Saturday, January 23, 2021 07:44 PM

सोनिया कांग्रेस में अंतर्कलह: कुलदीप चंद अग्निहोत्री, वरिष्ठ स्तंभकार

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

कुछ सीटें आ जाती तो राज्यसभा का दरवाजा खुल सकता था। सिब्बल जैसे लोगों की जरूरत सोनिया कांग्रेस को हर वक्त रहती है। भ्रष्टाचार के इतने मामले कचहरियों में इस पार्टी के नेताओं पर चल रहे हैं कि आदमी हलकान हो जाए। कभी जेल, फिर जमानत। तारीख पर तारीख। कपिल सिब्बल जैसे लोग सब संभालते हैं। हम काहे के लिए हैं, आप चिंता मत करो। कानून उनका प्रोफेशन है। अब प्रोफेशन है तो फीस तो लेनी पड़ेगी। इसमें अपने-पराए का लिहाज नहीं होता। घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खाएगा क्या? कई बार मुवक्किल पूछ लेता है कि फीस कैश में लेंगे या काईंड में? राजनीतिक केसों में यही फायदा है। राज्यसभा की सीट भी फीस में मिल सकती है। यह तभी संभव है जब मुवक्किल की औकात इस प्रकार की फीस अदा करनी के लिए बची रहे या बनी रहे। इसीलिए चिट्ठी-पत्र लिखना शुरू किया था…

बिहार विधानसभा चुनावों के नतीजे ने सोनिया कांग्रेस के भीतर कलह को तेज ही नहीं किया, उसे सतह पर भी ला दिया है। दरअसल बिहार में जब लालू परिवार ने चुनाव लड़ने के लिए महागठबंधन बनाया तो उसमें नक्सलवादियों से लेकर सोनिया कांग्रेस तक सभी को शामिल किया। उसमें किसी विचारधारा का तो प्रश्न ही नहीं था, किसी न किसी तरीके से सत्ता प्राप्त करना ही उद्देश्य था। लालू परिवार और सोनिया परिवार दोनों को ही आभास था कि यदि सत्ता न मिली तो परिवार से जुड़े लोग इधर-उधर भागना शुरू कर देंगे और परिवार का अपना भविष्य धूमिल हो जाएगा। लालू परिवार को सत्ता के इस खेल में शामिल हुए अभी कुछ दशक ही हुए हैं, सोनिया परिवार सत्ता के इस खेल में पुराना है।

वैसे भी वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की विरासत को भी अपने साथ जोड़ कर और भी पुराना दिखने का प्रयास करता रहता है। पुराने शरीर का एक लाभ भी रहता है। वह थोड़ी सेवा-संभाल से उम्र से चिकना दिखाई देता रहता है, लेकिन भीतर से खोखला हो टिका होता है। परंतु उम्र से चिकना दिखाई देने के कारण कई बार उसे सौदेबाजी में लाभ रहता है। यही लाभ सोनिया परिवार ने लालू परिवार के साथ महागठबंधन की सौदेबाजी में लिया। उसने अपने लिए सौ से भी ज़्यादा सीटें मांग लीं। विधानसभा की कुल सीटें ही 243 हैं, उसमें से यदि सौ सीटें सोनिया परिवार को दे दीं तो बाकी लोग क्या केवल ‘राहुल जी संघर्ष करो, हम आपके साथ हैं’ ही गाएंगे? वैसे भी बिहार में लालू परिवार से अच्छा कौन जानता है कि इतनी सीटों की औकात सोनिया कांग्रेस की नहीं है। लेकिन डरा हुआ आदमी सच्चाई जानते हुए भी उससे बचता है। यदि कांग्रेस महागठबंधन में शामिल न हुई तो लालू परिवार गद्दी पर नहीं बैठ सकेगा। यही प्रश्न लालू परिवार को डराता रहा और कांग्रेस ने सत्तर सीटें झटक लीं। लेकिन प्रश्न है कि सोनिया कांग्रेस ने उन सीटों का करना क्या था जब उनको खुद ही पता था कि बुढ़ापे में यह बोझ उनके संभालने का नहीं है। कांग्रेस सत्तर में से केवल 19 सीटें जीत पाई। मेला खत्म हो जाने के बाद लालू परिवार तो रो रहा है कि सोनिया कांग्रेस के कारण गद्दी हाथ से निकल गई, लेकिन कांग्रेस के भीतर लड़ाई के मुद्दे दूसरे हैं।

भीतर के लोग ही आरोप लगा रहे हैं कि सत्तर सीटें झपट लेने वाले सोनिया कांग्रेस के बिहारी मालिक भी जानते थे कि सीटें जीती नहीं जाएंगी, लेकिन टिकट बेच कर पैसे तो कमाए जा सकते हैं। भागते चोर की लंगोटी सही। इसलिए कांग्रेस में ही आरोप लग रहे हैं कि पैसे लेकर प्रत्याशी खड़े कर दिए। तो क्या सोनिया कांग्रेस के बिहारी कर्ता-धर्ता सरकार बनाने के लिए नहीं लड़ रहे थे? सोनिया जी, राहुल जी चाहे न मानें लेकिन बिहार में आम कांग्रेसी ने मान लिया है कि यहां कांग्रेस में प्राण-प्रतिष्ठा मुश्किल काम है। इसलिए जब तक शरीर पड़ा है, तब तक उसी से पैसा कमा लिया जाए। बिहार में कांग्रेस के भीतर इन्हीं आरोपों-प्रत्यारोपों की जंग छिड़ी हुई है। इस जंग में कांग्रेस का ही एक दूसरा समूह कूदा है। वैसे उसने कूदना तो कुछ महीने पहले से ही शुरू कर दिया था। बाकायदा सोनिया जी को चिट्ठी-पत्री लिखनी शुरू कर दी थी कि कांग्रेस हार रही है, विधानसभाओं में  सीटें नहीं आ रही हैं, यह चिंता का विषय है। चिट्ठी लिखने वालों ने कुछ ऐसे फार्मूले भी बताए थे कि विधानसभा में कांग्रेस सीटें वगैरह कैसे जीत सकती है। लेकिन शायद उस वक्त उनके उन नायाब फार्मूलों पर कांग्रेस ने ध्यान नहीं दिया। अलबत्ता दूसरे ग्रुप ने थोड़ी डांट-डपट भी कर दी। दूसरे ग्रुप का कहना था कि चिट्ठियां लिखने वाले तथाकथित नेताओं का आम जनता से कुछ लेना-देना नहीं है। अपने बलबूते ये पंचायत का चुनाव तक नहीं जीत सकते, ये दूसरों की कमाई पर राज्यसभा में जाने वालों की फौज है, जिनका पार्टी से कुछ लेना-देना नहीं है। कपिल सिब्बल जैसे अति प्रतिष्ठित नेता लगता है, इससे आहत भी हुए। लेकिन आहत होने से कुछ नहीं होता। कर्मशील आदमी उद्यम करना नहीं छोड़ता। बिहार विधानसभा चुनावों पर निगाह टिकी थी।

कुछ सीटें आ जाती तो राज्यसभा का दरवाजा खुल सकता था। सिब्बल जैसे लोगों की जरूरत सोनिया कांग्रेस को हर वक्त रहती है। भ्रष्टाचार के इतने मामले कचहरियों में इस पार्टी के नेताओं पर चल रहे हैं कि आदमी हलकान हो जाए। कभी जेल, फिर जमानत। तारीख पर तारीख। कपिल सिब्बल जैसे लोग सब संभालते हैं। हम काहे के लिए हैं, आप चिंता मत करो। कानून उनका प्रोफेशन है। अब प्रोफेशन है तो फीस तो लेनी पड़ेगी। इसमें अपने-पराए का लिहाज नहीं होता। घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खाएगा क्या? कई बार मुवक्किल पूछ लेता है कि फीस कैश में लेंगे या काईंड में? राजनीतिक केसों में यही फायदा है। राज्यसभा की सीट भी फीस में मिल सकती है। यह तभी संभव है जब मुवक्किल की औकात इस प्रकार की फीस अदा करनी के लिए मुवक्किल की औकात  बची रहे या बनी रहे। इसीलिए चिट्ठी-पत्र लिखना शुरू किया था मुवक्किल को कि अपनी औकात बनाए रखो। वह जमा पूंजी खत्म हो गई तो आपकी तो आप जानो लेकिन हमारा क्या होगा? यही प्रोफेशन की ईमानदारी है। समय-समय पर मुवक्किल को सचेत करते रहना चाहिए। लेकिन कोई सुने तब न! बिहार पर आशा थी, लेकिन सब गुड़-गोबर हो गया। इसलिए कपिल सिब्बल ने सिर धुन लिया। पार्टी से पूछा कि आपने क्या हार को अपनी नियति मान लिया है? कांग्रेस पार्टी के लोकसभा में नेता अधीर रंजन चौधरी ने बहुत गहरी चोट कर दी। उस गहरी चोट का दर्द सिब्बल ही समझ पाएंगे। चौधरी ने कहा, नियति को छोड़ो, बंगाल में चुनाव सिर पर हैं, उसके लिए कुछ गांठ ढीली करो। सिब्बल बेचारे क्या करें? पार्टी के लिए इतना कुछ किया। कई नेता जेल जाने से बचाए। आज पार्टी ने यह कीमत डाली। आशा करनी चाहिए लड़ाई जिस दिशा में आगे बढ़ रही है, उसमें कई नए खुलासे होंगे।

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