Saturday, January 23, 2021 04:21 AM

स्वार्थ का अर्थ

स्वार्थ बड़ा प्यारा शब्द है, लेकिन गलत हाथों में पड़ गया है। स्वार्थ का अर्थ होता है आत्मार्थ। अपना सुख, स्व का अर्थ। तो मैं तो स्वार्थ शब्द में कोई बुराई नहीं देखता। मैं तो बिलकुल पक्ष में हूं। मैं तो कहता हूं, धर्म का अर्थ ही स्वार्थ है। क्योंकि धर्म का अर्थ स्वभाव है और एक बात का ख्याल रखना कि जिसने स्वार्थ साध लिया, उससे परार्थ सधता है। जिससे स्वार्थ ही न सधा, उससे परार्थ कैसे सधेगा। जो अपना न हुआ, वह किसी और का कैसे होगा। जो अपने को सुख न दे सका, वह किसको सुख दे सकेगा। इसके पहले कि तुम दूसरों को प्रेम करो, मैं तुम्हें कहता हूं, अपने को प्रेम करो। इसके पहले कि तुम दूसरों के जीवन में सुख की कोई हवा ला सको, कम से कम अपने जीवन में तो हवा ले आओ। इसके पहले कि दूसरे के अंधेरे जीवन में प्रकाश की किरण उतार सको, कम से कम अपने अंधेरे में तो प्रकाश को निमंत्रित करो। इसको स्वार्थ कहते हो। चलो स्वार्थ ही सही, शब्द से क्या फर्क पड़ता है, लेकिन यह स्वार्थ बिलकुल जरूरी है। यह दुनिया ज्यादा सुखी हो जाए, अगर लोग ठीक अर्थों में स्वार्थी हो जाएं।

 जिस आदमी ने अपना सुख नहीं जाना, वह जब दूसरे को सुख देने की कोशिश में लग जाता है तो इसके बड़े खतरे होते हैं। उसे पहले तो पता नहीं है कि सुख क्या है? वह जबरदस्ती दूसरे पर सुख थोपने लगता है, जिस सुख का उसे भी अनुभव नहीं हुआ। तो करेगा क्या? वही करेगा जो उसके जीवन में हुआ है। समझो कि तुम्हारे मां-बाप ने तुम्हें एक तरह की शिक्षा दी। तुम मुसलमान घर में पैदा हुए कि जैन घर में, तुम्हारे मां-बाप ने जल्दी से तुम्हें जैन, हिंदू या मुसलमान बना दिया। उन्होंने यह सोचा ही नहीं कि उनके जैन होने से उन्हें क्या सुख मिला है? नहीं, वे एकदम तुम्हें सुख देने में लग गए। तुम्हें जैन बना दिया, मुसलमान बना दिया। तुम्हारे मां-बाप ने तुम्हें धन की दौड़ में लगा दिया। उन्होंने एक बार भी यह नहीं सोचा कि उन्हें धन से सुख मिला है? उन्होंने जो किया था, वही तुम्हें सिखा दिया। उनकी भी मजबूरी है और कुछ सिखाएंगे भी क्या? जो हम सीखे होते हैं उसी की शिक्षा दे सकते हैं।

उन्होंने अपनी सारी बीमारियां तुम्हें सौंप दीं। तुम्हारी धरोहर बस इतनी ही है। उनके मां-बाप उन्हें सौंप गए थे बीमारियां, वे तुम्हें सौंप गए, तुम अपने बच्चों को सौंप जाओगे। कुछ स्वार्थ कर लो, कुछ सुख पा लो ताकि उतना तुम अपने बच्चों को दे सको। उतना तुम अपने पड़ोसियों को दे सको। यहां हर आदमी दूसरे को सुखी करने में लगा है और यहां कोई सुखी है नहीं। जो स्वाद तुम्हें नहीं मिला, उस स्वाद को तुम दूसरे को कैसे दे सकोगे? असंभव है। पहले हमें अपने अंदर के विकारों का नाश करना होगा, तभी हम दूसरों का भला कर सकते हैं। हमें अपने पुराने रूढि़वादी विचारों का त्याग करना चाहिए। सफलता की यह पहली सीढ़ी होगी।

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