Saturday, September 26, 2020 07:47 AM

सबसिडी की रोटी नहीं

इस फैसले की अमानत में हिमाचली चरित्र और चाल चलन की समीक्षा होगी, फिर भी यह पहला अवसर है जब कर्मचारियों की जेब से सरकार ने कुछ सिक्के चुरा लिए। राशन पर सबसिडी हटाने की मुहिम में हिमाचल अपने आयकर दाताओं को सर्वप्रथम पाठ पढ़ा रहा है। पहले चरण में साठ हजार कर्मचारियों के हिस्से की सबसिडी कट करके खजाने की हिफाजत कर रही है, तो अभी इस कतरब्योंत की अगली कडि़यों में एक बड़ा वर्ग सामने आएगा।

निश्चित रूप से यह सरकार का एक साहसी कदम है, जिसका यथार्थपरक मूल्यांकन होना चाहिए। राशन में सबसिडी का चुनावी भाषण कांग्रेस ने सर्वप्रथम दिया था, जबकि न इसकी जिरह थी और न ही जरूरत, बल्कि  इसके कारण एक निठल्लापन हिमाचल में पसर गया। देश की कई अन्य ऐसी योजनाओं के लाभ में पलती गरीबी का आवरण काफी मजेदार है और इसे ओढ़कर चलने के लाभ अनगिनत हैं। आंकड़े बताते हैं कि नब्बे के दशक से हिमाचल की प्रगति ने गरीबी के कई कंकाल दफन कर दिए और आज की हकीकत में यह अंगीकार करने भर की देरी है कि यहां अब गरीबी रेखा के नीचे कोई नहीं रहता।

इस परिवर्तन में सामाजिक उत्थान के कई अनुकरणीय उदाहरण बने हैं, जिसका जिक्र विश्व बैंक की रिपोर्ट में भी हुआ। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक 1993-94 और 2011 के बीच ग्रामीण गरीबी 36.8 प्रतिशत से सिकुड़ कर 8.5 फीसदी हो गई जो पड़ोसी राज्यों से कहीं हटकर हिमाचल की अति सुंदर तस्वीर पेश करती है। राष्ट्र की गरीबी पर आई 2011 की रिपोर्ट बताती है कि देश की न्यूनतम गरीबी दर पर जो तीन राज्य रहे, उनमें गोवा व केरल के बाद हिमाचल का उल्लेख है। प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि दर (2019-20) में 6.6 प्रतिशत इजाफा हो रहा है, तो यह मानना पड़ेगा कि राज्य को अपने संसाधनों का किस क्षेत्र में बेहतर इस्तेमाल करना होगा। ऐसे में फूड सबसिडी के लिए निर्धारित 230 करोड़ की बचत के मायने, पहली बार सियासी लोकप्रियता के सामने खड़े हुए हैं।

आरंभिक दौर में अगर आयकर-दाताओं से राशन की सबसिडी छीनी जा रही है, तो इसी भावना में राज्य को अपने अनावश्यक खर्चे भी कम करने होंगे। साठ हजार कर्मचारियों की सबसिडी रोकना तभी सार्थक होगा अगर सरकार भी अपने व्यय पर अंकुश लगाते हुए बचत करे। ऐसे कई लाभ के पद हैं, जहां महज राजनीतिक स्वार्थ के लिए संसाधन लुटाए जाते हैं। इसी तरह घाटे के ग्यारह बोर्ड-निगमों पर लदे 3629 करोड़ के लिए जवाबदेही तय की जाए, तो समझ में आ जाएगा कि करना क्या चाहिए। आश्चर्य तो यह कि विद्युत बोर्ड 2038 करोड़ के घाटे का करंट राज्य के बजट को दे रहा है, तो एचआरटीसी 1232 करोड़ का नुकसान उठा कर राजनीतिक फरमाइशें पूरी कर रही है। क्या एचआरटीसी की स्थिति सुधारने के लिए अनावश्यक डिपो बंद करने की जहमत सरकार उठा पाएगी या विभागीय युक्तिकरण से कुछ अतिरिक्त बोझ कम किया जाएगा। कहना न होगा कि हिमाचल ने अपनी सियासी परिभाषा को गढ़ते -गढ़ते कर्ज का बोझ पचपन हजार करोड़ तक पहुंचा दिया, जबकि ऐसे हालात के बीच न जवाबदेही और न ही पारदर्शिता तय हुई।

बहरहाल फूड सबसिडी की चटाई पर हुआ व्यय तो देखा जा रहा है, लेकिन संपूर्ण कर्ज की व्यवस्था पर जब तक हाथ नहीं डाला गया, कोई बड़ी राहत राज्य के घाटे के बजट को नहीं मिलेगी। इसी के साथ समस्त सरकारी कार्य संस्कृति तथा निजी क्षेत्र की भागीदारी को नए स्तर पर पहुंचाने की चुनौती को समझना होगा। कुल मिलाकर फूड सबसिडी को इतिश्री कहने में आयकर दाताआें का योगदान सामने आ रहा है। भले ही अभी जबरदस्ती इस वर्ग को पुण्य कार्य का भागीदार बनाया जा रहा है, लेकिन इसके माध्यम से फर्जी गरीबी का चोला एक दिन जरूर उतरना चाहिए। हिमाचल की वास्तविक तरक्की तथा सामाजिक उत्थान तभी साबित होगा, जब बीपीएल परिवारों की सूची शून्य हो जाएगी। राष्ट्र के सामने हिमाचल ऐसा पहला राज्य बनने को अग्रसर है और अगर इस आदर्श को स्थापित कर पाया तो नीतियों और कार्यक्रमों के अर्थ भी बदलेंगे।

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