Monday, October 18, 2021 04:28 PM

बूढ़ी सियासत के दांत

यह श्रेय पंडित सुखराम को जाता है कि वह उम्र के इस द्वार पर हारे नहीं हैं और अभी भी अपनी विरासत को सींचने की कोशिश में लगे हैं। कमोबेश हिमाचल की सियासत में बुजुर्गों के पालने अपने घर के चिरागों को ही हवाओं से बचाने में लगे रहे। शांता कुमार इस दृष्टि से भले ही भिन्न हैं, लेकिन अपनी मौजूदगी को वह भी नजरअंदाज नहीं होने देते। मसलन मंडी की सियासत का रुख सुकेती नदी के सूखने या ब्यास में बढ़ते प्रदूषण जैसा है। विडंबना यह है कि पंडित सुखराम की सियासत न तो ब्यास के घाट पर  और न ही सुकेती के पाट पर अपने कपड़े सुखा पा रही है। इसीलिए वह मंडी लोकसभा के उपचुनाव में पोते आश्रय शर्मा के भविष्य को सींचते हुए यह भूल रहे हैं कि उनसे आगे निकलकर अब मंडी से कोई मुख्यमंत्री बन चुका है या पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की विरासत में कांग्रेस का सूर्योदय हो सकता है। कभी अपने दोनों बाजुओं में मंडी की सियासत भरने वाले पंडित जी अब बेटे अनिल शर्मा को काले पानी की ‘सजा’ में सजा देखते हैं, तो दूसरी ओर पोते के माथे पर कांग्रेस की लकीरें पढ़ते हुए अधीर हो जाते है। परिवारवाद के कई अनसुलझे मुहावरे हम बूढ़ी सियासत के आंगन में बिखरे देख सकते हैं।

 यह दीगर है कि पंडित सुखराम का प्रतीकात्मक विरोध मंडी की सियासत को पंडित राजनीति की धुरी तक खींच सकता है और तब भाजपा को वीरभद्र सिंह की विरासत का सामना करने के लिए किसी पंडित चेहरे की खोज करनी पड़ेगी। मंडी संसदीय क्षेत्र से प्रतिभा सिंह के नाम का सिक्का उछालकर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कुलदीप राठौर ने जो फील्ड जमाई है, उसमें खलल डाले बिना सुखराम परिवार के वजूद की पतंग कटने से नहीं बचेगी। बहरहाल भाजपा को अगर प्रतिभा सिंह के महल से वीरभद्र सिंह की विरासत को तारपीडो करना है और पूर्व सांसद स्व. राम स्वरूप के स्मरण में कोई पंडित उम्मीदवार उभारना है, तो यह एक राजनीतिक संयोग है। ऐसे में मंडी विधानसभा से दो बार प्रस्तावित उम्मीदवार रहे एडवोकेट व समाजसेवी, प्रवीण शर्मा पर विचार करके भाजपा पंडित सुखराम की परंपरागत जमीन सरका सकती है, लेकिन यहां प्रश्न मुख्यमंत्री की निजी पसंद का कहीं अधिक रहेगा। सुखराम के सियासी इतिहास की सबसे बड़ी बेडि़यां अब पैदा हुई हैं, जहां वह सब कुछ पाकर भी अपनी ही सियासत का बंजरपन देख सकते हैं। कमोबेश हर बुजुर्ग नेता आज की राजनीति का शिकार है, लेकिन जिनके बच्चों को विरासत मिल गई वे आज भी प्रासंगिक हैं। हिमाचल में सियासी परिवारों की पीढि़यां बरकरार हैं और इसी के चलते आम कार्यकर्ता के लिए राजनीति सिर्फ एक अवसरवाद है।

 विरासत का जबरदस्त नजारा मौजूदा हाल में भी स्व. वीरभद्र सिंह व प्रेम कुमार धूमल के साथ नत्थी है। श्रीमती प्रतिभा सिंह के नाम मात्र से मंडी उपचुनाव में सांप लोटने लग पड़ते हैं, तो धूमल के व्यक्तित्व का स्पर्श ही प्रदेश के समीकरण बदलने लगता है। समीरपुर की राह पकड़ते नेताओं के साथ पुलकित संभावनाओं के दर्शन जुड़ जाते हैं, तो यही आशीर्वाद सांसद अनुराग ठाकुर को आगे बढ़ा देता है। बतौर काबीना अनुराग की जड़ें, धूमल के राजनीतिक संपर्कों का करिश्मा नहीं हंै, यह अस्वीकार्य सत्य है। हिमाचल की बूढ़ी सियासत का एक आलोच्य पक्ष पालमपुरवाद पैदा करता है और वर्षों से सियासी जड़ी-बूटियों की तलाश शांता कुमार की कुटिया में होती है। निश्चित रूप से वर्तमान मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने इस विरासत का सम्मान किया है और उन्होंने गाहे-बगाहे वयोवृद्ध नेता के प्रति आस्था ही नहीं, सत्ता का कर्ज भी उतारा है। हालांकि राजनीति के दांत यहीं उखड़ते रहे और चश्मे भी टूटते रहे हैं। पालमपुर भाजपा एक ऐसी कुटिया बन गई है, जो अपना ही श्राद्ध पढ़ती रही है। उदाहरण के लिए मुख्यमंत्री अपने विशेषाधिकार का शांता कुमार को माल्यार्पण करते हुए, उनके गृह नगर को नगर निगम का दर्जा  देते हैं, लेकिन बदले में भाजपा का श्राद्ध पढ़ते हुए वहां कांग्रेस जीत जाती है। इतना ही नहीं बूढ़ी सियासत के कारण कई ऊर्जावान चेहरे निराश हो जाते हैं या क्षेत्रीय, सामाजिक व राजनीतिक संतुलन भी गड़बड़ा जाता है। वर्तमान सरकार या इसके मुखिया के लिए यह भी एक परीक्षा है कि किस तरह हिमाचल की बूढ़ी सियासत के सामने अपनी निर्लिप्त छवि का प्रसार करें। यह इसलिए भी क्योंकि जयराम ठाकुर की राजनीति परिवारवाद से ऊपर दिखाई देती है।