा रोजगार के अवसर बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।

निश्चित रूप से देश से निर्यात बढ़ाने के लिए सरकार के द्वारा एक ओर चीन को भेजे जा रहे कच्चे माल के निर्यात पर सख्ती की जाए, जरूरत पड़ने पर उन  पर उपकर भी लगाए जाएं तथा दूसरी ओर ऐसे कच्चे माल पर आधारित उत्पादन को अधिकतम प्रोत्साहन दिए जाएं और उनके निर्यात बाजार में नई उपस्थिति दर्ज कराई जाए। इसी तरह पूरी दुनिया के कई देशों में चीन के प्रति फैली नकारात्मकता का फायदा लेते हुए उन देशों में उपयोग किए जा रहे विभिन्न चीनी सामानों के विकल्प बनाने के लिए भारतीय सामानों को गुणवत्ता के साथ आगे बढ़ाने के अधिकतम प्रयास किए जाने चाहिए। खास तौर से अमरीका, यूरोपीय संघ, जापान, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में भारतीय उत्पाद चीनी सामानों का स्थान ले सकते हैं। इन देशों में भारत विभिन्न वस्तुओं मसलन रेडिमेड गारमेंट, टेक्सटाइल, लेदर आदि का निर्यात सरलतापूर्वक बढ़ा सकता है। हम उम्मीद करें कि सरकार सेज को उपयोगी बनाने, देश में आधे से ज्यादा बेकार पड़े सेज को सक्रिय बनाने तथा सीईजेड की शीघ्रतापूर्वक नई स्थापनाओं की डगर पर आगे बढ़ेगी।

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