श्रीकृष्ण स्तोत्रम

-गतांक से आगे…

दशलीलाविहाराय सप्ततीर्थविहारिणे।

विहाररसपूर्णाय नमस्तुभ्यं कृपानिधे॥ 22॥

दशावतार रूप लीला में विहार करने वाले तथा मथुरा के जमुना, जन्मभूमि व्रज आदि सप्त तीर्थों में विचरण करने वाले, विहार के रस से पूर्ण और तुम कृपा के निधान कृष्ण को नमस्कार है॥ 22 ॥

विरहानलसन्तप्त भक्तचित्तोदयाय च।

आविष्कृतनिजानन्दविफलीकृतमुक्तये॥ 23॥

(कृष्ण के) विरह की अग्नि से संतप्त तथा भक्त के चित्त में प्राण का संचार करने वाले और अपने मुक्ति को विफल करने के लिए आनंद को स्वयं प्रकट करने वाले कृष्ण को नमस्कार है॥ 23 ॥

द्वैताद्वैत महामोहतमःपटलपाटिने।

जगदुत्पत्तिविलय साक्षिणेऽविकृताय च॥ 24॥

(माया एवं ब्रह्मरूप से) द्वैत तथा (ब्रह्मरूप से) अद्वैत रूप से महा मोह के अंधकार पटल को समाप्त कर देने वाले, जगत की उत्पत्ति और उसके विलय के साक्षी एवं अविकृत कृष्ण को नमस्कार है॥ 24 ॥

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