Saturday, September 19, 2020 09:03 PM

सेना में स्वदेशी

बीती नौ अगस्त को ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की 78वीं सालगिरह थी। 1942 में गांधी जी के नेतृत्व में आह्वान किया गया था कि अंग्रेज भारत को छोड़ कर चले जाएं, लेकिन 2020 में चीन को भारतीय बाजार से खदेड़ने का अभियान अब ‘जन आंदोलन’ बन चुका है। ऐसे ऐतिहासिक मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने स्वदेशी हथियार और रक्षा उपकरण खुद ही बनाने का निर्णय सुनाया और परोक्ष रूप से ‘आत्मनिर्भर आजादी’ का आह्वान किया।  भारत सरकार ने तय किया है कि 101 रक्षा उपकरणों और अस्त्रों के आयात पर पाबंदी थोपी जाएगी। यह प्रक्रिया दिसंबर, 2020 से शुरू होकर दिसंबर, 2025 में समाप्त होगी। यानी रक्षामंत्री  चाहते हैं कि इन पांच सालों में रक्षा उद्योग की भारतीय कंपनियां पूरी तरह सक्षम हो जाएं, ताकि आयात पर पूरी तरह ढक्कन लगाया जा सके और अपने ही देश में उद्योग के एक और बाजार का विस्तार हो सके।

देश को अर्थव्यवस्था के स्तर पर फायदा होगा और बेशक नए निर्माण, उत्पादन शुरू होंगे, तो रोजगार का बढ़ना भी स्वाभाविक है। सरकार ने इसके लिए 52,000 करोड़ रुपए के बजट का प्रावधान किया है। रक्षा मंत्री ने आश्वस्त किया है कि आने वाले 5-7 सालों में चार लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के ऑर्डर भारतीय कंपनियों को दिए जाएंगे। यह भी स्पष्ट किया गया है कि अब हल्के लड़ाकू हेलीकॉप्टर, मालवाहक विमान, पारंपरिक पनडुब्बी, क्रूज मिसाइल के साथ-साथ रडार, ऑर्टिलरी गन, अपतटीय गश्ती जहाज, इलेक्ट्रॉनिक युद्धक प्रणाली, अगली पीढ़ी के मिसाइल पोत, फ्लोटिंग डॉक, कम दूरी के समुद्री टोही विमान, असॉल्ट राइफल आदि अस्त्र और युद्धक उपकरण देश में ही बनाए जाएंगे। अत्याधुनिक हथियारों, विमानों और युद्धक प्रणाली आदि के लिए हम रूस, अमरीका, फ्रांस और इजरायल आदि देशों के भरोसे रहे हैं।

अब रक्षा मंत्री के जरिए भारत सरकार चाहती है कि डीआरडीओ सरीखे रक्षा संस्थानों ने जो तकनीक और क्षमताएं हासिल की हैं, उनके आधार पर ही ‘स्वदेशी अस्त्र’ बनाने की शुरुआत की जाए। धीरे-धीरे उत्पादन स्वदेशी  होगा, तो प्रौद्योगिकी भी विकसित होती रहेगी। कमोबेश रक्षा उपकरणों के स्वदेशीकरण से हमारे अरबों रुपए बचेंगे, क्योंकि भारत हथियारों के बाजार में दुनिया के पहले तीन बड़े आयातक देशों में शामिल रहा है। बीते पांच सालों में ही 16 अरब डॉलर से अधिक का आयात किया जा चुका है। हम 70 फीसदी से अधिक हाईटेक रक्षा हार्डवेयर-विमान, समुद्री जहाज, पनडुब्बी और मिसाइल आदि-तो रूस, जापान, अमरीका और इजरायल आदि देशों से आयात करते हैं। कमोबेश आत्मनिर्भरता की कोई ठोस शुरुआत तो की जाए। बेशक रक्षा मंत्रालय का यह निर्णय बेहद महत्त्वपूर्ण और परिवर्तनकारी साबित हो सकता है।

भारत हथियारों, अत्याधुनिक विमानों और उनके छोटे-छोटे उपकरणों तथा तकनीकों के लिए विदेशों का मोहताज रहा है। भारत रक्षा सामानों का आयातक ही नहीं, महत्त्वपूर्ण निर्यातक भी है। हम अमरीका, फ्रांस, जर्मनी और फिनलैंड, ऑस्टे्रलिया, इजरायल और साउथ अफ्रीका समेत कुल 42 देशों को रक्षा उपकरण निर्यात भी करते हैं। बेशक ये उपकरण और मिसाइलें आदि अपेक्षाकृत छोटे होते हैं, लेकिन सेनाओं के लिए एक छोटा-सा हेलमेट भी ‘कवच’ के समान है। अब इस निर्यात को पांच अरब डॉलर तक बढ़ाने का लक्ष्य तय किया गया है। हालांकि 2005 में भारत ने अपनी जरूरत के हथियारों का 70 फीसदी हिस्सा देश में ही बनाने का लक्ष्य रखा था। अभी यह करीब 35 फीसदी तक ही पहुंच पाया है। यानी लक्ष्य का 50 फीसदी ही पूरा किया जा सका है।

वर्ष 2010 से 2014 के दौरान विश्व हथियार आयात में भारत का हिस्सा करीब 15 फीसदी था। अब यह कुछ कम हुआ होगा! बहरहाल भारत की निगाहें और दृष्टि भविष्य के युद्ध पर टिकी होंगी, लिहाजा उसी के मद्देनजर सेनाओं में भी स्वदेशीकरण और आत्मनिर्भरता की ठोस पहल की जा रही है। भारतीय रक्षा कंपनियों ने विमान बनाए हैं, डीआरडीओ ने ताकतवर मिसाइलों के परीक्षण कर देश को सशक्त किया है। भारतीय कंपनियां अनजान नहीं हैं। उन्हें बाजार की भी चिंता नहीं है, क्योंकि जो भी वे बनाएंगी, सरकार और सेना उसे खरीद लेंगी। फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय को बहुत पहले ठोस रूप से लागू किया जाना चाहिए था, क्योंकि युद्ध के तरीके और आयाम बदल चुके हैं। भारत को रोबोट सरीखे कृत्रिम बौद्धिकता के युद्ध की तैयारी भी करनी चाहिए। फिर भी इस स्वदेशी कदम का हम स्वागत करते हैं। इस संदर्भ में विरोधियों की परवाह नहीं करनी चाहिए, क्योंकि मामला राष्ट्रीय सुरक्षा का है।

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