Tuesday, April 13, 2021 08:55 AM

संत रविदास की शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक

प्रेमचंद की एक कहानी है ‘कफन’! इसके दो पात्र घीसू और माधव निकम्मे और आलसी हैं। जब लड़के की पत्नी मर जाती है तो गांव वाले बाप-बेटे को कफन-दफन के लिए पैसा देते हैं जिसे ये दोनों शराब और खाने में उड़ा देते हैं। प्रेमचंद ने गरीबी की हकीकत बयान की थी, मगर कुछ लोग मानते हैं कि घीसू और माधव के व्यवहार के लिए व्यवस्था को ही जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। व्यवस्था के लगातार शोषण की वजह से इनसान का व्यवहार गैर-जि़म्मेदाराना हुआ। वह व्यवस्था जिसने सारी दुनिया को शोषक और शोषित के दो वर्गों में बांट रखा है। भारत में इस बंटवारे में जाति-व्यवस्था भी शामिल हो जाती है, जो कोढ़ में खाज का काम करती है। इसलिए घीसू और माधव को दोषमुक्त किया जाना चाहिए! संभव है इस बात में कुछ दम हो। मगर कहीं ऐसा तो नहीं कि हम अपना अपराध-बोध कम करने के लिए गरीबी को महिमामंडित करते हैं...

गरीबी फिर चर्चा में है। ऑक्सफॉम इंटरनेशनल की हालिया रिपोर्ट बताती है कि कोरोना के बाद दुनिया में गैर-बराबरी बढ़ गई है। अमीरों को कोरोना की वजह से जो नुकसान हुआ, उसकी भरपाई उन्होंने कर ली है, जबकि गरीबों को कोरोना से हुए नुकसान से उबरने में सालों लग जाएंगे। दुनिया में  कुल अमीरी बढ़ती जा रही है, पर गरीब और गरीब हो रहा है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) बढ़ता जाता है, मगर मानव विकास सूचकांक के मामले में दुनिया पिछड़ती जाती है। जीडीपी का बादल  दीवाना नहीं, सयाना है। वह कुछ खास छतों पर ही बरसता है और बाकी को प्यासा छोड़ देता है। क्या यह उस पूंजीवाद के विचार की असफलता है, जो मानता है कि अमीरी बढ़ाने से गरीबी घटती है। पूंजीवाद का ‘ट्रिकल डाउन’ मॉडल मानता है कि ऊपर पैसा बढ़ेगा तो वह रिस कर नीचे आएगा। इसे एक समय ‘हार्स स्पेरो’ मॉडल भी कहा जाता था। यानी यदि आप ‘घोड़ों’ को बहुत सारा दाना देंगे, तो थोड़ा-बहुत दाना चिडि़यों के लिए भी गिरेगा। मगर ऐसा नहीं हो रहा है। ‘घोड़े’ मोटे होते जा रहे हैं, चिडि़या दुबली की दुबली ही है। इसलिए गरीब आखिर क्यों गरीब है, इस पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है। गरीबी की वजह समझने के लिए हमारे पास धर्म से आया एक विचार था, जो बताता था कि गरीबी पिछले जन्म के पाप कर्मों का फल है। फिर मार्क्स और दूसरे विद्वानों ने हमें बताया कि गरीबी का संबंध पिछले जन्म के पाप से नहीं, बल्कि इसी जन्म के अमीरों से है, जो शोषण करने के लिए गरीब को गरीब बनाए रखना चाहते हैं।

ये दोनों विचार एक-दूसरे से ठीक उल्टे हैं, मगर इनमें एक समानता है। दोनों ही खुद गरीब को उसकी गरीबी के लिए जवाबदार नहीं मानते। ज़्यादातर विचारकों ने गरीबों को क्लीन चिट दी है, इसलिए अक्सर गरीबी को चरित्र का प्रमाणपत्र भी मान लिया जाता है। नोबेल पुरस्कार  विजेता अभिजीत बैनर्जी ने गरीबी की वजह ढूंढने के लिए कुछ प्रयोग किए। उन्होंने देखा गरीबी एक चक्रव्यूह है। पैसे की कमी की वजह से गरीब पोषणयुक्त आहार नहीं ले पाते, जिसकी वजह से उनका शारीरिक दमखम उतना नहीं होता कि वह अधिक पैसा कमा सकें। फिर इसी वजह से उन्हें कम पैसा मिलता है और गरीबी का चक्र चलता जाता है! यही बात खेती में भी लागू होती है। खाद खरीदने के लिए पैसा चाहिए। जब पैसा नहीं होता तो खाद के बगैर फसल नहीं होती। जब फसल नहीं होती तो फिर खाद खरीदने के लिए पैसे नहीं होते और फिर गरीबी का चक्र चलता जाता है। बैनर्जी ने इसे ‘पावर्टी  ट्रैप’ का नाम दिया। इस चक्र को तोड़ने के लिए उन्होंने एक प्रयोग किया। उन्होंने गरीबों को कुछ अतिरिक्त पैसा दिया ताकि वह अपने लिए प्रोटीनयुक्त आहार खरीद सकें और उनकी कुपोषण की समस्या दूर हो सके।

मगर नतीजे वैसे नहीं रहे, जैसे उन्होंने सोचे थे। ज्यादातर गरीबों ने पोषणयुक्त आहार खरीदने के बजाय उस रकम का इस्तेमाल चाट-पकौड़ी या स्वाद के लिए खर्च कर दिया। ऐसे ही जब खाद या किसी दूसरे व्यापार के लिए उन्हें रकम दी गई तो उस पैसे का इस्तेमाल गरीबों ने टीवी या मोबाइल खरीदने में किया। अभिजीत बनर्जी ने पाया कि लंबे समय तक गरीबी में रहने की वजह से वे मान लेते हैं कि उनका जीवन ऐसा ही चलेगा और वह बस अभी और इस वक्त अपने जीवन को मनोरंजक, मजेदार बना लेना चाहते हैं। पता नहीं उन्हें जीवन में दूसरा मौका मिले या न मिले। इस तरह ‘पॉवर्टी ट्रेप’ से निकलने के कई अवसर गंवा दिए जाते हैं। अभिजीत बनर्जी के निष्कर्षों को हम गरीबी को समझने के लिए पूर्व जन्म के पाप, अमीरों द्वारा शोषण के बाद तीसरे विचार के रूप में ले सकते हैं। ये निष्कर्ष महत्त्वपूर्ण इसलिए हैं क्योंकि गरीबी को हटाने के हमारे सारे प्रयास अब तक राजनीतिक और आर्थिक नीतियों के ही रहे हैं।  हमने समझ और संस्कार को ज्यादा महत्त्व नहीं दिया।

अभिजीत बनर्जी की मानें तो हमें गरीबी हटाने के लिए गरीबों को ‘सेल्फ कंट्रोल’ (आत्म-नियंत्रण) सिखाने की जरूरत है। तुरंत मजे के ‘टेम्पटेशन’ (लालच) पर किस तरह काबू पाएं, यह सिखाने की जरूरत है। तुरत-फुरत फायदे की बजाय दूरगामी फायदे को प्राथमिकता देने के लिए प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है। पर अगर हम बनर्जी महोदय की बातें मान लेते हैं, तो हमें मानना होगा कि गरीबों का स्वभाव ही गरीबी के लिए जिम्मेदार है। यानी क्या गरीबी एक चारित्रिक दुर्गुण है? यह एक नया विचार है जिस पर सब लोग सहमत नहीं हो सकते! प्रेमचंद की एक कहानी है ‘कफन’! इसके दो पात्र घीसू और माधव निकम्मे और आलसी हैं। जब लड़के की पत्नी मर जाती है तो गांव वाले बाप-बेटे को कफन-दफन के लिए पैसा देते हैं जिसे ये दोनों शराब और खाने में उड़ा देते हैं। प्रेमचंद ने गरीबी की हकीकत बयान की थी, मगर कुछ लोग मानते हैं कि घीसू और माधव के व्यवहार के लिए व्यवस्था को ही जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। व्यवस्था के लगातार शोषण की वजह से इनसान का व्यवहार गैर-जि़म्मेदाराना हुआ। वह व्यवस्था जिसने सारी दुनिया को शोषक और शोषित के दो वर्गों में बांट रखा है।

 भारत में इस बंटवारे में जाति-व्यवस्था भी शामिल हो जाती है, जो कोढ़ में खाज का काम करती है। इसलिए घीसू और माधव को दोषमुक्त किया जाना चाहिए! संभव है इस बात में कुछ दम हो। मगर कहीं ऐसा तो नहीं कि हम अपना अपराध-बोध कम करने के लिए गरीबी को महिमामंडित करते हैं। शायद हमें गरीबों के व्यवहार को ‘ऑबजेक्टिवली’ (वस्तुनिष्ठ) मानकर समझने की जरूरत है। हमें गरीबी हटाने में गरीबों की सहभागिता पर बात करने की भी जरूरत है। गरीबी को हटाने के हमारे राजनीतिक और आर्थिक उपाय यदि काम नहीं कर रहे हैं तो इस बहस में अब मनोविज्ञान और सांस्कृतिक पहलुओं को भी जोड़े जाने की आवश्यकता है। क्या गरीबी हटाओ अभियान में अब नेताओं, अर्थशास्त्रियों के अलावा मनोवैज्ञानिकों और सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवहार के विशेषज्ञों को भी शामिल किया जाना चाहिए? इस विषय पर सभी को विचार करना चाहिए।

मन सदैव सुगमता से प्राप्त होने वाली वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए लालायित रहता है, भक्ति का मार्ग कठिन होता है, इसलिए वह इससे दूर भागना चाहता है। माया के प्रभाव में पड़कर यह लुभावने दिखाई देने वाले विष तुल्य सांसारिक विषयों को सुख का साधन मान लेता है और उनकी ओर आकर्षित होता है...

सभी संत-महात्माओं का, चाहे वे किसी भी काल या देश में क्यों न आए हो, एक ही संदेश संसार के नाम होता है। सच्चे संत जाति, पंथ, संप्रदाय, रंग-रूप, देश और धर्म के बनावटी भेदों से सदैव ऊपर होते हैं। संतों का इस संसार में आने का उद्देश्य कोई नया धर्म या संप्रदाय स्थापित करना नहीं होता। वे तो आवागमन के चक्र में पड़े तथा परमात्मा से बिछुड़े जीवों को जन्म-मरण से छुटकारा दिलवाने का प्रयास करते हैं। संत रविदास, जिनकी 27 फरवरी को जयंती है, ने भी हमें इस बात को याद दिलवाने का प्रयास किया है कि यह मनुष्य जन्म हमें अनेक जन्मों के पुण्यों के उपरांत प्राप्त हुआ है तथा परमात्मा से मिलाप करना इस जीवन का मुख्य ध्येय होना चाहिए।

अतः इस मनुष्य जीवन को प्राप्त करने के बाद भी यदि हम सांसारिक दलदल में फंसे रह जाते हैं और परमात्मा की प्राप्ति की राह पर आगे नहीं बढ़ते तो यह जीवन व्यर्थ ही समाप्त हो जाएगा : ‘नैन उघरि न पोषियो, तुझ मानुष जन्म किह लेखा रे, पांउ पसार किमि सोई परयौ, तैं जनम अकारथ खोया रे।’ अर्थात हे मानव, तुम्हें अमूल्य मनुष्य जन्म मिला है, किंतु तुमने इसकी कीमत को नहीं जाना, तुमने इसके सही उद्देश्य को नहीं पहचाना। संत रविदास जी ने संसार के उन समस्त लोगों को चेताया है जो सांसारिक विषयों में पड़कर परमात्मा की प्राप्ति के अनमोल अवसर को खो देते हैं। ऐसे मनुष्य सच्चे हीरे को छोड़कर कौड़ी के लोभ के पीछे भागते रहते हैं : ‘हरि सा हीरा छाडि़ कै, करै आन की आस। ते नर जमपुर जांहिगे, सत भाषे रविदास।’ जिस परमात्मा की हमें खोज करनी चाहिए और जो हमारे जीवन का परम लक्ष्य होना चाहिए, वह समस्त संसार में एक ही है। परमात्मा जाति, संप्रदाय, रंग-रूप, देश और धर्म के भेदों से परे है, उसकी भक्ति का अधिकार सभी को है : ‘जन्म जात मत पूछिए, का जात अरू पात। रविदास पूत सभ प्रभ के कोउ नहिं जात कुजात।’ रविदास जी का मानना है कि हम सभी एक ही निराकार परमात्मा की संतान हैं।

इसी कारण सभी जन्म से एक समान हैं। जाति-पाति का भेदभाव मनुष्य द्वारा उत्पन्न किया गया है। हम सभी छोटे या बड़े अपने कर्मों के कारण ही बनते हैं, कोई जाति, परिवार, धर्म हमें छोटा-बड़ा बनाकर पैदा नहीं करता। ये तो अहंकारी छवि वाले मनुष्यों द्वारा जाति-पाति का भेदभाव उत्पन्न किया जाता है : ‘रविदास उपजइ सभ इक नूर तें, ब्राह्मन मुल्ला सेख। सभ को करता एक है, सभ कूं एक ही पेख।’ रविदास जी ने तत्कालीन ब्राह्मण समाज पर करारा प्रहार किया था जो अध्यात्म के नाम पर अपनी पूजा करवाने की बात करते थे तथा सामाजिक भेदभाव को उत्पन्न करने में जिनका बड़ा योगदान रहा था। उन्होंने गुणहीन ब्राह्मण की अपेक्षा गुणवान चांडाल को श्रेष्ठ माना है : ‘रविदास बाह्मन मति पूजिए जउ होवै गुनहिन। पूजिहिं चरन चंडाल के, जउ होवै गुन परवीन।’

संत रविदास जी ने परमात्मा की प्राप्ति के लिए मनुष्य जन्म को ही सर्वोपरि माना है जिसे मनुष्य चौरासी लाख योनियों के बाद प्राप्त करने में सफल हो पाता है। मनुष्य जीवन की सार्थकता सिद्ध करते हुए उन्होंने कहा है कि ईश्वर प्राप्ति तो केवल मात्र मनुष्य जन्म में ही संभव है और प्रत्येक मानव शरीर में बसी आत्मा परमात्मा को अपने अंदर ही प्राप्त कर सकती है। उसे प्राप्त करने के लिए जंगलों, पहाड़ों, तीर्थ स्थलों पर जाकर ही प्राप्त नहीं किया जा सकता, उसे प्राप्त करने के लिए बाहरी खोज व्यर्थ है। वह तो प्रत्येक छोटे-बड़े, निर्धन-धनी के अंदर समाया है। केवल मात्र आंतरिक ज्योति को जगाने की आवश्यकता है। संत रविदास जी ने बाह्यि पाखंडों का खंडन किया है। उनका मानना है कि भिन्न-भिन्न प्रकार के वस्त्र धारण करने, शरीर पर भभूत लगाने आदि से परमात्मा को धोखा नहीं दिया जा सकता और न ही उसे बाह्यि साधनों द्वारा प्रसन्न किया जा सकता है। जो लोग इस प्रकार के ढोंग में रत रहते हैं, वे अपने और परमात्मा के मध्य एक दीवार खड़ी कर देते हैं। वे स्वयं भ्रम का शिकार होते हैं और दूसरों को भी भ्रम में डालते हैं। ऐसे बाह्यि आडंबर करने से परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती : ‘माथै तिलक हाथ जप माला, जग ठगने कूं स्वांग बनाया। मारग छांडि कुमारग डहके, सांची प्रीत बिनु राम न पाया।’ संत रविदास जी ने नाम के महत्त्व को स्वीकार किया है। उनका मानना है कि नाम के द्वारा ही ईश्वर से हमारा मिलाप संभव हो पाता है।

हालांकि परमात्मा सर्वव्यापी है और वह हम सबके अंदर विराजमान रहता है, किंतु उस परमात्मा को प्राप्त करने में नाम ही सहायक होता है। संत रविदास जी ने परमात्मा की सच्ची भक्ति करने के लिए तथा परमात्मा के प्रति सच्चा प्रेम उत्पन्न करने के लिए संतों एवं उनके भक्तों की संगति को अनिवार्य माना है। हमारी आध्यात्मिक उन्नति साधु-संतों की संगति और उनके सत्संग पर निर्भर करती है। आध्यात्मिक उन्नति करने के लिए आत्मा का परमात्मा के प्रति प्रेम अनिवार्य माना गया है। संत रविदास जी ने इस बात को भी बहुत ही स्पष्टता से व्यक्त किया है, जब तक मनुष्य परमात्मा द्वारा बनाए गए जीवों का वध करते रहेंगे तथा उनका मांस खाते रहेंगे, तब तक हम परमात्मा को कभी भी प्राप्त नहीं कर सकते। मांसाहार से हम अपने कर्मों के बोझ को और अधिक बढ़ा देते हैं, जिस कारण से परमात्मा को प्राप्त करना हमारे लिए असंभव हो जाता है : ‘रविदास जीव कूं मारि कर, कैसो मिलहिं खुदाय। पीर पैगंबर औलिया, कोउ न कहइ समुझाय।’ संत रविदास जी ने मन को आध्यात्मिक उन्नति में सबसे बड़ा बाधक माना है। मन सदैव सुगमता से प्राप्त होने वाली वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए लालायित रहता है, भक्ति का मार्ग कठिन होता है, इसलिए वह इससे दूर भागना चाहता है।

माया के प्रभाव में पड़कर यह लुभावने दिखाई देने वाले विष तुल्य सांसारिक विषयों को सुख का साधन मान लेता है और उनकी ओर आकर्षित होता है। जब तक मन स्थिर नही होता, तब तक यह आध्यात्मिक उन्नति नहीं कर सकता। मन स्वाद का शौकीन है और वह निरंतर सांसारिक विषयों का पीछा करता रहता है। संत रविदास जी की शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक हैं। उनके द्वारा दी गई सीख को अपनाकर आज का नैतिक पतन की ओर जा रहा समाज, अपना हित कर सकता है। संत रविदास जी की जयंती पर हमें शपथ लेनी चाहिए कि हम उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग का अनुसरण करेंगे।