Friday, February 26, 2021 04:19 AM

शिमला में एफसीए दफ्तर के बड़े मायने

हिमाचल में कोई नया प्रोजेक्ट शुरू करना हो, तो यह वन विभाग की मंजूरी के बिना शुरू हो ही नहीं सकता। पावर प्रोजेक्ट्स हों या हाई-वे बनाना, फोरेस्ट क्लीयरेंस के बिना बात आगे बढ़े, सवाल ही नहीं उठता। फोरेस्ट लैंड पर कोई भी गतिविधि करनी हो, उसके लिए मंजूरी एक कानून के अंतर्गत दी जाती है… जो है एफसीए यानी फोरेस्ट कंजरवेशन एक्ट। पूरे देश में 1980 में अस्तित्त्व में आए इस एक्ट की हिमाचल में क्या है कहानी… शिमला में खुलने वाले एफसीए दफ्तर से कितनी आसान बनेंगी चीजें… इस दखल में बता रहे हैं शिमला से खेमराज शर्मा

शिमला में एफसीए का ऑफिस खुलने से अब प्रदेश के विकासात्मक कार्यों की मंजूरी के लिए महीनों इंतजार नहीं करना पड़ेगा। जिन फाइलों को एफसीए की मंजूरी के लिए देहरादून पहुंचाने में कई दिन लग जाते थे, उन फाइलों को अब महज कुछ मिनटों या फिर एक या दो दिन में शिमला के लॉगवुड स्थित खोले गए एफसीए के कार्यालय में पहुंचा दिया जाएगा। ऐसे में जहां मामलों को मंजूरी मिलने में गति मिलेगी। इससे लंबित पड़ी कई फाइलों के भी क्लीयर होने की उम्मीद जगेगी। सही मायने से शिमला में एफसीए का कार्यालय खुल जाने से बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स के जल्द यहां स्थापित होने में मदद मिलेगी। इससे जहां राज्य में युवाओं के लिए रोजगार के द्वार खुलेंगे, वहीं प्रदेश की आर्थिकी भी मजबूत होगी।

एफसीए का शिमला में एकीकृत क्षेत्रीय कार्यालय पहली अक्तूबर से खुल गया है। अभी पूरी तरह इस कार्यालय के संचालित होने के लिए दो-तीन महीने का वक्त लग सकता है। स्टाफ से लेकर अन्य कई तरह की औपचारिकताएं अभी पूरी की जानी हैं। जब तक शिमला में खुला एफसीए कार्यालय पूरी तरह काम करना शुरू नहीं कर देता, तब तक यहां की फाइलें फिलहाल के लिए देहरादून ही भेजी जाएंगी। दो महीने बाद कोई भी फाइल देहरादून नहीं जाएगी, उसे शिमला के लॉगबुड में खुले एफसीए के ज़ोनल ऑफिस में भेजा जाएगा।

1980 में लागू हुआ फोरेस्ट कन्ज़रवेशन एक्ट

एफसीए 1980 में लागू किया गया था। यह ऐसा एक्ट है, जो जंगलों और वन भूमि को बचाने के लिए लागू किया गया। अगर किसी यूजर एजेंसी ने वन भूमि पर किसी तरह का काम शुरू करना है या कोई निर्माण करना है, तो इसके लिए पहले उन्हें एफसीए की मंजूरी लेनी पड़ती है। सात चरणों में मंजूरी लेने का प्रोसेस होता है, जिसमें कई तरह के डॉक्यूमेंट से लेकर अन्य औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ती हैं। अगर ये औपचारिकताएं पूरी नहीं हो पाती हैं, तो फाइलें वापस कर दी जाती हैं। लंबी जदोजहद के बाद जब भारत सरकार से एफसीए मंजूरी मिल जाती है, तो प्रदेश सरकार की हां के बाद वन भूमि की जमीन पर यूजर एजेंसी काम करना शुरू करती है, लेकिन इसमें अहम यह है कि वन भूमि यूजर एजेंसी के नाम नहीं होती, केवल जमीन डायवर्ट की जाती है, वह भी 99 साल की लीज पर। जब यह टाइम पीरियड पूरा हो जाता है, तो दोबारा से यूजर एजेंसी को इसे रिन्यू करना पड़ता है और अगले 99 साल के लिए फिर जमीन यूजर एजेंसी को डायवर्ट हो जाती है, लेकिन जमीन पर मालिकाना हक वन विभाग का ही होता है और उसका ही रहता है।

क्या है यह एफसीए

देश में ऐसी कोई भी जमीन, जो कि वन विभाग के नाम हो और सरकार के रिकॉर्ड में यह जमीन फोरेस्ट के लिए संरक्षित हो, ऐसी जमीन जो कि फॉरेस्ट अंडर सेक्शन-4 के तहत नोटिफाई की गई, हो वे सारी जमीनें फोरेस्ट कंजरवेशन एक्ट के तहत आती हैं। ऐसी किसी भी जमीन पर पर कोई अन्य गतिविधियां की जानी होती हैं, तो इसके लिए एफसीए की परमिशन पड़ती है। एफसीए एक्ट 25 अक्तूबर, 1980 को लागू किया गया था। पूरे देश में एक्ट एक समान है, जबकि जम्मू और कश्मीर में अभी तक यह एक्ट लागू नहीं होता है। यह एक्ट वन भूमि को सुरक्षित रखने के लिए लागू किया गया था, ताकि वन भूमि पर किसी तरह का अतिक्रमण न हो सके और वन भूमि को संरक्षित किया जा सके। इस एक्ट के लागू होने से अब किसी भी वन भूमि पर अन्य गतिविधियां शुरू करने के लिए इस एक्ट के तहत मंजूरी लेनी पड़ती है, जिसका एक प्रोसेस है। केंद्र सरकार की ओर से इसकी सूची तैयार की जाती है। शिमला में जो एफसीए का कार्यालय खुलने जा रहा है, उसमें भी 40 हेक्टेयर की भूमि तक की परमिशन देने की पावर होगी, अगर इससे ज्यादा की जमीन है, तो मामला दिल्ली सेंटर के पास जाएगा।

बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए पेश आती हैं दिक्कतें

राज्य में सबसे ज्यादा दिक्कतें बड़े-बड़े हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट, नेशनल हाई-वे बनाने और उनके विस्तार को लेकर होती है, क्योंकि 65 प्रतिशत क्षेत्र वन भूमि में होने के कारण ऐसे मामलों में दिक्कतें आती हैं। प्रदेश में बीच से जो भी नेशनल हाई-वे और फोरलेन गुजरने हैं, वे वन भूमि से होकर निकल रहे हैं। ऐसे में इनकी क्लीयरेंस के लिए सरकार को कुछ दिक्कतें सामने आती हैं।

एफसीए के सात चरण

सबसे पहले जगह के लिए करना होता है आवेदन

पहली स्टेज — एफसीए की मंजूरी लेने के लिए सबसे पहले जगह को लेकर आवेदन करना है। इसमें यूजर एजेंसी ऑनलाइन आवेदन करती है। भारत सरकार की ओर से 2015 में परिवेश पोर्टल बनाया गया है, जिसमें एफसीए की मंजूरी लेने के लिए यूजर एजेंसी को आवेदन करना होता है। एक फार्म इसमें दिया होता है, जिसे भरना होता है। इसके साथ ही इसमें डॉक्यूमेंट भी अटैच करने होते हैं, जिसमें लैंड शीट, वन भूमि का डिजिटल नक्शा, केमल फाइन, जमीन के रेवेन्यू कागजात समेत अन्य होते हैं। सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद यूजर एजेंसी इसे समिट करती है। इसके बाद दूसरी स्टेज शुरू होती है।

फिर पूरी होती हैं ऑनलाइन औपचारिकताएं

दूसरी स्टेज — इस स्टेज में एफसीए की मंजूरी के लिए जो ऑनलाइन औपचारिकताएं यूजर एजेंसी की ओर से पूरी की जाती हैं, वे नोडल अधिकारी के पास चली जाती हैं। प्रदेश में केवल एक ही नोडल अधिकारी एफसीए से संबंधित आवेदनों को देखता है। नोडल अधिकारी के पास आने पर वे ऑनलाइन आवेदन करते समय यह देखता है कि इसमें कोई गलती तो नहीं। इसके अलावा जो डॉक्यूमेंट अटैच करने होते हैं, वे पूरे हैं या नहीं। इन सब को देखने के बाद अगर कोई खामी पाई जाती है, तो इसे दोबारा यूजर एजेंसी को भेज दिया जाता है। सही पाए जाने पर इसे नोडल अधिकारी की और से अप्रूव कर दिया जाता है। इसके बाद एक ऑटो ई-मेल के जरिए यूजर एजेंसी को एकनॉलेजमेंट जाता है, जिसे यूजर एजेंसी डाउनलोड की, उसकी हार्ड कॉपी व ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया की भी हार्ड कॉपी नोडल अधिकारी को भेजता है। इसके बाद तीसरी स्टेज शुरू होती है।

डीएफओ और डीसी को भेजा जाता है आवेदन

तीसरी स्टेज — फिर नोडल अधिकारी प्राप्त आवेदन जिला के डीएफओ और उपायुक्त को भेजता है। डीएफओ की ओर से संबंधित कागज दोबारा जांचे जाते हैं। इसके बाद वे संबंधित जगह जाकर वन विभाग की जमीन की जांच करता है। सबसे जरूरी काम पेड़ों की गिनती करना होता है। इसके बाद डीएफओ अपनी रिपोर्ट तैयार करता है। यह ऑनलाइन पोर्टल पर भी इसे चढ़ाता है और हार्ड कॉपी भी तैयार करता है।

और फिर कन्जरवेटर के पास जाती है फाइल

फोर्थ स्टेज — फिर डीएफओ से संबंधित कागज और फाइल कन्जरवेटर के पास जाती है। कन्जरवेटर भी सभी कागजों की जांच करता है। अगर उसे कोई खामी दिखती है, तो वापस डीएफओ को भेजी जाती है। अगर सब कुछ ठीक है, तो कन्जरवेटर की ओर से फाइल वापिस नोडल अधिकारी को भेजी जाती है।

नोडल अधिकारी दोबारा करता है फाइलों की जांच

पांचवीं स्टेज — कन्जरवेटर के पास से जो फाइल नोडल अधिकारी के पास आती है, तो नोडल अधिकारी वह फाइल, जो कि उसकी ओर से पहले डीएफओ को भेजी गई होती है, उसकी दोबारा पूरी जांच करता है। यहां हरेक कागज समेत अधिकारियों की सारी औपचारिकताएं दोबारा से जांची जाती हैं। अगर कोई खामी होती है, तो फाइल वापस भेजी जाती है। अगर हरेक कागज एक्ट के तहत है, तो फाइल को आगे प्रदेश सरकार के पास सिफारिश के लिए भेजा जाता है। जब सरकार इसकी सिफारिश को मंजूरी देती है, तो वन विभाग इसे भारत सरकार के पास फाइनल मंजूरी के लिए भेजता है।

चैकिंग को भारत सरकार के पास जाते हैं कागज

छठी स्टेज — प्रदेश से जब एफसीए की मंजूरी के लिए फाइल भारत सरकार के पास जाती है, तो वहां भी सभी कागजों की चैकिंग की जाती है। इसके बाद सब कुछ ठीक होने पर पहली स्टेज की मंजूरी मिलती है। अगर खामी होती है, तो इसे दोबारा वापस भेजा जाता है। पहली स्टेज की मंजूरी में भारत सरकार यूजर एजेंसी से सीए, एनपीपी, एफआरए प्रमाण पत्र समेत अन्य छोटी-छोटी चीजें मांगती है। जब ये सब पूरी हो जाती हैं, तो फाइनल मंजूरी मिलती है। यहां यूजर एजेंसी को जमीन के तय रेट के अनुसार 6.99 से 10.99 लाख रुपए प्रति हेक्टेयर पैसा देना पड़ता है।

मंजूरी के बाद भी ऐसे ही शुरू नहीं हो जाता काम

सातवीं स्टेज — भारत सरकार की ओर से जब मंजूरी मिल जाती है, तो इसके बाद भी यूजर एजेंसी फोरेस्ट जमीन पर काम शुरू नहीं कर सकती। फाइल वहां से प्रदेश सरकार को वापस भेजी जाती है। अब इसमें अंतिम काम सरकार का होता है। सरकार की ओर से यूजर एजेंसी को जमीन के डायवर्ट की मंजूरी का इंतजार होता है। जब सरकार मंजूरी देती है, तो यूजर एजेंसी फोरेस्ट जमीन पर काम करना शुरू करती है। सात चरणों से होकर एफसीए की मंजूरी संबंधित यूजर एजेंसी को मिलती है, अगर यूजर एजेंसी सक्रियता के साथ काम करे, तो एफसीए की मंजूरी मिलने में चार माह से ज्यादा का समय नहीं लगता।

प्रदेश में 65 प्रतिशत वन भूमि, यहां निर्माण आसान नहीं

राज्य में 65 प्रतिशत वन भूमि है, ऐसे में इस भूमि पर किसी तरह का निर्माण करना आसान नहीं है। इसके बावजूद एफसीए की मंजूरी के लिए जाने वाले मामलों को बांटा गया है। अगर एक हेक्टेयर से कम जमीन है या फिर 50 से ज्यादा पेड़ वन भूमि पर नहीं हैं, तो यह केस एफसीए की मंजूरी के लिए भारत सरकार के पास नहीं जाएगा, लेकिन इसे भी 15 भागों में बांटा गया है। ये केवल 15 मामले हैं, जिस पर राज्य सरकार परमिशन दे सकती है। अगर इसके बाहर कोई काम है, तो एफसीए की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा।

पार्क में काम करने के लिए लंबी है प्रक्रिया

एफसीए की तरह अगर कोई यूजर एजेंसी नेशनल पार्क, वाइल्ड लाइफ पार्क में किसी तरह का काम शुरू करना चाहता है, तो इसके लिए यूजर एजेंसी को लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। फाइल प्रोसेस करने की प्रक्रिया वैसी है, लेकिन इसके लिए अलग से नेशनल वाइल्ड लाइफ बोर्ड से परमिशन लेनी पड़ती है। यहां से परमिशन लेने के लिए यूजर एजेंसी को और भी कई तरह की औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ती हैं।

प्रदेश से हर साल भेजी जाती हैं 175 फाइलें

राज्य की ओर से हर साल एफसीए की मंजूरी के लिए करीब 175 फाइलें भेजी जाती हैं, लेकिन इनमें से सभी फाइलों को उसी साल मंजूरी नहीं मिल पाती। मात्र 100 के करीब फाइलों को ही एफसीए की मंजूरी मिल पाती है, जबकि अन्य फाइलों को प्रोसेस में डाल दिया जाता है। ये सब फाइलें पहले देहरादून जाती थी, यहां भी फाइलों के फाइनल मंजूरी के लिए माथापच्ची करनी पड़ती है, लेकिन अब शिमला में एफसीए कार्यालय खुल जाने से फाइलों की मंजूरी की संख्या भी बढ़ेगी, और ज्यादा से ज्यादा फाइलों को एफसीए की मंजूरी मिलेगी।

दो साल से पेंडिंग पड़ी हैं फाइलें

विभाग के पास अभी दो साल से फाइलें पेंडिंग पड़ी हुई हैं। इन फाइलों को लेकर यूजर एजेंसी सक्रियता नहीं दिखाती, इसमें कई फाइलें ऐसी भी हैं, जो किसी ऑब्जेक्शन की वजह से ठंडे बस्ते में पड़ी हुई हैं। एफसीए एक्ट अपने आप में ही पूरी तरह एक कानून है। इस एक्ट में रिजेक्ट हुई फाइल को पूरी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद ही मंजूरी मिल सकती है। इसके लिए यूजर एजेंसी किसी भी सिविल कोर्ट में याचिका दायर नहीं कर सकती। क्योंकि कोर्ट से भी यही कहा गया है कि जब तक एफसीए 1980 की औपचारिकताएं पूरी नहीं की गई, तब तक किसी भी वन भूमि पर काम करने की अनुमति नहीं मिल सकती।

15 काम…सरकार दे सकती है मंजूरी

15 तरह के काम, जिसके लिए राज्य सरकार एक हेक्टेयर भूमि पर निर्माण की मंजूरी दे सकती है, वे हैं स्कूल/शिक्षण संस्थान, अस्पताल/डिस्पेंसरी, बिजली और दूरसंचार कंपनियों की लाइनें बिछाने का काम, पीने के पानी की व्यवस्था करने का काम, पानी का प्रबंध/वर्षा के पानी को स्टोर करने के लिए किए जाने वाले काम, छोटी सिंचाई योजनाएं, पावर सब-स्टेशन, वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर/स्किल डिवेलपमेंट संस्थान, लिंक रोड से मेन रोड को जोड़ने वाला रोड, किसी पुल को विकसित करना/बीआरओ द्वारा जरूरी तौर पर पुलों को बनाने, गैर पारंपरिक ऊर्जा स्रोत, गृह मंत्रालय की ओर से बॉर्डर एरिया के पास ऐसी जगह जहां पुलिस स्टेशन समेत सुरक्षा चौकियां खोली जानी हैं। शहरी क्षेत्रों में बनाए जाने वाले सार्वजनिक शौचालय, जिन्हें सरकार की मंजूरी मिल चुकी हो, लेकिन एक हेक्टेयर से ज्यादा जमीन न हो और पानी से चलने वाली मशीनरियां, जिससे काम किए जाने हो। इन सबकी मंजूरी प्रदेश सरकार अपने स्तर पर दे सकती है, लेकिन इसमें से जरूरी है कि जमीन एक हेक्टेयर से ज्यादा न हो और उस वन भूमि पर 50 से ज्यादा पेड़ न हों।

विभाग की ओर से सभी फाइलें समय पर निपटाने का प्रयास किया जाता है। इसके अलावा यूजर एजेंसी को भी एफसीए के बारे में जागरूक किया जाता है। अगर कोई दिक्कत आए, तो समस्या का हल भी बताया जाता है। हर साल 100 के करीब फाइलों को अनुमति दिलवाई जाती है। शिमला में एफसीए कार्यालय के खुलने से अब कम समय पर लोगों के काम पूरे होंगे। इससे समय और धन दोनों बचेगा

—राजेश जे इक्का, एसीसीएफ, एफसीए, शिमला

हिमाचल में ज्यादा सख्त है कानून

एफसीए 1980 पूरे देश में एक समान है। जम्मू-कश्मीर में यह एक्ट लागू नहीं होता है, लेकिन इसके बावजूद हिमाचल में एक्ट थोड़ा ज्यादा सख्त है। हिमाचल एक ऐसा राज्य है, जहां 68 प्रतिशत वन भूमि है। इन वन भूमि पर विभिन्न तरह के पेड़ उगे हैं। ऐसे में पेड़ों को बचाने के लिए एक्ट के तहत किसी बड़े प्रोजेक्ट में मंजूरी लेना मुश्किल हो जाता है। अन्य राज्यों में हिमाचल की अपेक्षा कम जगह पर वन भूमि है। न ही ज्यादा पेड़-पौधे हैं। ऐसे में यहां सरल प्रक्रिया के साथ अनुमति मिल जाती है। हिमाचल के जंगल पूरे भारत वर्ष के लिए ऑक्सीजन सप्लायर का भी काम करते हैं, अन्य राज्यों की अपेक्षा यहां प्रदूषण का स्तर भी कम है। ऐसे में जंगल बचाने के लिए एफसीए यहां थोड़ा सख्ती के साथ काम करता है। अगर औपचारिकताएं पूरी हों, तो मंजूरी मिल जाती है।

यहां और कठोर हो जाते हैं नियम

राज्य में जो भी नेशनल पार्क, वाइल्ड लाइफ सेंक्चूरी, इसके अलावा जो नॉन फोरेस्ट जमीन, जो कि नेशनल पार्क और वाइल्ड लाइफ सेंक्चूरी के साथ लगती हो, ऐसी वन भूमि पर एफसीए कठोर हो जाता है। यहां किसी भी तरह का नॉन फोरेस्ट कार्य शुरू करने के लिए वाइल्ड लाइफ एक्ट के तहत दिल्ली से अगल परमिशन लेनी पड़ती है। जब वाइल्ड लाइफ एक्ट के तहत यूजर एजेंसी को इसकी परशिमन मिल जाती है, तो इसके बाद एफसीए के तहत अप्लाई करना पड़ता है।

 इसके बाद ही जाकर परमिशन मिलती है। अमूमन इस तरह की भूमि पर वन विभाग किसी तरह का कार्य करने की परमिशन कम ही देता है। यही नहीं, अगर ऐसी जगहों पर किसी तरह का रखरखाव भी किया जाना है, तो इसके लिए भी लंबी प्रक्रियाआें से होकर गुजरना पड़ता है, इसके बाद ही यहां रखरखाव का कार्य करने की अनुमति दी जाती है। कई राज्यों में न ही नेशनल पार्क है ओर न ही वाइल्ड लाइफ सेंक्चूरी है।

यहां भी राजनीति हावी

एफसीए मामलों पर भी सरकार कुछ हद तक राजनीति करती है। हर सरकार फोरेस्ट से मिलने वाली क्लीयरेंस का श्रेय लेने के लिए आगे रहती है। कुछ ऐसी फाइलें होती हैं, जो पहली सरकार के समय प्रोसेस में डाली होती हैं, लेकिन जब दूसरी सरकार आती है, तो फोरेस्ट क्लीयरेंस मिल जाती है। ऐसे में दूसरी सरकार क्लीयरेंस मामलों में राजनीति करती है और सारा श्रेय अपनी सरकार को देती है, जबकि ये सब प्रोसेस का हिस्सा है। अगर एफसीए की मंजूरी के लिए भेजी गई फाइल में औपचारिकताएं पूरी हैं और सभी तरह के डॉक्यूमेंट हैं, तो इसकी मंजूरी मिल जाती है। इसमें किसी तरह के राजनीतिक दखल की गुंजाइश नहीं है, लेकिन सरकार केवल उस समय राजनीति कर सकती है, जब केंद्र से मंजूरी मिलने के बाद जब सरकार को जमीन डायवर्ट करने के आदेश जारी करने होते हैं।

 इसके अलावा सरकार उस समय भी फोरेस्ट मामलों पर राजनीति कर सकती है। जब एक हेक्टेयर भूमि पर सरकार को स्वयं मंजूरी देनी होती है, सरकार अपने राजनीतिक लाभ के लिए ऐसे मामलों को एफसी संबंधित एक्ट से लटकाए रखती है, लेकिन जैसे ही चुनावों का समय नजदीक आता है, तो सरकार मामलों को मंजूरी दे देती है, ताकि इन मामलों पर सरकार ज्यादा से ज्यादा वोट अपनी ओर खीच सके। सबसे ज्यादा राजनीति सड़कों को लेकर होती है। हर सरकार अपने कार्यकाल में ग्रामीण क्षेत्रों को जाने वाली सड़कों को फोरेस्ट क्लीयरेंस मामलों में राजनीति करती है। हालांकि वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि एफसीए मामलों में किसी तरह की राजनीति का सवाल पैदा नहीं होता है, क्योंकि एफसीए एक्ट 1980 में उनकी प्रोजेक्ट फाइलों को मंजूरी मिलती है, जो इस एक्ट के तहत अपनी औपचारिकताएं पूरी करती हैं। ऐसे में राजनीतिक दखल इन मामलों में कम ही होता है।

राजधानी के दफ्तर में ही पूरे होंगे 80 फीसदी कार्य               

 —राकेश पठानिया, वन मंत्री

दिव्य हिमाचल — एफसीए का दफ्तर शिमला में खुलना प्रदेश के लिए कितना फायदेमंद है?

राकेश पठानिया — एफसीए का दफ्तर शिमला में खुल जाने से प्रदेश के 80 प्रतिशत कार्य अब यहीं पूरे हो जाएंगे। अभी कार्यालय खुलने में कुछ समय है। सीएम जयराम ठाकुर के संक्रमित होने से कार्यालय  खोलने का मामला लंबित हो गया है।

दिहि — अब आप एफसीए में फंसी फाइल्स की अनुमति दिलाने के लिए क्या करेंगे?

पठानिया — जो लोगों से जुड़े हुए सीधे कार्य होंगे, उन फाइल्स को अनुमति दिलवाने में प्राथमिकता होगी। स्वयं टाइम-टू-टाइम ऐसी फाइलों का फॉलोअप लेते रहेंगे, जो जनहित के लिए जरूरी है।

दिहि — आपने कार्यभार संभालने के बाद ऐसी कितनी फाइल्स देखीं हैं, जो एफसीए की अनुमति मांग रही हैं?

पठानिया — इनमें रोड, स्कूल समेत ऐसी इमारतों के मामले शामिल हैं, जिनका सीधा लाभ जनता को होगा।  हां! फाइलें लंबित पड़ी हैं। इसके अलावा सेंट्रल यूनिवर्सिटी के लिए भी फाइल्स को अनुमति दिलवाना मेरी प्राथमिकता होगी।

दिहि — फारेस्ट क्लीयरेंस में फंसी फाइल्स के लिए आपके पास क्या तोड़ है?

पठानिया — मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित पड़ा है। ऐसे में इस मामले को लेकर कुछ नहीं कहना चाहता, जैसे ही कोर्ट के आदेश आएंगे, उस हिसाब से आगे कार्य किया जाएगा।

दिव्य हिमाचल — भविष्य में एफसीए प्रदेश के विकास में बाधा न बने, आप क्या करने जा रहे हैं?

राकेश पठानिया — इस संबंध में भी कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता। यह मामला भी कोर्ट में विचाराधीन है।

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