Friday, September 24, 2021 09:08 AM

देश की रेलों की महिमा अपरंपार

भारतीय रेलों की महिमा अपरंपार है। इसे दुनिया की सबसे बड़ी रेल व्यवस्था कहा जाता है, क्योंकि इस देश की लंबाई-चौड़ाई का अंत कहीं नज़र नहीं आता। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हज़ारों किलोमीटर की यात्रा प्रतिदिन कांपते और कराहते भारतीय रेलें पूरी कर लेती हैं। इनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इन्हें दूर से देखो या नज़दीक से, ये हमेशा सवारियों से लदी-फदी नज़र आती हैं। जितने यात्री केबिन के अंदर, उससे अधिक छत पर और बाकी रेल डिब्बों के पायदान पर लटक कर रोज़ यात्रा पूरी करते हैं। इन सबको अवश्य यात्र शौर्य चक्र से नवाज़ा जाना चाहिए। आजकल युग बदलने के लिए इस देश में नित्य नई क्रांतियां घोषित करने का फैशन हो गया है। खेतीबाड़ी से हरित क्रांति घोषित करते हैं, तो देश की कृषि और भी मरणासन्न दशा की ओर चल निकलती है। औद्योगिक शहरों में न जाने कब से कल-कारखाने बंद हो रहे हैं। आजकल कारखानों की चिमनियां धुआं नहीं छोड़ती।

 पूंजी पलायन करने पर आमादा हैं, लेकिन इनके मजदूर बरसों फैक्टरी की बस्तियां छोड़ कर नहीं जाते। सरकार फैक्टरी मालिक को काम-धंधा बदलने की इजाज़त नहीं देती, मजदूर भला अपना डेरा-बिस्तर ऐसे ही सस्ते में समेट लें। उधर भारत की बढ़ी रेलों पर तेज़ी से आधुनिकता की कलई हो रही है। कोयले की भाप से छुक-छुक चलने वाली गाड़ी न जाने कब की बंद हो गई। डीज़ल इंजन आ गए। कहीं-कहीं बिजली इंजन भी चलने लगे। घोषणाओं का क्या है? घोषणाएं तो बुलेट और सैमी-बुलेट चलाने की भी हो रही हैं। राजधानी में लकदक मैट्रो रेलें भी चल रही हैं, लेकिन इन आधुनिक गाडि़यों के चलने का अंदाज़ वही ठेठ भारतीय है। दिल्ली-बम्बई तेजस गाड़ी चलाई तो पहले दिन ही विलंब से चली और दूसरी बार रास्ते में दो बार बिगड़ी। मैट्रो गाड़ी ठीक-ठाक चलने लगी तो उसे राजनीति का मर्ज़ हो गया है। चुनाव करीब आते देख कर इलाके के मुख्यमंत्री महोदय ने औरतों के लिए सफर मुफ्त कर दिया। भई आधी आबादी है, इनके वोट भी तो कम नहीं होते। यही आलम रहा तो लगता है कि आदमियों में बुर्के की मांग बढ़ जाएगी, वे भी अपनी पत्नियों के पहचान-पत्रों पर यात्रा करते मिल जाएंगे। अहा, महिला सशक्तिकरण। रोज नई से नई उड़ान भरती हैं ये हमारी रेलें।

 आज़ादी के पचहत्तर वर्ष होने को आए तो भी आप टिकट खरीदो तो कोई गारंटी नहीं कि आपको बैठने की सीट मिल जाएगी, बल्कि यह भी हो सकता है कि आजकल की ‘उड़ती गाडि़यों’ में आपको चढ़ाने आए साथी आपके सामान के साथ डिब्बे में चढ़ जाएं और आप भीड़ की धक्का-मुक्की की वजह से प्लेटफार्म पर ही छूट उन्हें बॉय-बॉय करते नज़र आएं। लीजिए रेल क्रांति के साथ-साथ इनके डीज़ल इंजनों का हुलिया भी कोयला इंजनों सा हो गया। सवारियों का मिज़ाज तनिक नहीं बदला। आज भी वे ब्रांच लाइन की गाडि़यों में अपनी भेड़-बकरियों के साथ सफर करती मिल जाती हैं। निजी अनुभव बताएं तो हमने कई बार भेड़-बकरियों को अपने बेटिकट मालिकों से बेहतर और सभ्य व्यवहार करते देखा है। कम से कम वे टीटी आने पर बाथरूम बंद करके तो नहीं बैठ जातीं। इन बरसों में गाडि़यों में सौदा सुल्फ बेचने वालों और ‘चाय गर्म पकौड़े खस्ता’ कहने वालों की भीड़ कम हो गई है। पैंट्री कार या रसोई वाहन बंद हो रहे हैं। हुक्म है, मोबाइल उठाइए और आते स्टेशन के तीन तारा या पांच तारा होटल, रेस्तरां को हुक्म कीजिए। जोमैटो और स्वीगी दल भागे आएंगे। खाना आपको गर्म और ताज़ा मिलेगा। जेब में दाम हो और हाथ में एपल का मोबाइल तो रेलों के इस नए युग का स्वागत करना कितना अच्छा लगता है, लेकिन हमारी जेब में तो टिकट नहीं, भला यह मोबाइल और भरा हुआ पर्स कहां होगा?

सुरेश सेठ

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