शिक्षा प्रणाली का नया अवतार: वरिंदर भाटिया, पूर्व कालेज प्रिंसिपल

वरिंदर भाटिया

पूर्व कालेज प्रिंसिपल

यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति इस लिहाज से भी काबिले-नजर है कि जितना राय-मशविरा इसे लाने से पहले किया गया है, वह पहले कभी नहीं हुआ। लाखों की तादाद में ग्राम पंचायतों, हजारों की तादाद में ब्लॉक स्तर और सैकड़ों की तादाद में जिला स्तर पर इस पूरे विषय पर चर्चा की गई और तब कहीं जाकर इसे अंतिम रूप दिया गया। अलग-अलग राज्य सरकारों से भी इस पर राय मांगी गई थी और उन्होंने भी अपने राज्य के अनुसार इस नीति में सुझाव दिए। यह नीति प्रतियोगिता को बढ़ावा देगी ताकि छोटी यूनिवर्सिटी या राज्य स्तर के शिक्षण संस्थान बड़े संस्थानों के साथ मुकाबला कर पाएं। विदेशी यूनिवर्सिटी हिंदुस्तान में जरूर आएगी और उससे भारत का शिक्षा स्तर ग्लोबल होगा। अब बिल्कुल निचले स्तर पर छात्रों को बुनियादी शिक्षा दी जा सकेगी ताकि वह बेहतर भविष्य के लिए तैयार हो सकें…

देश  के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि नई शिक्षा नीति के जरिए सरकार ने नजरिया बदलने की कोशिश की है और इस नीति में देश में गुणवत्तापरक शिक्षा पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया है। हाल ही में 34 साल बाद देश की शिक्षा नीति में वांछित और निहित बड़े बदलाव किए गए हैं। नई शिक्षा नीति को कैबिनेट ने मंजूरी भी दे दी है। इस नई शिक्षा नीति को कुछ इस तरह से बनाया गया है कि यह 21वीं सदी के उद्देश्यों को पूरा करे, साथ ही भारत की परंपराओं और जड़ संस्कृति से भी ओतप्रोत हो। सबसे पहले तो कैबिनेट द्वारा मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदल कर शिक्षा मंत्रालय करने को मंजूरी दी गई है। प्रारंभिक शिक्षा में 3 वर्ष से 8 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए शैक्षिक पाठ्यक्रम का दो समूहों में विभाजन किया जाएगा। 3 वर्ष से 6 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए आंगनवाड़ी या बालवाटिका या प्री-स्कूल के माध्यम से मुफ्त, सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी। 6 वर्ष से 8 वर्ष तक के बच्चों को प्राथमिक विद्यालयों में कक्षा 1 और 2 में शिक्षा प्रदान की जाएगी। प्रारंभिक शिक्षा को बहुस्तरीय खेल और गतिविधि आधारित बनाने को प्राथमिकता दी जाएगी। ईसीसीई से जुड़ी योजनाओं का निर्माण और क्रियान्वयन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय व जनजातीय कार्य मंत्रालय के साझा सहयोग से किया जाएगा। राज्य सरकारों द्वारा वर्ष 2025 तक प्राथमिक विद्यालयों में कक्षा-3 तक के सभी बच्चों में बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान प्राप्त करने हेतु इस मिशन के क्रियान्वयन की योजना तैयार की जाएगी।

 कक्षा-5 तक की शिक्षा में मातृभाषा, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा को अध्यापन के माध्यम के रूप में अपनाने पर बल दिया गया है। साथ ही इस नीति में मातृभाषा को कक्षा-8 और आगे की शिक्षा के लिए प्राथमिकता देने का सुझाव दिया गया है। स्कूली और उच्च शिक्षा में छात्रों के लिए संस्कृत और अन्य प्राचीन भारतीय भाषाओं का विकल्प उपलब्ध होगा, परंतु किसी भी छात्र पर भाषा के चुनाव की कोई बाध्यता नहीं होगी। बधिर छात्रों के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर पाठ्यक्रम सामग्री विकसित की जाएगी तथा भारतीय संकेत भाषा को पूरे देश में मानकीकृत किया जाएगा। भारतीय भाषाओं के संरक्षण और विकास के लिए एक भारतीय अनुवाद और व्याख्या संस्थान, फारसी, पाली और प्राकृत के लिए राष्ट्रीय संस्थान स्थापित करने के साथ उच्च शिक्षण संस्थानों में भाषा विभाग को मजबूत बनाने एवं उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्यापन के माध्यम से रूप में मातृभाषा, स्थानीय भाषा को बढ़ावा दिए जाने का सुझाव दिया है।

नई शिक्षा नीति में एक ऐसे पाठ्यक्रम और अध्यापन प्रणाली के विकास पर बल दिया गया है जिसके तहत पाठ्यक्रम के बोझ को कम करते हुए छात्रों में 21वीं सदी के कौशल के विकास, अनुभव आधारित शिक्षण और तार्किक चिंतन को प्रोत्साहित करने पर विशेष ध्यान दिया जाए। इस नीति में प्रस्तावित सुधारों के अनुसार कला और विज्ञान, व्यावसायिक तथा शैक्षणिक विषयों एवं पाठ्यक्रम व पाठ्येतर गतिविधियों के बीच बहुत अधिक अंतर नहीं होगा। कक्षा-6 से ही शैक्षिक पाठ्यक्रम में व्यावसायिक शिक्षा को शामिल कर दिया जाएगा और इसमें इंटर्नशिप की व्यवस्था भी दी जाएगी। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद द्वारा स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा तैयार की जाएगी। छात्रों के सीखने की प्रगति की बेहतर जानकारी हेतु नियमित और रचनात्मक आकलन प्रणाली को अपनाने का सुझाव दिया गया है। साथ ही इसमें विश्लेषण तथा तार्किक क्षमता एवं सैद्धांतिक स्पष्टता के आकलन को प्राथमिकता देने का सुझाव दिया गया है।

शिक्षकों की नियुक्ति में प्रभावी और पारदर्शी प्रक्रिया का पालन तथा समय-समय पर लिए गए कार्य-प्रदर्शन आकलन के आधार पर पदोन्नति होगी। राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद वर्ष 2022 तक शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय व्यावसायिक मानक का विकास किया जाएगा। नई शिक्षा नीति के तहत एम. फिल. कार्यक्रम को समाप्त कर दिया गया है। चिकित्सा एवं कानूनी शिक्षा को छोड़कर पूरे उच्च शिक्षा क्षेत्र के लिए एक एकल निकाय के रूप में भारत उच्च शिक्षा आयोग का गठन किया जाएगा। उच्च शिक्षा की एक बड़ी कमी थी ढेर सारी संस्थाओं के हाथ में नियंत्रण। इस नियंत्रण के कारण विश्वविद्यालयों को आजादी नहीं मिल पाती थी। यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति इस लिहाज से भी काबिले-नजर है कि जितना राय-मशविरा इसे लाने से पहले किया गया है, वह पहले कभी नहीं हुआ। लाखों की तादाद में ग्राम पंचायतों, हजारों की तादाद में ब्लॉक स्तर और सैकड़ों की तादाद में जिला स्तर पर इस पूरे विषय पर चर्चा की गई और तब कहीं जाकर इसे अंतिम रूप दिया गया। अलग-अलग राज्य सरकारों से भी इस पर राय मांगी गई थी और उन्होंने भी अपने राज्य के अनुसार इस नीति में सुझाव दिए। यह नीति प्रतियोगिता को बढ़ावा देगी ताकि छोटी यूनिवर्सिटी या राज्य स्तर के शिक्षण संस्थान बड़े संस्थानों के साथ मुकाबला कर पाएं।

 विदेशी यूनिवर्सिटी हिंदुस्तान में जरूर आएगी और उससे भारत का शिक्षा स्तर ग्लोबल होगा। अब बिल्कुल निचले स्तर पर छात्रों को बुनियादी शिक्षा दी जा सकेगी ताकि वह बेहतर भविष्य के लिए तैयार हो सकें। अब तक लोग वोकेशनल एजुकेशन पर ज्यादा तवज्जो नहीं देते थे जिसकी वजह से हम सिर्फ ग्रेजुएट पैदा कर रहे थे, लेकिन अब स्कूली शिक्षा में भी वोकेशनल एजुकेशन को शामिल करने से बेहतर छात्र निकल कर सामने आएंगे। जो विद्वान नई शिक्षा नीति से सहमत नहीं दिखाई पड़ते हैं, उनका कहना है कि नई पॉलिसी जो कि यूनिवर्सिटी और कॉलेज को अलग-अलग ग्रेड में बांटेगी और प्राइवेटाइजेशन को बढ़ावा देगी। कुल मिला कर यह शिक्षा नीति शैक्षणिक ढांचे में व्यापक बदलाव करने वाली है। शिक्षा में गवर्नेंस, डिलीवरी और उसके वित्त-पोषण के लिहाज से यह पारिभाषिक, संस्थागत ढांचे से लेकर परिचालन के स्तर तक परिवर्तन एवं कायाकल्प करने वाली है। बावजूद इसके एकमुश्त राय है कि नई शिक्षा नीति को लागू करने के लिए अच्छी सोच वाले और क्रिएटिव लोगों को आगे लाया जाए।

ईमेल : hellobhatiaji@gmail.com

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