Sunday, July 25, 2021 08:47 AM

फुटपाथी सपनों की औकात

वित्त विधेयक में शामिल मात्र 34 शब्दों ने भाजपा और कांग्रेस के गैरकानूनी काम को वैधानिक मान्यता दे दी। राजनीतिक धूर्तता से परिपूर्ण उन 34 शब्दों का हिंदी भावार्थ यह है : ‘सन 2016 के वित्त अधिनियम के सेक्शन 236 के प्रथम पैराग्राफ में शामिल शब्दों, अंकों और अक्षरों 26 सितंबर 2010 की जगह सभी शब्दों, अंकों और अक्षरों को 5 अगस्त 1976 पढ़ा जाए।’...

वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन ने राजनीतिक दलों के मुखिया को अपने दल के अंदर सर्वशक्तिमान बना डाला जिसने पार्टी सुप्रीमो की अवधारणा को जन्म दिया। ‘आया राम, गया राम’ की घटनाएं न हों, इसके लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने 52वां संविधान संशोधन लागू किया। तब वे न केवल प्रधानमंत्री थे बल्कि वे कांग्रेस अध्यक्ष भी थे। पार्टी में किसी विद्रोह से बचने के लिए इस संशोधन के माध्यम से राजीव गांधी ने खुद को और अधिक शक्तिशाली बनाने की नीयत से राजनीतिक दलों के अध्यक्ष को पार्टी का मुखिया ही नहीं, बल्कि पार्टी का मालिक भी बना डाला। पार्टी अध्यक्ष की इच्छा पार्टी के हर दूसरे व्यक्ति के लिए कानून हो गई। यही कारण है कि सभी राजनीतिक दल किसी एक परिवार या किसी एक गुट की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनकर रह गए हैं। वह परिवार या गुट सत्ता में हो तब भी पार्टी अध्यक्ष का पद नहीं छोड़ता। पार्टी अध्यक्ष की शक्तियों के सामने कोई विरोधी नहीं टिकता।

पार्टी के बैनर के बिना चुनाव जीतना लगभग असंभव है, अतः पार्टी अध्यक्ष के अलावा पार्टी का हर दूसरा कार्यकर्ता पार्टी अध्यक्ष के सामने एकदम बौना है। यही कारण है कि अब पार्टी के अध्यक्ष को ‘पार्टी सुप्रीमो’ कहने की परंपरा चल पड़ी है। दलबदल विरोधी कानून का एक और पक्ष यह भी है कि सत्तासीन राजनीतिक दल का मुखिया दोहरा पद संभालता है। दल का मुखिया या तो अपने दल का अध्यक्ष भी खुद होता है या दल के शेष वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा करके अपने बच्चों को पार्टी का मुखिया बना देता है और खुद मुख्यमंत्री होता है। उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, अखिलेश यादव, सुखबीर बादल और उद्धव ठाकरे आदि का उदाहरण हमारे सामने है। यही कारण है कि राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का नितांत अभाव है। अपना दल चलाने के लिए जो व्यक्ति तानाशाह बनता है, वह देश का मुखिया बनने पर लोकतांत्रिक कैसे हो सकता है? इसी कानून का सबसे ज्यादा हानिकारक प्रभाव यह भी है कि हमारे देश में विधायक और सांसद किसी बिल को लेकर अपनी इच्छा से मत नहीं दे सकते, अपने विवेक के अनुसार उस पर टिप्पणी नहीं कर सकते। स्वतंत्र मत रखने वाले लोग महत्त्वपूर्ण हों, प्रभावी हों, लोकप्रिय हों, काबिल हों, तो भी वे उपेक्षित ही रहते हैं, वे चाहे कोई भी क्यों न हों।

 सुब्रह्मयण स्वामी का उदाहरण हमारे सामने है। वे भिन्न-भिन्न जनहित याचिकाओं के माध्यम से अपनी सक्रियता के कारण मीडिया में तो बने हुए हैं, पर पार्टी में उनकी पूछ नहीं है क्योंकि वे अक्सर ऐसी बातें भी कह डालते हैं जो भाजपा के वर्तमान आलाकमान को स्वीकार्य नहीं हैं। सुब्रह्मयण स्वामी वित्त मंत्री बनने के लिए मरे जा रहे थे, कई बार गुहार भी लगाई, लेकिन अगर उन्हें इस काबिल नहीं समझा गया तो इसका कारण यही है कि भाजपा आलाकमान को लगता है कि वे ‘खतरनाक’ भी साबित हो सकते हैं। आज हर राजनीतिक दल को तोतों की जरूरत है जो बिलों पर मतदान के समय हाथ उठाकर सहमति दे दें, मेजें थपथपाएं और चुप रहें। ‘चुप्पी’ और ‘सहनशीलता’ अब एक ऐसा गुण है जो हर दल के आलाकमान को पसंद है। यही कारण है कि सन् 1990 में दो घंटे के वक्फे में 18 बिल पास हो गए, यानी हर 6 मिनट में एक बिल पास हुआ। सन् 2001 में तो कमाल ही हो गया जब सिर्फ  15 मिनट में 33 बिल पास कर दिए गए, यानी हर 25 सेकंड में एक बिल पास हुआ। यह क्रम सन् 2008 में एक बार फिर दोहराया गया जब 8 महत्त्वपूर्ण बिल 17 मिनट में पास हो गए और किसी भी बिल पर कोई बहस नहीं हुई। ये आंकड़े लोकसभा के आधिकारिक रिकार्ड में दर्ज हैं। चूंकि बिलों पर स्वतंत्र मत देना संभव नहीं है, इसलिए विधायकों और सांसदों में उन बिलों को लेकर कोई उत्साह नहीं है। वे अपनी पार्टी की नीति के अनुसार मशीनी ढंग से ‘हां’ या ‘न’ कह डालते हैं। परिणाम यह हुआ है कि सरकारों को कैसा भी कानून बनाने और कुछ भी करने की छूट मिल गई है। इसमें एक और तथ्य यह जुड़ गया है कि वित्त विधेयक पर राष्ट्रपति को भी कुछ कहने का अधिकार नहीं है।

 कानूनन वे उन पर सहमति देने के लिए विवश हैं। यही कारण है कि सन् 2016 में भाजपा की ‘देशभक्त सरकार’ ने चुपचाप एक खेल खेला, जिसका जि़क्र बहुत ज्यादा नहीं हो पाया। यह तमाशा शुरू हुआ सन् 2014 में जब दिल्ली उच्च न्यायालय ने पाया कि दो राष्ट्रीय राजनीतिक दलों, भाजपा और कांग्रेस को लंदन में स्थित कुछ कंपनियों से बार-बार फंड आ रहा है, जो कानूनन मान्य नहीं है। न्यायालय ने यह अवैधानिक कृत्य रंगे हाथों पकड़कर चुनाव आयोग को सूचित कर दिया ताकि वह इन दलों, यानी भाजपा और कांग्रेस के विरुद्ध उचित कार्यवाही कर सके। अब सरकार सक्रिय हो गई। सन् 2016 में पेश वित्त विधेयक में 2010 एफसीआरए, यानी ‘विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम’ में विदेशी स्रोत की परिभाषा बदल दी। यानी, सरकार ने बिना कोई संवैधानिक संशोधन बिल पेश किए ही संविधान में संशोधन कर डाला। पर यहां एक छोटा-सा फच्चर फिर भी रह गया। मोदी की सरकार ने यह संशोधन 26 सितंबर 2010 की पिछली तारीख से लागू किया था ताकि न्यायालय और चुनाव आयोग के हाथ बंध जाएं, पर बाद में यह पकड़ में आया कि एफसीआरए कानून 5 अगस्त 1976 को अस्तित्व में आया था और यदि यह संशोधन उस तारीख से लागू न किया गया तो भी अवैधानिक विदेशी फंडिंग के कारण भाजपा और कांग्रेस दोनों ही न्यायालय और चुनाव आयोग की जद में आ जाएंगे। फिर क्या था, सरकार ने एक बार फिर कल्पनाशीलता से काम लिया और 6 फरवरी 2018 को जब तत्कालीन वित्त मंत्री श्री अरुण जेतली ने अपना वित्त विधेयक पेश किया तो उसमें बड़ी चालाकी से इस तारीख को फिर से बदल कर 5 अगस्त 1976 कर दिया गया और दोनों दल सुर्खरू हो गए।

वित्त विधेयक में शामिल मात्र 34 शब्दों ने भाजपा और कांग्रेस के गैरकानूनी काम को वैधानिक मान्यता दे दी। राजनीतिक धूर्तता से परिपूर्ण उन 34 शब्दों का हिंदी भावार्थ यह है : ‘सन 2016 के वित्त अधिनियम के सेक्शन 236 के प्रथम पैराग्राफ में शामिल शब्दों, अंकों और अक्षरों 26 सितंबर 2010 की जगह सभी शब्दों, अंकों और अक्षरों को 5 अगस्त 1976 पढ़ा जाए।’ संविधान संशोधन की एक विशिष्ट प्रक्रिया होती है, लेकिन संविधान के इस प्रावधान के कारण कि वित्त विधेयक पर राष्ट्रपति को विचार करने का अधिकार नहीं है, भाजपा सरकार ने कांग्रेस के खामोश समर्थन से बिना किसी प्रक्रिया का पालन किए संविधान में संशोधन करके अपने अनैतिक कार्य को कानून-सम्मत बना डाला। कांग्रेस ने चुपचाप इस खेल का समर्थन किया क्योंकि विदेशी फंड भाजपा को ही नहीं, कांग्रेस को भी मिलते रहे हैं और दोनों ही दल कानूनन दोषी थे। अपने देश में चोर-चोर मौसेरे भाई के ऐसे उदाहरण हमें बार-बार देखने को मिलते हैं।

पी. के. खुराना

राजनीतिक रणनीतिकार

ईमेलः [email protected]

बहरहाल कोरोना के डेढ़ साल के सफरनामे का पैगाम है कि देश की विशाल आबादी को योग्य विशेषज्ञ डॉक्टर, प्रशिक्षित चिकित्सा स्टाफ, आईसीयू, एंबुलेंस सेवाएं जैसी पर्याप्त सुविधाओं से लैस सरकारी अस्पतालों की जरूरत है। बेशक कोरोना संक्रमण का बढ़ता ग्राफ  गिर रहा है, मगर कोविड पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ है। कोविड रोधी टीकाकरण ही कोरोना से सुरक्षा का विकल्प हो सकता है...

दुनिया भर में मौत का कहर मचाने वाली कोरोना महामारी के आगे विश्व के शक्तिशाली देश भी सरेंडर कर चुके हैं। कोरोना की दूसरी लहर इस विकराल रूप से पलटवार करेगी, शायद इसकी उम्मीद किसी को नहीं थी, मगर हिमाचल प्रदेश कोरोना की दूसरी लहर से निपटने में भी देश के अन्य राज्यों से बेहतर स्थिति में रहा है। राज्य में कई गांव मिसाल बनकर उभरे हैं जहां कोरोना महामारी का कोई मामला सामने नहीं आया। मगर इस बात में कोई दो राय नहीं कि कोरोना महामारी की दूसरी लहर से उपजे खौफनाक प्रकोप का आकलन करने में देश का नेतृत्व करने वाली तमाम सियासी व्यवस्था व स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी वजारत पर आसीन हुक्मरान व प्रशासन विफल रहे तथा व्यक्तिगत तौर पर आम लोगों के गैर जिम्मेदाराना रवैये से भी यह संक्रमण ज्यादा बेकाबू हुआ। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि हरदम कोरोना के साए में रहने वाले चिकित्सा क्षेत्र को खुद के उपचार की जरूरत महसूस हो रही है।

 नदियों में तैरती लाशें, श्मशान घाटों पर शवों की कतारें, अस्पतालों में ऑक्सीजन के लिए जद्दोजहद, मातम के माहौल में सामान्य कपड़ों से ज्यादा कफन की बिक्री जैसे कई कड़वे अनुभव व कभी न भूलने वाले सबक सिखाने वाली तबाही की खौफजदा तस्वीरें सामने आ चुकी हैं, मगर इसके बावजूद यदि देश में डॉक्टर, सुरक्षाकर्मी व प्रशासन लोगों को फेस मास्क पहनने तथा हेल्थ प्रोटोकॉल की अनुपालना के लिए प्रेरित करे या शादी समारोहों व अन्य इजलास में भीड़ जुटाने पर कानूनी कार्रवाई की नौबत आए तो यह लापरवाही का आलम है। कुछ समय पूर्व हमारे देश की अजीम सियासी शख्सियतों ने जय जवान, जय किसान व जय विज्ञान के नारे को पूरी शिद्दत से बुलंद किया था। उनकी दूरदर्शी सोच सही साबित हो रही है। देश की सरहदों व नागरिकों की सुरक्षा का जिम्मा हमारे जवानों के कंधों पर है। विश्व की 18 प्रतिशत जनसंख्या भारत में निवास करती है। मुल्क की इतनी बड़ी आबादी को रोजमर्रा की खाद्य सामग्री की पूर्ति करना व देश में मौजूद दुनिया के सर्वाधिक पशुधन के पालन-पोषण तथा देश की कृषि अर्थव्यवस्था को बचाने की जिम्मेवारी हमारे गांवों के परिश्रमी किसानों पर निर्भर है। मगर शहरों व महानगरों का सुकून छीनकर कोरोना ने ग्रामीण इलाकों में दस्तक देकर आमजन के जहन में दहशत का माहौल पैदा कर दिया है। अब खरीफ की फसलों की बुआई का समय चल रहा है। किसानों को उर्वरक या बीज खरीद के लिए बीज वितरण केंद्रों में कतारों में लगना पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों का स्वास्थ्य ढांचा इस महामारी से निपटने में सक्षम नहीं है। ऐसे हालात में बढ़ते संक्रमण की चुनौती को रोकने के कारगर प्रयास होने चाहिए अन्यथा खेत खलिहान में वीरानगी छाने से कृषि अर्थ व्यवस्था की स्थिति भी गर्त में जाएगी। चूंकि देश के कृषि अर्थशास्त्र की बुनियाद गांवों पर निर्भर करती है।

 लाजिमी है कृषि अर्थतंत्र का आधार स्तंभ हमारे गांव, देहात व अन्नदाता स्वस्थ तथा सेहतमंद रहें। कोरोना महामारी में तालाबंदी की बंदिशों में भी सुरक्षा बल व किसान तथा चिकित्सक अपने कार्यक्षेत्र में मुस्तैद हैं। युद्धकाल, आपदा या भीषण महामारी के दौर में देश की आबादी को बीमारियों से बचाने में हमारे वैज्ञानिकों व डाक्टरों का किरदार सदैव काबिले तारीफ रहा है। मगर कोरोना मरीजों को जानलेवा महामारी से बचाने में तैनात चिकित्सकों से मारपीट व बदसलूकी की घटनाएं शर्मिंदगी का सबब है। देश में जनसंख्या घनत्व की तुलना में सरकारी अस्पताल व डॉक्टरों की संख्या कम है, लेकिन कोरोना वायरस की इंतेहा में भी हमारे चिकित्साकर्मी व डॉक्टर अपनी क्षमता से अधिक काम करके धैर्य से देश के करोड़ों लोगों के इलाज के लिए जान जोखिम में डालकर दिन-रात सेवारत हैं। हमारे डाक्टरों व वैज्ञानिकों के अथक प्रयासों से ही देश-दुनिया की करोड़ों आबादी को कोविड रोधी वैक्सीन उपलब्ध हुई। कोरोना की दूसरी लहर में संक्रमित मरीजों के इलाज के दौरान 594 डॉक्टर खुद जिंदगी की जंग हार गए। कोविड-19 महामारी के इस भयानक दौर में स्वास्थ्य सेवाओं की बदइंतजामी पर देश की न्यायपालिकाओं ने सरकारों की कार्यप्रणाली पर कई सवाल उठाए, जिसका जवाब किसी भी सियासी दल के पास नहीं था। लेकिन हमारी अदालतों को देश में तेज रफ्तार से हो रहे जनसंख्या विस्फोट जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भी संज्ञान लेकर ठोस कदम उठाने चाहिए। वास्तव में तेजी से बढ़ रही आबादी कई समस्याओं का कारण बन रही है। एक ओर कोरोना महामारी लोगों की जान की दुश्मन बनी, साथ ही महंगी स्वास्थ्य सेवाएं तथा ऑक्सीजन की किल्लत ने अस्पतालों की दहलीज से पहले ही कई मरीजों की सांसें रोक दी।

 आवाम कोरोना से लडे़ या सरकारी तंत्र की बेरुखी से निपटे। देश की आबादी का एक बड़ा तबका गुरबत में ही जीवनयापन कर रहा है। निजी अस्पतालों में महंगी स्वास्थ्य सेवाओं के मद्देनज़र करोड़ों लोग वहां इलाज कराने से महरूम रह जाते हैं। नतीजतन लोग आस्था का सहारा लेते हैं या अंधविश्वास की शरण में जाते हैं। इसलिए देश के हुक्मरानों को गुरबत से जूझ रहे लोगों की मानसिक पीड़ा को महसूस करके सरकारी अस्पतालों के बुनियादी ढांचे को मजबूत करके स्वास्थ्य से ताल्लुक रखने वाली उच्च दर्जे की चिकित्सा सेवाओं को प्राथमिक लक्ष्य बनाना होगा। बहरहाल कोरोना के डेढ़ साल के सफरनामे का पैगाम है कि देश की विशाल आबादी को योग्य विशेषज्ञ डॉक्टर, प्रशिक्षित चिकित्सा स्टाफ, आईसीयू, एंबुलेंस सेवाएं जैसी पर्याप्त सुविधाओं से लैस सरकारी अस्पतालों की जरूरत है। बेशक कोरोना संक्रमण का बढ़ता ग्राफ  गिर रहा है, मगर कोविड पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ है। लॉकडाउन व कर्फ्यू जैसी बंदिशें कोरोना संक्रमण की चेन तोड़ने में कारगर हैं, मगर पूर्ण समाधान नहीं है। इसलिए कोविड रोधी टीकाकरण ही कोरोना से सुरक्षा का विकल्प हो सकता है। लेकिन 135 करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी देश की आबादी को एक साथ वैक्सीन उपलब्ध कराना भी चुनौती है। अतः आमजन को कोरोना हिदायतों का संजीदगी से पालन करके हर हालत में एहतियात बरतनी होगी ताकि कोरोना संक्रमण का दायरा न बढे़।

प्रताप सिंह पटियाल

लेखक बिलासपुर से हैं

जि़ंदगी में काम से अधिक महत्त्व शोर का हो गया है बंधुवर! अगर आप भीड़ में अपना बैंड खुद नहीं बजा सकते तो भीड़ आपको धकिया कर एक किनारे कर देगी। आप यह भी नहीं कह पाएंगे कि और हम खड़े-खड़े. मोड़ पर रुके-रुके जि़ंदगी के चढ़ाव का उतार देखते रहे, कारवां गुज़र गया, गुब्बार देखते रहे। इधर-उधर देखते हैं तो पाते हैं आज किसी के पास रुकने की फुर्सत कहां? लोग पीछे से भागते हुए आते हैं, बेपरवाही से आपको कंधा मार कर गुज़र जाते हैं। जो इस इस्पाती युग में आज भी भावुकता की तरलता, आदर्शो की अर्चना और नैतिक मूल्यों के संरक्षण में जुटा है, उसको आपकी तकिया बेच रुमाल कर देने वाली इस भीड़ की अंधी दौड़ में एक निर्मम धक्का खा कर पीछे रह जाना ही पड़ता है। क्या आपको चुनाव के दिनों में अपने मोहल्ले में नेता जी के पधारने का सुअवसर मिला है। यही तो दिन है जब सत्ता के मीनार से उतर कर हमारे नेता लोग संवेदना का लिहाफ  ओढ़ लेते हैं। उन्हें अपनी गली याद आ गई।

 इसमें छूट गए बड़े बूढ़े याद आ गए। अपनी कैमरा ब्रिगेड के साथ वे उनसे मिलने के लिए पधारे हैं। कितने अच्छे, भाई-भतीजे बेटे हैं वह। अपने से बड़ों का आशीर्वाद लेने आए हैं। मिलेगा, तभी तो प्रशंसक गदगद हो कहेंगे ‘अहा, हमारे तो भाग्य ही संवर गए। देखो बाप से या भय्या से या मां से अपनी पीठ पर थपकी, सिर पर आशीर्वाद लेने आए हैं।’ भई कैमरे वाले ज़रा फोकस तो करो। ऐसा शालीनता भरा चित्र कल मीडिया में छपेगा, तो लोग बलैयां लेने लगेंगे। सब वोट पक्की हो ‘विजयी भव’ का कोलाहल कैमरे के फोकस में लाने के लिए भीड़ उन्हें धक्का मार कर निकल गई। आप रुकिए ये रहे जगदम्बा बाबू, यहीं मोड़ काटने के इंतजार में। आप ही नहीं पूरा देश मोड़ पर रुका हुआ है। रोज़गार दफ्तरों की बंद खिड़कियों, सस्ते आटा-दाल की दुकानों के बंद दरवाज़ों के खुलने की इंतज़ार में। नहीं उनकी गलियों की ओर नहीं खुलते ये दरवाज़े।

 इनके पिछले चोर दरवाज़े बड़े-बड़े माल गोदामों में आधी रात को खुल जाते हैं और माल इन दुकानों में उतरने से पहले ही ये गोदाम चाट लेते हैं। वक्त बीत गया, अब यहां मोड़ पर रुके-रुके भी किसका इंतज़ार करते रहोगे बाबू? क्या अपनी खुशहाली के एक और नारे के उभरने का। उम्र गुज़र गयी। बरस दर बरस नहीं, नारा दर नारा इन बरसों की सुध ली गई। कभी इन्होंने कहा था, गरीबी हटाओ, देश बचाओ। नारे का स्वर एक दशक से दूसरे दशक तक फैलता गया। वोट गरीबी हटाने के लिए पड़ते रहे, देश धनी प्रासादों के लिए जि़ंदा होता चला गया। गरीबी तो वहीं खड़ी है, सिसकती म्लान, अपने बेहतरी के लिए किसी और नारे का इंतज़ार करती हुई। ...से वे लोग इस फटीचर मोड़ पर रुके हुए हैं, मीडिया में हमारे भाग्य विधाता चिल्लाते रहे, सुनो देश बाहुबली हो गया। दुनिया की सबसे तेज गति से विकास करने वाली अर्थ-व्यवस्था का अंग बने हम। लेकिन वे लोग करोड़ों की तादाद में थे। जो प्रसाद और अट्टालिकाओं से बहु मंजि़ली इमारतें हो जाने की इस अंधी दौड़ से बाहर हाशिए पर खड़े तालियां पीट रहे थे। न जाने कितना समय बीत गया। सोचा था बदलाव के नारे लग रहे हैं, इनका वक्त भी बदल जाएगा। लेकिन नारे तो नारे होते हैं, वे कभी धरती पर उतर कर फुटपाथों पर रेंगते नहीं। वे तो ऊंची इमारतों की फुनगियों पर टंगे रहते हैं। हां, उनसे पैदा हुआ ध्वनि प्रदूषण अवश्य इन फुटपाथों पर रेंगता हुआ। वह उन्हें उनकी औकात की याद दिला देता है।

सुरेश सेठ

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