Friday, October 30, 2020 04:04 AM

सियासत का वही जिक्र

इस बार  हिमाचल विधानसभा के मानसून सत्र के पास कोविड-19 का प्रभाव और इस दौर से निकलने का दबाव था, लेकिन सियासत है कि मानती नहीं और बहस है कि रुकना जानती नहीं। ऐसे में कांग्रेस के वाकआउट में सियासत और वकालत साथ-साथ चलीं। कम से कम इस दृष्टि से देखें तो राज्य की प्राथमिकताएं उन्हीं दरख्वास्तों पर चलीं, जैसे पहले की बहस ही महिफल कोई राग सुना गई। निगाहें तो हर विधायक के करीब लगी रहीं, लेकिन जो बोले खूब बोले और समीक्षा की दृष्टि से सदन की हलचल नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री, माकपा सदस्य राकेश सिंघा व कांग्रेस विधायक जगत सिंह नेगी के आसपास रही। सदन की व्यस्तता में शरीक होने का अपना अंदाज रमेश धवाला, वन मंत्री राकेश पठानिया और शहरी विकास मंत्री सुरेश भारद्वाज दिखा गए और इसी तरह कुछ स्थायी फिकरे चक्कर लगाते रहे। मसलन हिमाचल विधानसभा का कोई भी सत्र हो, धारा 118 का निमंत्रण बरकरार व असरदार तो होगा ही। यह विपक्ष और सत्ता के आचरण में हमेशा घुसपैठ करता है और कमोबेश हर पार्टी की सरकार इसे राजनीतिक वजीफे की तरह बांटती है। इसी तरह टीसीपी एक्ट भी पापी बनकर आता है और कमोबेश हर सरकार का आश्वासन रहता है कि फलां-फलां गांव इसके दायरे से बाहर होंगे, इस बार भी इसके अलावा न कुछ हुआ और न ही पूछा गया।

बेशक नगर निगम बनाने की दलीलों में आबादी का आंकड़ा घट कर चालीस हजार हो गया, लेकिन लाख टके का सवाल तो यह है कि सरकार कितने शहरों को आगे बढ़ाना चाहेगी। क्या शहरीकरण की अवधारणा में पक्ष-प्रतिपक्ष ने खुद को रेखांकित किया या कल के हिमाचली शहर कैसे होंगे, इस पर कोई आशाजनक खाका सामने आया। बेशक मसलों और मुकाबलों में दोनों पक्ष अपने-अपने हाथियों पर सवार रहे, लेकिन कोरोना की गिरफ्त में फंसे प्रदेश को आगे बढ़ाने की सहमति दिखाई नहीं दी। विधानसभा अध्यक्ष विपिन सिंह परमार ने बहस के बीच खड़ी कांग्रेस को हिदायत दी है, तो जाहिर है सुर्खियों में विपक्ष की भूमिका का विषाद रहा है, फिर भी हर वाकआउट का बहाना नहीं हो सकता। अगर सत्ता की बात में नेहरू-गांधी परिवार  पर तंज होंगे, तो विपक्ष को भी सदन से बाहर निकलने में आनंद मिलेगा। यही अनगढ़े मुद्दों का आनंद है, जो सार्थक चर्चा से बाहर निकल कर तू-तू, मैं-मैं में बंट जाता है। आश्चर्य यही कि इस सदन की सूचनाओं में कई खाइयां, कई विकृतियां और कई संताप उभरते हैं, लेकिन कहने की बजाय सियासत अपना जिक्र चुनती है। तीन साल में 1134 बलात्कार या पुस्तकालय सहायक के 771 पदों का रिक्त होना, एक बड़ी बहस के बिंदु हो सकते थे। प्रदेश की आर्थिक स्थिति का कर्ज और मर्ज बढ़कर अगर चिंता का विषय नहीं, तो हिमाचल की इन सलवटों को कौन दूर करेगा।

कर्ज की रफ्तार अगर 9.6 प्रतिशत दर से अग्रसर है, तो यह विषय वर्तमान सरकार का नहीं, कांग्रेस भी तो अपनी नीतियों की भागीदार है। ऐसे विषयों पर समूचा राज्य तभी सोचेगा, अगर सत्ता और विपक्ष की तहजीब में जवाबदेही का आगाज हो। इसी तरह नई शिक्षा नीति के लाभ और हानि में दोनों पक्षों ने हाथ धो लिए, लेकिन उस आधारभूत प्रश्न का कोई उत्तर नहीं ढूंढा,जो यह तय करे कि पांचवीं तक की पढ़ाई में हिमाचल की मातृभाषा क्या होगी। सरकार की ओर से पर्यटन घाटे का जिक्र हुआ तो कुल 57.78 करोड़ का घाटा सामने आया, लेकिन यहां सवाल हर छोटी-बड़ी निजी पर्यटन इकाई के घाटे का भी है। पूरे पर्यटन और परिवहन के उजड़ते चमन की चीख अगर विधानसभा परिसर तक नहीं पहुंची, तो विपक्ष के सारे वाकआउट भी बेकार गए। जनता के मुद्दे और हैं, लेकिन सियासी मुद्दों की जागीर वही- कभी इस पक्ष तो कभी उस पक्ष।

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