Tuesday, August 11, 2020 12:08 AM

सियासी फिजूलखर्ची का भंवर

हिमाचल प्रदेश की तारीफ यूं तो राष्ट्रीय स्तर पर बड़े राज्यों के सामने एक बड़े कद में होती है,लेकिन समूची आर्थिकी और वित्तीय प्रबंधन के कई मुगालते सामाजिक दृष्टि को भ्रमित करते  हैं। एक तो राज्य अपने कद से कहीं अधिक ऋण उठाकर वित्तीय प्रबंधन के तर्क भूल गया है,दूसरे राज्य ने आज तक न अपनी वित्तीय चादर की पैमाइश की और न ही अनावश्यक खर्चों पर रोक लगाई। राज्य का बजट पूर्णतः केंद्र की मदद का गवाह है और इसलिए ऐसी परंपराएं बन गईं कि जनता से कर न वसूला जाए। तारीफ भी इसीलिए होती है क्योंकि हिमाचल हमेशा केंद्रीय योजनाओं का सौ फीसदी अनुपालन करते हुए सौम्य दिखता है, जबकि आंतरिक खर्चों का हिसाब निरंतर खतरनाक संकेतों से अटा पड़ा है। अब इसी का गवाह बनकर फिर से हजार करोड़ का नया ऋण उठाने की तैयारी में सरकार की तस्वीर सामने आ रही है। इसे हम कोरोना का दुष्प्रभाव  मान लें या यह भी कि केंद्र करों की हिस्सेदारी नहीं दे पा रहा है, लेकिन हर ऋण एक दुष्चक्र के मानिंद कुछ क्षण की राहत है। वर्तमान स्थिति में जब पुराने ऋण की वापसी के लिए ही नया कर्ज वांछित है, तो यह घातक चक्रव्यूह है। विडंबना यह भी है कि प्रदेश कर्ज के मोह और कर्ज के जाल के बीच अपना वित्तीय संतुलन नहीं टटोल रहा है,जबकि यही एक राज्य है जहां निजी तौर पर नागरिक भी प्रदेश के माथे पर आर्थिक लकीरें नहीं पढ़ते। कभी किसी सियासी मंच या चुनावी प्रचार में हिमाचल की आर्थिक चर्चाओं को स्थान नहीं मिलता, बल्कि राज्य के अनावश्यक खर्चों की तश्तरी में सत्ता को आश्रय मिलता है। प्रदेश का अनावश्यक वित्तीय बोझ इसलिए भी हैरान करता है कि यह किसी बड़े परिवर्तन का सूचक न होकर, राजनीतिक फिजूलखर्ची का भंवर बन चुका है। क्या कभी किसी सरकार ने यह आकलन किया कि राज्य ने ऋण उठाकर ऐसा क्या किया कि प्रदेश में आर्थिक गतिशीलता बढ़ जाए। बजटीय हिसाब  बताता है कि हर सौ रुपए की आमदनी में केंद्रीय शुल्क और राज्य कर महज 32 रुपए जुटाते हैं, जबकि ग्रांट इन एड 44 रुपया अर्जित करती है। इस साल आमदनी के कर रहित राजस्व में 5, लोक ऋण 16 तथा 3 रुपए अग्रिम जोड़ कर राज्य चल रहा है। सरकार लगभग 62 फीसदी खर्च सामान्य और सामाजिक सेवाओं में खर्च कर रही है,जबकि ऋण वापसी और ब्याज आदायगी पर ही बजट का सतरह फीसदी धन खर्च हो रहा है। बजट के माध्यम से अगर पेंशन भुगतान पर सतरह फीसदी व्यय हो रहा है, तो कर्मचारियों की तनख्वाह जोड़ कर यह आधे से अधिक यानी 54.99त्न बजट चूस जाता है। कुल मिला कर राज्य बजट का सत्तर फीसदी से अधिक हिस्सा पूरी तरह एक मायाजाल है, जबकि बाकी बचे तीस प्रतिशत से भी कम राशि में विकास और भविष्य का गठबंधन ढूंढा जाता है। ऐसे में हिमाचल का अपना बजट अगर कसूरवार नहीं है, तो भी इसमें बढ़े कर्ज बोझ के प्रति बेचैनी नहीं है। खास तौर पर जिस तरह प्रदेश में टॉप हैवी एडमिनिस्ट्रिशन का बोझ बढ़ गया है, उसे न्यायोचित नहीं माना जा सकता। सरकार का अपना आकार व प्रकार ही हर साल बजट की हजामत करता है, लेकिन आज तक न तो आर्थिक सुधारों के प्रति कोई संवेदना जागृत हुई और न ही खर्चों में कटौतियों पर विचार हुआ। सरकार के अपने उपक्रम घाटे में हैं,जबकि निजी क्षेत्र को फलने-फूलने के लिए उचित नीतियों का अभाव है। यह दीगर है कि वर्तमान जयराम सरकार ने निजी निवेश का एक खाका पेश किया और जिसमें कुछ हद तक प्रगति भी हुई, लेकिन सियासी प्राथमिकताएं आड़े आ रही हैं। कोरोना काल में जिस तरह निजी स्कूलों और बसों के संचालन पर सरकार पर राजनीतिक दबाव रहे, उसे देखते हुए यह नहीं लगता कि निजी क्षेत्र को समझने में राज्य सफल रहा है। कमोबेश हर सरकार के सामने उसी चक्र को घुमाने की अनिवार्यता बना दी जाती है, जिस पर चलते हुए राज्य को पचास हजार करोड़ से भी अधिक ऋण उठाने की वजह मिल जाती है। हम उधार की पूजा से हिमाचल के जिस वर्ग को बढ़ावा दे रहे हैं, वह भी प्रदेश के हित में अपनी क्षमता की वापसी में कर नहीं चुकाता। ऐसे में ऋण का बढ़ता बोझ कब तक सरकारों की दरियादिली से फूलता रहेगा या कभी राज्य इसकी जवाबदेही में सुधार के कुछ कदम उठाने की जुर्रत करेगा।

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