Friday, October 30, 2020 03:46 AM

शिक्षा में हिमाचल की मातृभाषा

हो सकता है नई शिक्षा नीति अपनाने में हिमाचल सबसे आगे निकल कर केंद्रीय मदद की अभिलाषा पाल ले या शालीन राज्य की उपमा में उदाहरण बनकर कबूल है-कबूल है की रट लगा दे, फिर भी नए सफर की मंजिल इतनी आसान नहीं। विधानसभा के मानसून सत्र में नई शिक्षा नीति पर पक्ष और प्रतिपक्ष को सुना जाए तो ऐसी कोई चर्चा नहीं हुई, जिस पर आगे चलकर हमारे भविष्य की पीढ़ी परवान चढ़ जाए। सत्ता ने अगर शिक्षा की आदर्श प्रणाली के रूप में नई नीति को अंगीकार किया, तो विपक्ष भी झाड़ फूंक करके क्या सही कर पाया। दरअसल हिमाचल में शिक्षा नीति ने एक ऐसा प्रश्न खड़ा किया है, जिस पर फौरी बहस के फौलादी इरादे चाहिएं। जिस प्रश्न को सियासी तौर पर बार-बार खुर्द बुर्द होना पड़ा, वह अब नई शिक्षा नीति का पैगंबर है। यानी शिक्षा नीति की आत्मा जिस मातृभाषा के जरिए अलख जगा रही है, उस पर हिमाचल के पास सिवाय क्षेत्रीय वैमनस्य के कुछ नहीं।

नई शिक्षा नीति में स्कूली पढ़ाई से उच्च शिक्षा तक जो प्रमुख बदलाव या शुरुआत है, उसकी पहली सीढ़ी मातृ या स्थानीय भाषा पर टिकी है। पांचवीं की पढ़ाई तक मातृभाषा, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई का माध्यम बनाए रखने की योजना है। बच्चों को मातृभाषा और संस्कृति से जोड़े रखने की मूल भावना के कितने नजदीक हिमाचल खड़ा है, इसे भी समझ लीजिए। पूरा हिमाचल इस दृष्टि से पंगु है। हम आज तक घर की भाषा, स्थानीय भाषा, मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा के स्वरूप में हिमाचल की जुबान नहीं पहचान सके। ऐसे में विधानसभा में माननीयों ने पक्ष और विरोध में शिक्षा नीति पर बहस तो कर ली, लेकिन यह कौन स्पष्ट करेगा कि पांचवीं तक हिमाचली बच्चे किस बोली को मातृभाषा मानें। दुर्भाग्यवश वर्षों बाद भी यह राज्य अपनी भाषाई दृष्टि में अति कमजोर इकाई साबित हो रहा है। ऐसे में कला, संस्कृति व भाषा विभाग भी अपने  औचित्य की परवरिश नहीं कर पाया। दरअसल भाषा से सांस्कृतिक पहचान में हिमाचल ने अपने विमर्श संकुचित रखे। नारायण चंद पराशर और लाल चंद प्रार्थी के बाद कोई ऐसी राजनीतिक भूमिका सामने नहीं आई, जिससे हिमाचली भाषा की रिक्तता खत्म हो पाती। इस विषय पर शांता कुमार के हालिया साक्षात्कार का हवाला लें जहां वह प्रदेश को हिंदी आवरण में देखते और वकालत करते हैं कि हिमाचल की संपर्क भाषा केवल राज भाषा ही हो सकती है। अगर यह मान लिया जाए, तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मकसद हमारे प्रदेश में बदल जाएगा, जबकि दूसरी ओर सत्ता का प्रखर अंदाज हिमाचल में संस्कृत की अहमियत बढ़ाना चाहता है। ऐसी स्थिति में हिमाचली बच्चों का मातृभाषा में नेतृत्व कैसे होगा। हिमाचली संदर्भ में इससे बड़ा नीति भ्रम और क्या होगा कि प्रदेश की दो-तिहाई आबादी की मातृ बोलियों की समीपता से पिंड छुड़ा कर हमारे शिक्षा मंत्री संस्कृत का राग अलापते हुए एक नए विश्वविद्यालय की नींव रख रहे हैं।

प्रदेश के 73 प्रतिशत हिस्से में हिमाचली भाषा के उद्गम का सेतु विद्यमान है, लेकिन इसे जोड़ने की न नीति और न ही नीयत दिखाई देती है। ऐसे कोई नियमित प्रकाशन नहीं, जो बोलियों की समीपता में सृजन को पाठ्यक्रम तक पहुंचा सके। अब तो डोगरी की तरह हिमाचली भाषा को आठवीं अनुसूची में डालने का प्रश्न भी नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति की अनुपालना में हिमाचली बच्चों को घर, स्थानीय, मातृ या क्षेत्रीय भाषा में से किसी एक को चुन कर पांचवीं, आठवीं या इससे भी आगे पढ़ाई में निकलने का रास्ता बनाना है। क्या किसी स्थानीय भाषा के स्वरूप में हिमाचल खड़ा हो पाएगा या क्षेत्रीय भाषाओं में पंजाबी या डोगरी को अपनी जुबान पर चढ़ा पाएगा। यह इसलिए कि अंततः भाषा की पगडंडियों से गुजर कर नई शिक्षा नीति जो आश्वासन दे रही है, वे पूरे हों। रोजगार की तलाश में हिमाचली युवा जिस तरह बेंगलूर, पुणे, दिल्ली, चेन्नई या अन्य शहरों में आशय लेता है, वहां एक बार फिर भाषाई अस्मिता पर परिचर्चा शुरू हो गई है। बेंगलूर में कन्नड़ या चेन्नई में तमिल के प्रश्न पर नए सिरे से नई शिक्षा नीति के स्तंभ ढूंढे जा सकते हैं, तो बेजुबान हिमाचल को प्रमाणिकता के साथ भाषाई परिचय देना पड़ेगा। भाषाई शिक्षा और शिक्षा का भाषाई माध्यम चुनने की राष्ट्रीय बहस में हिमाचल का अपना पक्ष क्या है, बताना पड़ेगा। पांचवीं से आठवीं तक के बच्चों के लिए हिमाचल को स्थानीय, मातृ या क्षेत्रीय भाषा को चिन्हित करना होगा और यही अनिवार्यता सदन में हुई बहस को अप्रासंगिक बना देती है।

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