Friday, September 24, 2021 09:35 AM

मौत का ‘संवेदनहीन’ जवाब

इससे बड़ा झूठ और पाखंड क्या हो सकता है? कोरोना वायरस के चरम दौर में मौतों की हकीकत की अनदेखी और क्या हो सकती है? हम भी मानते हैं कि स्वास्थ्य राज्यों का विषय है। संविधान में ऐसी ही व्यवस्था की गई है, लेकिन यह पत्थर पर उकेरी कोई स्थायी लकीर थोड़ी है! यदि राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने कोरोना-काल में ऑक्सीजन की किल्लत से हुई मौतों का आंकड़ा भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय को नहीं भेजा, तो खुद केंद्र सरकार पहल करके ऐसी त्रासद सूचनाएं मंगवा सकती थी और उन्हें संकलित करके देश के सामने पेश कर सकती थी। क्या ऐसा करने में केंद्र सरकार की हैसियत कम हो जाती? या किसी लक्ष्मण-रेखा को पार करने का अपराध या पाप हो जाता? सच्चाई सिर्फ यही नहीं है। दरअसल भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने कोरोना-काल के दिशा-निर्देशों का 9 पन्नों का जो दस्तावेज तैयार किया था, उसमें कॉलम ही नहीं रखा गया कि ऑक्सीजन की कमी के कारण मौत हुई अथवा मौत की वजह कुछ और रही। अस्पतालों में कोविड के जो मरीज समय पर प्राण-वायु न मिलने के कारण मौत के शिकार हुए थे, उनके मृत्यु प्रमाण-पत्र में भी ऐसा विशेष उल्लेख नहीं किया गया।

 दिल की धड़कन बंद होने अथवा कई महत्त्वपूर्ण अंगों के निष्क्रिय होने से मौत हुई, सिर्फ  यह सीधा और सपाट कारण मौत के प्रमाण-पत्रों में लिखा जाता रहा है। फिर किसी भी मरीज के परिजन किस आधार पर मुआवजे का दावा पेश कर सकते हैं?  सर्वोच्च न्यायालय का आदेश, इन संदर्भों में, निष्प्रभावी होता लगता है! भारत सरकार तो कोरोना से मरने वालों को मुआवजा देने में, असमर्थता जताते हुए, इंकार कर चुकी है, लेकिन शीर्ष अदालत का कानूनी डंडा है कि इस मुद्दे पर विचार किया जा रहा है। अब केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री भारती प्रवीण पवार से संसद में लिखित जवाब दिलवाया गया है कि देश में ऑक्सीजन की किल्लत से एक भी मौत नहीं हुई। किसी भी राज्य और संघशासित प्रदेश ने ऑक्सीजन की कमी से मौत की अलग रपट नहीं दी है। अब यह मुद्दा भी राजनीतिक बन सकता है। चूंकि राज्यसभा में कांग्रेस के सांसद केसी वेणुगोपाल ने यह सवाल पूछा था। इस जवाब पर उनकी टिप्पणी थी कि मंत्री ने सदन को गुमराह किया है, लिहाजा सरकार के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव का नोटिस दिया जाएगा। यह भारत सरकार का संवेदनहीन जवाब भी है और संसद को हल्के में लेने का अहंकार भी है। कमोबेश अप्रैल, मई तो ऐसे महीने थे, जब भारत में कोविड चरम पर था और चारों तरफ हाहाकार मची थी। लोग त्राहिमाम कर रहे थे। अस्पतालों में जि़ंदगी सुरक्षित नहीं थी। राजधानी दिल्ली के ही बतरा अस्पताल, जयपुर गोल्डन और गंगाराम अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी के कारण मौतें हुई थीं। यह केंद्र सरकार भी जानती है और दिल्ली सरकार ने भी क्षमा मांगी थी और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में कवरेज हुई थी। लोग सड़कों पर और अस्पतालों के बाहर प्राण-वायु के लिए हांफ रहे थे।

 एक औरत ने अपने पति को मुंह से सांस देने की कोशिश की, लेकिन उसकी सांसें उखड़ गईं। जिस भी तरफ नजर जाती थी, ऑक्सीजन के खाली सिलेंडर लिए लोगों की भीड़नुमा कतारें दिखाई देती थीं। क्या भारत सरकार ‘धृतराष्ट्र’ बनी रही? क्या हमारी व्यवस्था इतने संवेदनहीन तरीके से काम करती है कि राज्यों ने अलग से आंकड़े नहीं भेजे, तो उसके मायने हैं कि ऑक्सीजन की किल्लत से कोई मरा ही नहीं? दिल्ली के अलावा, उप्र, उत्तराखंड, हरियाणा, मप्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और गोवा आदि राज्यों में ऐसी मौतों के आंकड़े सरकारों ने ही सार्वजनिक किए हैं। पांच राज्यों में ऐसी 195 मौतें दर्ज की गईं। ऑक्सीजन की कमी से कुल 512 मौतें बताई जा रही हैं। यह आंकड़ा इससे भी काफी ज्यादा हो सकता है, क्योंकि मौतों के अर्द्धसत्य अब भी सामने आ रहे हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री ने कमोबेश इतना तो स्वीकार किया कि दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की मांग 9000 एमटी प्रतिदिन तक बढ़ गई थी, जो पहली लहर में 3095 टन ही थी। इस मांग से भी समझा जा सकता था कि ऑक्सीजन का संकट था। अस्पतालों की सांसें भी अटकी रहती थीं, क्योंकि वे अपलक ऑक्सीजन के टैंकर की प्रतीक्षा करते थे। बहरहाल विपक्ष की ही नहीं, बल्कि भाजपा की अपनी राज्य सरकारों ने ऑक्सीजन की किल्लत और मौतों के सच भारत सरकार तक नहीं भेजे। क्या राजनीतिक छवि की चिंता थी? बहरहाल जो भी हुआ, बेहद संवेदनहीन लगा। तीसरी लहर में देखते हैं कि क्या कबूलनामे सामने आते हैं?