Sunday, March 07, 2021 11:13 PM

भीड़ भरे देश का मौन सन्नाटा

देश को गरीबी के गर्त से निकालने के लिए यह आवश्यक है कि बचपन से ही बच्चों को उद्यमिता का पाठ पढ़ाया जाए, उद्यमिता के गुरों की जानकारी दी जाए, प्रतियोगिता को समझने और प्रतियोगिता के बावजूद अपने लिए नई पोज़ीशनिंग ढूंढने की कला किसी व्यवसाय की सफलता की गारंटी है। सवाल सिर्फ  यही है कि हम जॉब सीकर बने रहना चाहते हैं या जॉब प्रोवाइडर बनना चाहते हैं। बहुत से निजी संस्थान भी इस ओर ध्यान दे रहे हैं...

जब मैं इकोनामिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड या योरस्टोरी में पढ़ता हूं कि फलां-फलां स्टार्ट-अप कंपनी को 20 करोड़ की सीड फंडिंग मिल गई या फंडिंग के दूसरे राउंड में फलां-फलां कंपनी ने लाखों डालर की धनराशि प्राप्त की है तो मुझे बहुत खुशी होती है। अक्सर ऐसी कंपनियों के मालिक युवा होते हैं जो किसी आईआईटी या मैनेजमेंट स्कूल की पृष्ठभूमि के लोग हैं। चूंकि इन युवाओं के लिए बहुत से ऐसे मंच उपलब्ध हैं जहां उन्हें उद्यमिता यानी आंत्रप्रेन्योरशिप की ट्रेनिंग दी जाती है, मार्गदर्शन दिया जाता है, उन्हें अपने जैसे अन्य उद्यमी युवाओं और स्थापित निवेशकों से मिलने का मौका मिलता है, अतः उनकी राह कदरन आसान हो जाती है और वे न केवल उद्यमी बन जाते हैं बल्कि उद्यमी के रूप में उनकी सफलता के अवसर भी बढ़ जाते हैं। स्टार्ट-अप कंपनियों का क्रेज़ ऐसा है कि देश-विदेश की बड़ी-बड़ी कंपनियां और हस्तियां स्टार्ट-अप कंपनियों में बड़ी-बड़ी धनराशि का निवेश कर रहे हैं। रतन टाटा, नंदन नीलेकणी, एनआर नारायण मूर्ति जैसे नामचीन लोगों ने स्टार्ट-अप कंपनियों में पैसा लगाकर उन्हें नया जीवन देना शुरू किया है। इससे देश में उद्यमिता के लिए एक रचनात्मक माहौल तैयार हो रहा है जो निश्चय ही शुभ है। इससे अर्थव्यवस्था, देश और समाज, सभी को लाभ होगा। अब ऐसी संस्थाओं की कमी नहीं है जो उद्यमिता का पाठ उन लोगों को भी पढ़ाने के लिए तैयार हैं जो आईआईएम या आईआईटी में नहीं जा पाए या जो खानदानी व्यवसायी हैं, लेकिन छोटे व्यवसायों से आगे नहीं बढ़ पाए या जो अपना व्यवसाय करना चाहते हैं। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि वे लोग जो कभी रोज़गार की तलाश में रहते थे, अब उद्यमी बन गए हैं और रोज़गार खोजने वालों की कतार में शामिल होने के बजाय अन्य लोगों के लिए रोज़गार का सृजन करने लग गए हैं। यानी जॉब-सीकर्स से बदल कर वे जॉब-प्रोवाइडर्स बन गए हैं।

स्टार्ट-अप कंपनियों के प्रोमोटरों को सर्वप्रथम उद्यमिता की सैद्धांतिक जानकारी दी जाती है, फिर निर्माण परियोजनाओं की जानकारी दी जाती है, प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाने, बैंकों से कर्ज लेने की जानकारी के अलावा व्यवसाय शुरू करने की सहायक सेवाएं भी प्रदान की जाती हैं ताकि नया उद्यमी किसी भी पड़ाव पर कठिनाई न महसूस करे। इस दौरान उन्हें बिजनेस प्रोसेस, व्यावसायिक कानून, एकाउंटिंग के आधारभूत नियमों आदि की जानकारी के साथ-साथ स्थानीय परिस्थितियों को समझने, कच्चे माल की उपलब्धता, ट्रांस्पोर्टेशन सुविधा, खाते बनाना और संभालना, उत्पादों की कीमत तय करने का तरीका, बैंकों की भूमिका, वर्किंग कैपिटल का प्रबंधन आदि के अतिरिक्त क्वालिटी कंट्रोल, पैकेजिंग के नियम और तरीके, मशीनों के रखरखाव के आधारभूत नियमों आदि की जानकारी भी दी जाती है। उद्यमिता के क्षेत्र में प्रतियोगिता को समझना तो आवश्यक है ही, कच्चे माल की खरीद कब करें, कहां से करें, कैसे करें, किस दर पर करें आदि की जानकारी भी महत्त्वपूर्ण है। सच तो यह है कि बिक्री से तो लाभ हो ही सकता है, परंतु खरीद में बचाया गया हर पैसा वस्तुतः लाभ ही है। लाभ-हानि का खाता बनाना, फंड के सक्रिय स्रोतों की जानकारी रखना आदि भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इनके बिना किसी भी व्यवसाय का जीवन ज्यादा लंबा नहीं चल सकता।

 किसी पड़ाव पर बिजनेस इतना मजबूत हो जाता है कि उसे लाभ चाहे न हो, पर हानि भी न हो, यानी ब्रेक-ईवन प्वायंट की जानकारी, परियोजना की कम कीमत की जानकारी, लाभ-हानि का लेखा-जोखा, सरकारी संस्थाओं की भूमिका, लोन-रीपेमेंट आदि को समझना भी आवश्यक है। इससे भी बड़ी बात यह जानना आवश्यक है कि किसी विशेष व्यवसाय के लिए कितने सरकारी विभागों से अनुमति लेना अथवा लाइसेंस लेना आवश्यक है। इन संस्थाओं का मार्गदर्शन इसलिए आवश्यक है क्योंकि नया बना उद्यमी सारे नियम न जानता है और न जान सकता है। ऐसी सक्षमता वाली संस्थाएं नए उद्यमियों का मार्गदर्शन करके उन्हें कानूनी ढंग से अपना स्टार्ट-अप चलाना सिखा सकती हैं। उद्यमिता के कई लाभ हैं। पहला तो यह कि यह नए रोजगार के सृजन में सहायक है, दूसरा यह अर्थव्यवस्था के विकास में सहायक है, तीसरा इससे पैसे से पैसा बनता है और एक समय ऐसा भी आता है जब उद्यमी अपने उद्योग में समय लगाए बिना भी उससे पैसा कमा सकता है। उद्यमिता का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी रोज़गार प्रदान कर सकता है और उद्यमी की अगली पीढि़यों को अपने लिए रोजगार खोजने की समस्या से नहीं जूझना पड़ता। गरीबी के अभिशाप से बचने का सबसे बढि़या उपाय यही है कि देश में उद्यमिता को बढ़ावा दिया जाए। इसके लिए सरकारों की ओर से किए जाने वाले प्रयास इतने आधे-अधूरे हैं कि उनकी उपस्थिति ही महसूस नहीं होती और अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। निजी उद्योग और एनजीओ मिलकर भी कई कार्यक्रम चलाते हैं, जिनसे सीमित लाभ ही मिल पाता है।

 मोदी सरकार ने बहुत से अभिनव कदम उठाए हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए भी सरकार कोई सार्थक कदम उठाएगी। दरअसल आरक्षण, सब्सिडी आदि की बैसाखियों के सहारे चलना सीखना एक बात है और उसे जीवन भर का संबल बना लेना बिलकुल अलग बात है। यह खेद का विषय है कि हमारे देश में लोग मैरिट पर आगे बढ़ने के बजाय आरक्षण का सहारा लेने को आतुर हैं, चाहे उसमें कितना ही अपमान छिपा हो। अपमान सहकर भी पिछड़ी जातियों में शामिल होने की यह ललक केवल भारतीय समाज में ही है। उद्यमिता में ऐसी किसी बैसाखी की आवश्यकता नहीं होती। यहां आपकी कल्पनाशक्ति, मेहनत, मार्केटिंग और संपर्कों के बल पर अपने व्यवसाय को उन्नति के शिखर पर ले जा सकते हैं। अतः देश को गरीबी के गर्त से निकालने के लिए यह आवश्यक है कि बचपन से ही बच्चों को उद्यमिता का पाठ पढ़ाया जाए, उद्यमिता के गुरों की जानकारी दी जाए, प्रतियोगिता को समझने और प्रतियोगिता के बावजूद अपने लिए नई पोज़ीशनिंग ढूंढने की कला किसी व्यवसाय की सफलता की गारंटी है। सवाल सिर्फ  यही है कि हम जॉब सीकर बने रहना चाहते हैं या जॉब प्रोवाइडर बनना चाहते हैं। सरकार तो इस दिशा में काम करती ही है, बहुत से निजी संस्थान भी इस ओर ध्यान दे रहे हैं और कोविड के कारण उद्यमिता की महत्ता और बढ़ी है। इसी क्रम में ‘समाचार-मीडिया’ की ओर से 30 और 31 जनवरी को पत्रकारिता वर्कशॉप का आयोजन किया जा रहा है जिसमें पत्रकारिता का हुनर सिखाने के अलावा इस हुनर से उद्यमी बनने के विकल्पों के बारे में भी मार्गदर्शन दिया जाएगा। ऐसे ही सार्थक प्रयासों से देश की अर्थव्यवस्था को संबल मिलेगा और हम एक विकासशील देश से विकसित देश की श्रेणी में आ सकेंगे। यह खुशी की बात है कि सरकार, समाज और उद्योग मिलकर इस दिशा में काम कर रहे हैं जिससे गरीबी और बेरोज़गारी के अभिशाप से मुक्ति मिलेगी और हमारा युवा वर्ग और भी सामर्थ्यवान बन सकेगा।

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सरकार से तो यही अपेक्षा है कि जिला के खाली पदों को प्राथमिकता के आधार पर भरा जाए, विशेषकर शिक्षा, कृषि, बागवानी, चिकित्सा विभागों में...

आकांक्षी जिला चंबा हिमाचल का सबसे पिछड़ा जिला है। हिमाचल में क्षेत्रफल की दृष्टि से दूसरा सबसे बड़ा जिला होने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है। रावी, स्यूहल, चक्की, देहर और ब्राहल नदियों द्वारा इस धरा का प्रक्षालन होता है। इन सभी नदियों पर बनी जल विद्युत परियोजनाओं से 1500 मैगावाट विद्युत उत्पादन होता है। जलवायु उपोष्ण कटिबंधीय से शुष्क शीत मरुस्थलीय तक की विविधता लिए है। बिजली उत्पादन से 4 से 5 हजार करोड़ रुपए वार्षिक कमाने वाला जिला अच्छे सड़क नेटवर्क से भी वंचित है। बर्फबारी में जिला के अधिकांश भाग जिला मुख्यालय से कट जाते हैं। जिला के बीचों-बीच गुजरने वाला प्रस्तावित द्रमण-किलाड़ राष्ट्रीय राजमार्ग भी बट्टे खाते में पड़ गया है। चंबा-भरमौर सड़क जो तीन-चार विद्युत परियोजनाओं को जोड़ती है, बहुत ही बुरी हालत में है। आए दिन बंद रहती है और खड्डों से पटी पड़ी है। स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत भी खराब ही बनी रहती है, जिसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चंबा मेडिकल कॉलेज में ही 33 पद जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर के खाली हैं। कॉलेज के प्रिंसिपल का एक स्टेटमेंट समाचार पत्रों में आया था कि विशेष पैकेज घोषित करने के बावजूद डॉक्टर नहीं आ रहे हैं क्योंकि जिला पर पिछड़ेपन का ठप्पा लगा है। अभी भी यह स्थिति बदली नहीं है। शिक्षा विभाग में शिक्षकों के 5138 पद खाली हैं, बागवानी विभाग में विकास अधिकारियों के 14 में से 13 पद खाली हैं और कृषि विभाग का काम 25 फीसदी स्टाफ  से चलाया जा रहा है। ज्यादातर कर्मचारी चंबा में तैनाती को सज़ा मानते हैं। इस स्थिति से निकालने के लिए ही जिला को आकांक्षी जिला का दर्जा दिया गया था, जिसके बाद काफी उम्मीदें हैं, किंतु विकास की गति में मुख्य बाधक परिवहन और संचार माध्यमों को जब तक सुधारा नहीं जाता तब तक गति ढीली ही बनी रहने वाली है। इंटरनेट की स्पीड की भी बुरी हालत है, जबकि आज बच्चों की पढ़ाई भी ऑनलाइन हो रही है।

 ग्रामीण चिकित्सा व्यवस्था भी पिछड़ी हालत में है। चंबा क्षेत्र से लोग पठानकोट के निजी अस्पतालों में जाने को बाध्य हैं। दूरदराज के क्षेत्रों के लोग तो रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। भटियात इलाके के लोगों को कांगड़ा के स्वास्थ्य संस्थानों में भागना पड़ता है। छोटी-मोटी सुविधाओं का भी अभाव है। सिहुंता घाटी में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र खोलने की मांग दशकों से लटकी पड़ी है। प्रति व्यक्ति आय नवें पायदान पर 98006 रुपए है। 2011 से 16 के बीच प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि दर 7.31 फीसदी सबसे कम रही। आकार में दूसरे स्थान पर होने के बावजूद सकल जिला घरेलू उत्पाद 6372 करोड़ के साथ जिला सातवें स्थान पर रहा। इसी दौरान प्राथमिक क्षेत्र की वृद्धि दर माईनस 47 फीसदी ग्याहरवें पायदान पर, द्वितीय क्षेत्र की 5.18 फीसदी बारहवें पायदान पर और सेवा क्षेत्र में 15.82 फीसदी पहले पायदान पर रही। अर्थात कृषि, बागवानी, वन उपज आदि और उद्योगों में तो जिला पिछड़ता गया और सेवा क्षेत्र यानी नौकरी-मजदूरी की ओर मुड़ गया। अच्छी नौकरियों में भी जिला का स्थान पिछड़ा ही है, क्योंकि शिक्षा का स्तर ही पिछड़ा है। हां मजदूरी की ओर लोग मजबूरी में मुड़ते जा रहे हैं। कोरोना काल में चंबा के दर्जन से ज्यादा घोड़े वाले अरुणाचल प्रदेश में फंसे हुए पता चले थे। चंबा, हिमाचल निर्माण के समय जब हिमाचल में विलय हुआ था, तब अन्य पहाड़ी रियासतों में अग्रणी था। चंबा में बिजली 1910 में आ गई थी जब कांगड़ा जिला में भी बिजली नहीं थी। 1891 में शाम सिंह हॉस्पिटल का निर्माण हो गया था। 1876 में कुष्ठ रोग चिकित्सालय खुल गया था जो एशिया का पहला था। प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति देकर लाहौर कॉलेज शिक्षा हेतु भेजा जाता था।

 यही कारण रहा कि हिमाचल निर्माण के बाद चंबा के लोगों का राज्य स्तरीय प्रशासन में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। हिमाचल निर्माण के समय पंजाब के राजनेताओं का यह भरसक प्रयास था कि पूर्वी पंजाब की पहाड़ी रियासतों को पंजाब में मिला दिया जाए, किंतु यहां के लोगों ने इसके विरुद्ध जोरदार आवाज उठाई कि पहाड़ी क्षेत्रों का रहन-सहन, संस्कृति, भाषा आदि पंजाब से भिन्न है, अतः अलग पहाड़ी राज्य बनाया जाना चाहिए। भारत सरकार के रियासतों संबंधी मंत्रालय के सचिव वीपी मेनन ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय रियासतों के भारत में विलय की कहानी’ में इसका उल्लेख किया है। जाहिर है कि चंबा यदि पंजाब में चला जाता तो हिमाचल प्रदेश का गठन आर्थिक रूप से व्यावहारिक न माना जाता, जिस तर्क का प्रयोग उस समय पंजाब के नेताओं द्वारा किया जा रहा था और हिमाचल का गठन ही न हो पाता, किंतु चंबा ने हिमाचल गठन के लिए अग्रणी भूमिका निभाई और सोलन में हुई सभा में प्रजामंडल के प्रतिनिधियों ने भाग लेकर हिमाचल गठन में योगदान दिया। हालांकि तीन जिले महासू, सिरमौर और मंडी पूर्वी छोर पर थे और चंबा जिला पश्चिमी छोर पर था और बीच में पंजाब का कांगड़ा जिला पड़ता था। उस समय की राजनीति में चंबा का विशेष महत्त्व राज्य की आर्थिक व्यावहारिकता सिद्ध करने के लिए था। अतः जिला के विकास के लिए तदनुरूप ध्यान भी दिया गया। राज्य का पहला सामुदायिक विकास खंड जिला चंबा का भटियात बना। बिजली की लाइनें बिछाई गईं, द्रमण-चंबा सड़क का निर्माण शुरू हुआ, शिक्षा के प्रसार का कार्य हुआ। यानी प्रदेश के साथ कदम से कदम मिला कर जिला भी आगे बढ़ने लगा।

 1966 में विशाल हिमाचल का सपना जो हिमाचल गठन के समय देखा गया था, वह पूरा हुआ, किंतु जिला का राजनीतिक महत्त्व कम होता गया। ऐसा नेतृत्व जो पूरे जिला के विकास को ध्यान में रख कर बात करे, कम होता गया। स्थानीय जनता की भी भूमिका इसमें नकारात्मक ही रही जिसके अंतर्गत निजी कामों और कर्मचारियों की बदलियों को ही महत्त्व दिया गया। आज भी स्थिति कोई ज्यादा बदली नहीं है। जिला के पांच प्रतिनिधि एक आवाज में जिला की बात कम ही करते देखे जाते हैं। भौगोलिक रूप में भी जिला के भाग आपस में कटे हैं। आपस में भाषा की भी भिन्नताएं हैं, इसलिए एक आवाज के लिए विशेष राजनीतिक प्रयास होने चाहिए। हालांकि जिला में काफी विकास भी हुआ है, किंतु अन्य जिलों के मुकाबले हम पिछड़ते गए हैं। इस बात को समझा जाना चाहिए और मिलकर प्रयास करने चाहिए। सरकार से तो यही अपेक्षा है कि जिला के खाली पदों को प्राथमिकता के आधार पर भरा जाए, विशेषकर शिक्षा, कृषि, बागवानी, चिकित्सा विभागों में। साथ ही जीवन रेखा सड़कों की स्थिति सुधार कर आवागमन को सुविधाजनक बनाया जाए और संचार व्यवस्था को सुधारा जाए। इसी से विकास का पहिया स्थानीय संसाधनों जल, जंगल, जमीन के समुचित विकास और आमजन की भागीदारी वाले औद्योगीकरण की दिशा में घूम सकेगा। आशा है प्रदेश सरकार पिछली स्थितियों को बदलने की पहल करेगी।

सुरेश सेठ

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एक दिन जिस तरह एक चेहरा विहीन वायरस के भय से सब कुछ बंद करके इस भीड़ भरे देश को एक मौन सन्नाटे में धकेल दिया गया, उसी तरह अब इस सन्नाटे को तोड़ने की आवाज़ हो रही है। अंधेरा तब भी था, अभी तो शायद कुछ और गहरा हो गया। इस अंधेरे में पत्थर फेंक अंधेरा तोड़ने का आह्वान हो रहा है। ‘खोल दो, खोल दो’ माहौल एक नई चिल्लाहट से भर गया। सआदत हसन मण्टो की अप्रतिम कहानी ‘खोल दो’ की याद आने लगी। कहां से आया यह संहारक और संक्रामक वायरस। देखते ही देखते इसने सारी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले लिया। सम्पन्नता सन्न रह गई। बहुमंजि़ली इमारतों के शीर्ष भय से झुक गए। संक्रमण का एक बवाल मृत्यु का पैगाम ले पूरी दुनिया में लहराने लगा। दफ्तरों से लेकर प्रयोगशालाओं तक, मिलों से लेकर खेत-खलिहानों तक मनहूस मुर्दनी एक डरावनी चुप्पी बन कर पसर गई। धनी मानी इलाकों में भी भूखों के झुंड जि़ंदगी जीने की तलाश में जुटने लगे।

 विज्ञान शर्मिदा हो गया। उसके पास औषधि की तलाश की विज्ञप्तियां थीं, औषधि नहीं थी। मौत से जूझने के इश्तिहार थे, लेकिन उसके बाद संग्राम के नाम पर लाशों के ढेर थे, कि जिनके कफन-दफन की भी कोई व्यवस्था न थी। भारत इंद्रधनुषी सपनों के मायाजाल में जीता है। रोशनी की तलाश में उसे पिछली पौन सदी से अंधेरे को रोशनी मानने की आदत हो गई है। विकास और प्रगति के नाम पर उसे उसके आंकड़े जीने की आदत हो गई है। पूर्ण बंदी के हथियार से अपनी खिड़कियां और दरवाज़े बंद करके खुश होने का आग्रह किया गया कि आपने आसुरी शक्तियों के पांव रोक लिए। आओ इन्हें भगाने के लिए थालियां बजाएं और इस ध्वनि से इसके भगौड़ा हो जाने की घोषणा करके विजय यात्रा निकालें। मौत का अंधेरा घना होता जा रहा था। मारक संक्रमण के सिपहसालार विकास के साथ दुष्कर्म करने लगे, देश के हर राज्य में। इस अंधेरे को भगाने के लिए आओ दीये जलाएं, कहा गया।

 लेकिन दीयों की रोशनी में धूमधड़क्का तो नहीं होता न। लेकिन सब कुछ बेअसर। मौन निश्चल होती किसी अंधेरे बिस्तर पर पड़ी देश की अर्थ-व्यवस्था की तरह। पूरे माहौल में बीमारी से अधिक भुखमरी का क्रंदन फैल गया। लुटे-पिटे बेसहारा लोग हर अगले दिन को और भी आदमखोर हो जाता देखते रहे, छुट गए हाथ के हंसिये हथौड़े। छिन गईं सिर की छतें। मंजि़ल की तलाश में निकले थे, अब प्राप्त मंजि़लें भी जैसे अजनबी हो गईं। लाखों की भीड़ अपनी जड़ों से उखड़ गई। उसे कहां जाना है, किसी को खबर नहीं। बस, नंगे पांव, कंधों पर परिवार लादे, पैदल पथ की पहचान न करते हुए राह के छालों को गले लगाते नज़र आने लगे। यह मेहनत की पराकाष्ठा नहीं, एक बार फिर से रोज़ी-रोटी के लिए हाथ फैलाने की नौबत थी। अंधेरे में भटकते हुए यह कारवां दिशाहीन हो गए। बाहुबली हो जाने वाली अर्थ-व्यवस्था इस अभागी लड़की की तरह दीन-हीन बनी कि जिसकी जि़ंदगी की अंधेरी बंद खिड़कियों और कमरों को देख कर किसी स्वनाम-घन्य डाक्टर ने कभी इसके लिए कहा था, ‘खोल दो।’ लेकिन एक बदहाल अर्थ-व्यवस्था एक नुची पिटी लड़की तो नहीं होती, जो कुछ और सुने और कुछ और कर दे। खिड़कियां को खुलनी ही थीं, खुल जाएंगी, रास्ते अवरुद्ध थे, इन्हें एक दिन तो खुलना ही था, खुल जाएंगी। लेकिन इन लस्त-पस्त कारवांओं को कैसे तलाश कर फिर वापस लाओगे, जो इस गहरे होते अंधेरे से बनवास लेकर रोशनी की आस की ओर बढ़ गए थे। उस ओर जहां एक और अंधेरा उनका इंतज़ार कर रहा था।