Saturday, November 28, 2020 02:15 AM

सुशांत की ताल ठोंक पार्टी

हमेशा अपने आक्रामक तेवरों के लिए पहचाने गए डा. राजन सुशांत अंततः अपने अंतिम हथियार को  भांजते हुए हिमाचल के सियासी मैदान में रेखांकित हो रहे हैं। विजयदशमी के दिन वह केवल एक पार्टी की शुरुआत नहीं करते, बल्कि कांग्रेस व भाजपा के सामने अपनी राजनीति का नया शस्त्र पूजन भी करते हैं। देखना यह होगा कि वह अपने तेवरों के मरीज, फकीर या शासक बनते हैं और सियासी युद्ध में कितनी रियासतें जीत पाते हैं। पार्टी गठन के प्रत्याशित सफर पर वह कितने मुद्दे, कितनी विरासत और कितनी हस्ती जोड़ पाते हैं, यह रोचकता भरा संघर्ष होगा। बेशक तीसरे मोर्चे की फेरी लगाकर पहले भी सियासी अठखेलियां हुईं, लेकिन अंत में सत्ता के सामने खड़े होने का सामर्थ्य न मेजर मनकोटिया और न ही पंडित सुखराम सरीखे नेता दिखा सके। हिमाचल में राजनीति के फिलहाल दो ही पहलू रहे और इस तरह सत्ता और विपक्ष के बीच तीसरे मोर्चे के लिए न स्थान और न ही स्वाभिमान रहा।

 यह दीगर है कि अपने प्रयोगों की वजह से सुशांत खुद के अनुभव को मांज कर चुनावी मोर्चे पर सबसे पहले मुखर हुए हैं। इस तरह क्या वह विपक्षी कांग्रेस का ‘स्पेस’ खा लेंगे या सत्ता के सामने सबसे बड़े सवाल की मचान पर बैठकर कोई शिकार करेंगे। भाजपा और कांग्रेस की संगठनात्मक ताकत कमोबेश एक जैसी यानी तीस से पैंतीस फीसदी मतों पर आधारित है, जबकि हर चुनाव में पांच से सात फीसदी ‘फ्लोटिंग वोट’ के असर से कभी एक के सिर पर हार का ठीकरा फूटता तो कभी दूसरे के ऊपर। इस पांच से सात फीसदी मत प्रतिशत की बुनियाद पर सत्ता विरोधी लहर तो चुनी जा सकती है, लेकिन अपनी बुनियाद कायम करने के लिए संगठन की मशीनरी तैयार करने की सबसे बड़ी चुनौती है। यह इसलिए भी कि हिमाचल की समग्र राजनीति के पीछे समाज की पृष्ठभूमि का चातुर्य वोटों के आंकड़ों की हर पांच साल बाद दुरुस्ती करता रहता है। दरअसल यह आंकड़ा स्वतंत्र व मौलिक रह कर व्यवहार करता है। दोनों प्रमुख पार्टियों के भीतर अंतर की गुंजाइश को समझते हुए अगर कोई सशक्त निर्दलीय घुस जाए, तो सारी हेकड़ी उतर सकती है। इसी से पार्टियों का भितरघात हर बार शह और मात का खेल खेलता है। हमारी पार्टी, हिमाचल पार्टी का राजनीतिक संदेश पुनः राज्य की परिक्रमा में गुंजाइश देख रहा है। चुनाव से दो वर्ष पूर्व ताल ठोंक कर राजन सुशांत ने केवल सियासी मुहिम को ही बल नहीं दिया, बल्कि मुख्य पार्टियों के विक्षुब्ध नेताओं के लिए कालीन भी बिछाया है। एक तरफ वह सरकार विरोधी लहरों को माप कर विपक्षी दल कांग्रेस की जगह घेर रहे हैं, तो दूसरी ओर सत्तारूढ़ दल के हाशियों में फंसे रूठे नेताओं को पुचकार रहे हैं। राजनीति में तीसरा विकल्प वास्तव में क्षेत्रीय असंतुलन को भी रेखांकित कर सकता है। सरकार के खिलाफ असंतोष,असंतुलन तथा राजनीतिक अस्पष्टता से उभरे आक्रोश को राजन बटोरना चाहेंगे ताकि गलियारों में शोर बढ़े, लेकिन उन्हें प्रशंसक नहीं समर्थक जुटाने होंगे।

उन्हें विरोध के मंच नहीं, संगठनातमक ताकत बटोरनी होगी। भाजपा की संगठनात्क ताकत के आगे अगर कांग्रेस का इतिहास व सामर्थ्य कमजोर दिखाई दे रहा है, तो हिमाचल से क्षेत्रीय पार्टी के उदय को साहसिक मार्ग बनाना पड़ेगा। इसके लिए साधनों-संसाधनों की जरूरत होगी। बेशक राजन के आक्रोश का इंजन कर्मचारियों की पुरानी पेंशन के समर्थन की लड़ाई हो सकता है, लेकिन सारे हिमाचल का एक यही विषय नहीं। हिमाचल में बढ़ती बेरोजगारी व घटते संसाधनों के बीच नए विजन का विकल्प देखा जाएगा। हिमाचल का मतदाता भले ही दिल्ली की तरह जागरूक व पारंगत है, लेकिन अरविंद केजरीवाल सरीखा नेता बनने के लिए सारे परिदृश्य को मुट्ठी में बंद करने की जिरह चाहिए। राजन सुशांत का अपना एक विस्तृत राजनीतिक अतीत व तेवर रहे हैं। वह संघ विचारधारा के नजदीक व अपनी ही सत्ता के विपरीत रहे हैं। इससे पूर्व भी वह आंदोलनकारी रुख की वजह से पहचाने गए, तो क्या वह हिमाचल के सामने राजनीतिक संघर्ष का कोई नया मैदान खड़ा कर पाएंगे। सियासत की उनकी भाषा जनता को कितनी पसंद आती है और वह किस तरह से एक ही तीर के दो निशानों पर भाजपा व कांग्रेस को नुकसान पहुंचाते हैं, इस पर काफी कुछ निर्भर करेगा। यह वक्त बताएगा कि सुशांत की पार्टी वोट काटू सिद्ध होती है या कहीं तीसरे मोर्चे का घूंघट हटता है।

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