Saturday, August 15, 2020 10:50 PM

टेढ़े मसले, टेढ़ी खीर नहीं

एक बड़ी जीत का एहसास पालमपुर का व्यापार मंडल कर सकता है, क्योंकि वहां के मुख्य बाजार से फिर वाहन गुजरेंगे और इस तरह प्रशासन की पहल को कूड़ेदान की टोकरी में डाल दिया गया। वाहनों की आवाजाही केवल पांच से आठ बजे तक बंद की थी, ताकि मालरोड का एहसास हो तथा लोगों की चहलकदमी को एक सुरक्षित मुकाम मिले। यह पहला प्रकरण नहीं है। इससे पहले हमीरपुर के मुख्य बाजार को वाहन प्रतिबंधित घोषित करवाने की मांग नागरिक कई बार हार गए। हिमाचल का समाज न तो अपने सही नायक चुन रहा है और न ही कानून। समाज का ध्रुवीकरण राजनीतिक अलंकार में अपनी भूमिका का सुधारवादी रुख भूल कर सियासत की चाकरी में केवल मांग पत्र बन चुका है,लिहाजा हर तरह का विकास केवल आंकड़ों का दस्तावेज बन रहा है। खासतौर पर शहरी विकास ने अपने लिए कब्रगाहें सजानी शुरू की हैं और इसमें ट्रैफिक का टेढ़ापन नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कमोेबेश हर छोटा-बड़ा शहरी कस्बा ट्र्रैफिक की दृष्टि से कंकाल बन चुका है,फिर भी कहीं नए प्रयास नहीं हो रहे। आश्चर्य तो यह कि बदलते बाजार को सुविधाजनक बनाने के लिए व्यापार मंडल भी असफल रहे हैं और इसके कारण दुकानें अब हाई-वे पर पहुंच गई हैं। धीरे-धीरे मुख्य या पौराणिक बाजार अपना अस्तित्व हार रहे हैं,जबकि यह नगर नियोजन की सबसे महत्त्वपूर्ण पहल होनी चाहिए। शहरी विकास में विभिन्न वर्गों का योगदान न के बराबर है और इस तरह विभागीय क्षमता भी केवल खानापूर्ति है। अमूमन जनप्रतिनिधि शहरी नियोजन को या तो अक्षम बनाने का काम कर रहे हैं या उनकी रुचि योजना के दायरे से आए लोगों को मुक्त करने की रही है। क्या हिमाचल प्रदेश को शिमला के माल जैसे वाहन वर्जित बाजार नहीं चाहिए। यह कार्य अगर योजना के तहत हो, तो शायद व्यापार मंडल भी सहयोग दें, लेकिन यदा कदा कोई प्र्रशासनिक अधिकारी या प्रबद्ध वर्ग ऐसे किसी प्रयास में शरीक होते भी हैं,तो यह नागवार गुजरता है। दरअसल प्रदेश के शहरी बाजारों को नई योजनाओं-परियोजनाओं से उन्नत बनाने की जरूरत है। शहरी योजनाओं को अगर इस लिहाज से देखा जाए, तो कहीं कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं हुआ। ऐसी परियोजनाएं बनानी होंगी ताकि व्यापार मंडल अपने भविष्य की कामना से सहयोग करें। प्राचीन बाजारों को पर्यटन की दृष्टि से इस काबिल बनाना होगा कि लोग इसे सैरगाह के रूप में भी इस्तेमाल कर सकें। विश्व पर्यटन के मानचित्र में बाजार को महज व्यापार केंद्र के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि इसे मनोरंजन, धरोहर व ऐतिहासिक मूल्यों के साथ जोड़ कर प्रचारित किया जाता है। कसौली में सैन्य हस्तक्षेप से बाजार का एक हिस्सा आज भी पर्यटकों के लिहाज से चलता है, तो पालमपुर में सेना की मौजूदगी के बावजूद क्यों पर्यटन सुविधाओं से दूर एक बाजार केवल व्यापारी मानसिकता से ही चलेगा। बेशक पालमपुर के मुख्य बाजार को वाहन वर्जित करना है, तो इसका शहरी विकास योजना में विशेष प्रावधान करना पड़ेगा और इसके अनुरूप निश्चित ढांचा, परिस्थिति व नागरिक व्यवहार तैयार करना पड़ेगा। यह शहरी यातायात से जुड़ा विषय होने के कारण पूरी रूपरेखा को बदलने की हिदायत भी देता है। यह विडंबना है कि हिमाचल में शहरी विकास के नए मायनों का हम कभी प्रशासन के माध्यम से हल ढूंढते हैं या पुलिस महकमा बिगड़ती व्यवस्था को नियंत्रण में रखने की भरपूर कोशिश करता है, जबकि यह नई सोच-समझ व नवाचार की चुनौती है और हर शहर को अपनी रीढ़ दुरुस्त करनी होगी। एक नीति के तहत हिमाचल को अपनी शहरी,पर्यटन व परिवहन को नए सिरे से खंगालना होगा ताकि जब लोग बाजार में घूमें, तो वाहन उनके कपड़े न फाड़ें। शहर की आबोहवा, नागरिक जरूरतों व मनोरंजन को बदलते परिप्रेक्ष्य में समझना होगा। आज हर शहर को खुले स्थानों, पार्कों, पार्किंग स्थलों के साथ-साथ सुविधाजनक बाजारों की जरूरत है। यह निजी क्षेत्र, पीपी मोड के अलावा शहरी नियोजन के नए पहलुओं की मांग है, जिसे तुरंत पूरा करना होगा, वरना भविष्य का रेखांकन दिखाई ही नहीं देता और न ही जनता किसी परिवर्तन में शरीक होने की मंशा कभी प्रकट करेगी।

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