Tuesday, December 07, 2021 04:31 AM

सादा जीवन, उच्च विचार की लंगोटी!

वे मेरे पास ‘सादा जीवन-उच्च विचार’ की लंगोटी लेकर आए और बोले-‘शर्मा तुम इसे पहन लो, अब यह मेरे कोई काम नहीं आ रही। बच्चे कहते हैं, इस युग में यह अपने घर में अच्छी नहीं लगती। तुम तो खुद सिद्धांतवादी हो, इसे पहन लोगे तो पक्के उसूलवादी बन जाओगे। मेरे यहां तो यह बीस वर्षों से खूंटी पर टंगी गंदी हो गई है। किसी बढि़या डिटर्जेंट से धोकर पहन लेना, सच्चे आदर्शवादी बन जाओगे।’ मैंने कहा-‘श्यामलाल जी, कोठी, बंगला, कार और नौकर-चाकर वाले हो गए तो तुम्हारे लिए यह सादा जीवन-उच्च विचार की लंगोटी अप्रासंगिक हो गई। मैं आपकी इस लंगोटी का क्या करूंगा। मैंने तो ऑलरेडी पहले से ही पहन रखी है और इसी से मेरा जीवनयापन हो रहा है, वरना पांच-सात हजार के वेतन से मेरे बंटता क्या है? उसूलों से और सादगी से रहता हूं तो गुजारा हो जाता है वरना भूखों मरने की नौबत है।’ श्यामलाल जी जिद पर अड़े थे, बोले-‘तुम एक और लंगोटी पहन लो, गुजारा और आसान हो जाएगा, मैं इसे फेंक भी नहीं सकता।

 विचार का अपमान मुझे अच्छा नहीं लगता। बच्चे एमएनसी में लगे हुए हैं, मैं पार्षद हूं। अच्छा कमा लेते हैं, अब सादा जीवन-उच्च विचार को हमारे यहां पूछने वाला कोई है नहीं। पोते-पोती कान्वैंट में पढ़ते हैं। पीजा-बर्गर और चाकलेट का सादा जीवन से कोई मेल नहीं। उच्च विचार जबसे राजनीति में आया हूं, तब से बेमानी हो गए हैं, इसलिए भैया मुझे इस बोझ से हल्का तुम ही कर सकते हो। अभी तुम इस बोझ को लादे हुए हो, इसलिए थोड़ा सा वजन और सही। घर इसे लेकर जाऊंगा तो इसकी बहुत बुरी गत होगी।’ तभी मेरी पत्नी आ गई, वह आकर बोली-‘श्यामालाल जी आज कैसे हम गरीबों के आना हुआ ? और घर में सब ठीक-ठाक तो है न ?’ श्यामलाल जी बोले-‘घर में तो सब ठीक हैं भाभी, यह सादा जीवन-उच्च विचार की लंगोटी शर्मा जी को देने आया था, परंतु ये भी ना-नुकर कर रहे हैं। तुम्हीं समझाओ न, ये इसे भी पहन लें।’ पत्नी ने कहा-‘शर्मा जी ने तो भैया, पहले से ही पहन रखी है और इसी से काम चल रहा है।

 मेरा कहा मानो तो दिखाने और वोटर को धोखा देने के लिए आप पहन लो। आजकल बड़े आदमियों की जीवन शैली यही है। अंदर से अलग और बाहर कुछ और। हमने तो इसे आदर्श मानकर अपना रखा है, आपके चुनाव में काम आएगी।’ ‘उसके लिए तो भाभी मेरे पास हजार पैंतरे और बहाने हैं। वे काम आते हैं। चुनाव आजकल इससे नहीं जीता जाता। वोटर को भी प्रलोभन देकर उसका वोट हांसिल किया जाता है। हम राजनेताओं के चेहरे एक नहीं, अनेक हैं वर्ना हमें जीने कौन दे? काजल की कोठरी में रहते-रहते पूरे काले हो गए हैं। पचास भला-बुरा सुनते हैं, तब राजनीति से कमाकर खाते हैं।’ श्यामलाल जी बोले, तो पत्नी ने कहा-‘हमें मत समझाओ श्यामलाल जी, हम आज की राजनीति और राजनेताओं को भली प्रकार से जानते हैं। जीवन में कुछ भला भी करो। इस धिक्कारपूर्ण छल-कपट के कोटर से बाहर निकलकर भी देखो। आदमी दो रोटी ही खाता है, नोट नहीं।’

पूरन सरमा

स्वतंत्र लेखक