थियेटर फेस्टीवल पर ब्रेक: डा. चंद्र त्रिखा, वरिष्ठ साहित्यकार-पत्रकार

डा. चंद्र त्रिखा

वरिष्ठ साहित्यकार-पत्रकार

कश्मीर का परिवेश आत्मजीत के ज़ेहन पर गहरे तक सवार है। उसके भीतर इन दिनों अमित कुमार नाम का एक पात्र पूरी तरह पसरा हुआ है। अमित की परवरिश एक मुस्लिम परिवार ने की थी। वह भारतीय कश्मीर में परिवार का एकमात्र जीवित पात्र है। वह अब भी हर जुम्मे की शाम अपने उस बाप की कब्र पर चिरा़ग जलाने जाता है जिसने उसकी परवरिश की थी। उन्हीं दिनों वहां की सियायत का एक रसूखदार व्यक्ति कब्रगाह वाली जमीन को अपना ईंट भट्ठा लगाने के लिए पट्टे पर ले लेता है। अमित दुविधा में पड़ जाता है कि वह अपने मुस्लिम बाप की अस्थियां वहां से हटाकर कहां ले जाए। वह उन अंतिम निशानियों को कानूनी तौर पर पाक अधिकृत कश्मीर भी नहीं ले जा सकता और दूसरा कोई कब्रिस्तान उसे, इनके दफन की इजाजत नहीं देगा…

कोलकाता, जयपुर की सियासी रामलीला छोड़ दें तो अब यह लगभग तय है कि निकट भविष्य में थियेटर फेस्टीवल, रामलीलाएं या धार्मिक समागम नहीं हो पाएंगे। कोरोना के आतंक और पाबंदियों ने कला व कलम की दुनिया पर भी गहरा असर डाला है। कुछ शायरों ने अपने एहसासों को जुबान दे दी, लेकिन कुछेक गद्य-लेखक ऐसे हैं जो अपने समर्पित लेखन के लिए गहरे संकट का सामना कर रहे हैं। शायर भी ऑनलाइन मुशायरों से ही गुजारा कर पा रहे हैं। न वाह-वाह, न दाद, न मुकर्रर अथवा ‘इसे फिर से पढि़ए’ की फरमाईश। इनमें नाट्यकर्मी डा. आत्मजीत विशेष चर्चा में हैं। दूसरा जिक्र एक ऐसे गद्य लेखक प्रो. हरबंस सिंह का है जो अपने लेखन की एक-एक पंक्ति को प्रामाणिक आधार देने के लिए बेचैन रहता है। डा. आत्मजीत शायद एकमात्र ऐसा भारतीय लेखक है, जिसे दो-दो राष्ट्रीय सम्मान मिले हैं। उसे साहित्य अकादमी ने भी सम्मानित किया और केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी ने भी।

दोनों ही लेखक अपनी लेखनी को प्रामाणिक संवेदनाओं और तथ्यों की धार देने में यकीन रखते हैं। हरबंस सिंह इन दिनों जम्मू-कश्मीर पर अपनी तीसरी कृति को अंतिम रूप देने में लगे हैं। हरबंस सिंह अंग्रेजी में लिखते हैं, यद्यपि उनकी दो हिंदी कृतियां भी विशेष चर्चा का केंद्र बनी हैं। उनकी पहली कृति ‘खेल पत्रकारिता’ थी और शायद इस विषय पर हिंदी में यह एकमात्र कृति थी। दूसरी कृति ‘सूफी सत्ता और समाज’ थी जिसके लिए गहन अध्ययन व शोध के आधार पर इस संवेदनशील लेखक ने अपने मौलिक निष्कर्ष दिए थे। दोनों की समस्या यह है कि वे अपने विषय के पात्रों व परिवेश के बारे में मौलिक जानकारी का संकलन करने व उस परिवेश को निजी स्तर पर जीने की संवेदना कभी किसी से उधार नहीं लेते। वे दोनों ऐसे रिपोर्टर हैं जिन्होंने शायद कभी डेस्क-रिपोर्टिंग नहीं की। वे घटनास्थल से प्रामाणिक रिपोर्टिंग में आस्था रखते हैं और सतही ‘सपाट बयानबाजी’ से पूरा परहेज रखते हैं। आत्मजीत का संकट सिर्फ नाट्य-लेखन तक सीमित नहीं। वह नाटकों के मंचन को लेकर भी ज्यादा चिंतित हैं। इन दिनों वह कोविड-19 पर आधारित एक नाटक लिख रहे हैं, मगर इसकी मंच प्रस्तुति को लेकर वह अभी से फिक्रमंद हैं। ‘मुझे नहीं लगता कि निकट भविष्य में कहीं कोई थियेटर फेस्टीवल हो पाएगा। क्योंकि ऐसा कोई भी फेस्टीवल कलाकारों और दर्शकों दोनों के लिए कोविड-19 काल में खतरे की घंटियां बजा सकता है। वैसे भी सोशल डिस्टेंसिंग के दृष्टिगत कोई भी ऐसा दृश्य प्रस्तुत नहीं हो पाएगा जिसमें दो पात्रों को शारीरिक दृष्टि से एक-दूसरे के करीब दिखाना जरूरी हो। यदि इससे परहेज किया गया और कोई बीच का रास्ता निकालने का प्रयास हुआ तो निश्चित है कि लेखक अपने कथानक व अपने पात्रों और अपने दर्शकों से न्याय नहीं करेगा। वैसे भी आशंकाएं यह भी कुनमुनाने लगी हैं कि लोक संस्कृति, भंगड़ा, गिद्धा, रागनी या रामलीला-मंचन आदि का क्या होगा।

कोई नृत्य-प्रस्तुति निकट भविष्य में मंच पर प्रस्तुत हो पाएगी, ऐसा नहीं दिखता। डा. आत्मजीत इन्हीं दिनों एक बहुचर्चित पंजाबी शख्सियत डा. दीवान सिंह कालेपानी को अपने अगले नाटक का केंद्र बनाकर लिखने के लिए प्रयासरत हैं। डा. दीवान सिंह कालेपानी एक स्वाधीनता सेनानी भी थे, कवि भी थे और अंडेमान निकोबार द्वीप समूह पर सेवारत एक चिकित्सक भी थे। वहां पर एक गुरुद्वारे को जापानी सैनिकों के मनोरंजन के लिए प्रयोग में लाए जाने पर डटकर विरोध किया तो जापानियों ने उन्हें दंडित किया था। इस गुरुद्वारे का निर्माण भी उन्होंने सभी समुदायों की सांझी पहलकदमी से कराया था। डा. आत्मजीत अपनी ‘नाट्य स्क्रिप्ट’ को प्रामाणिक रूप में संवेदनशील बनाने के लिए स्वयं अंडेमान निकोबार जाना चाहते हैं, मगर कोविड-19 का आतंक मुझे वहां जाने नहीं देगा। इसी तरह मेरे ज़ेहन में सर गंगाराम का स्कैच भरा हुआ है। मैं उस शख्स द्वारा आधुनिक लाहौर की जिंदगी में लाए गए बदलावों को निजी रूप से देखने, परखने व जीने के लिए आकुल हूं। मगर वर्तमान हालात में यह कतई मुमकिन नहीं लगता।’ कश्मीर का परिवेश आत्मजीत के ज़ेहन पर गहरे तक सवार है। उसके भीतर इन दिनों अमित कुमार नाम का एक पात्र पूरी तरह पसरा हुआ है। अमित की परवरिश एक मुस्लिम परिवार ने की थी। वह भारतीय कश्मीर में परिवार का एकमात्र जीवित पात्र है। वह अब भी हर जुम्मे की शाम अपने उस बाप की कब्र पर चिरा़ग जलाने जाता है जिसने उसकी परवरिश की थी। उन्हीं दिनों वहां की सियायत का एक रसूखदार व्यक्ति कब्रगाह वाली जमीन को अपना ईंट भट्ठा लगाने के लिए पट्टे पर ले लेता है।

अमित दुविधा में पड़ जाता है कि वह अपने मुस्लिम बाप की अस्थियां वहां से हटाकर कहां ले जाए। वह उन अंतिम निशानियों को कानूनी तौर पर पाक अधिकृत कश्मीर भी नहीं ले जा सकता और दूसरा कोई कब्रिस्तान उसे, इनके दफन की इजाजत नहीं देगा। वह यह भी नहीं चाहता कि उन अंतिम निशानियों को जल प्रवाह कर दे क्योंकि उसके मुस्लिम मां-बाप पूरी जिंदगी उसकी हिंदू रीति-रिवाजों के मुताबिक परवरिश करते रहे थे। अब आत्मजीत की समस्या यह है कि वहां की स्थानीय परिस्थितियों से रूबरू हुए बिना वह इस कथानक को किस तरह से निभाए। उधर, प्रो. हरबंस सिंह ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘सूफी सत्ता और समाज’ के लिए श्रीनगर एवं कश्मीर की कमोबेश सभी सूफी दरगाहों, वहां के पुस्तकालयों व वहां की पुरानी किताबों वाली दुकानों को छाना। हर मुमकिन प्रामाणिक सामग्री एकत्र की और उस सामग्री को अपनी शोधपरक पुस्तक का आधार बनाया। पुस्तक का लोकार्पण जम्मू-कश्मीर के पूर्व सदर-ए-रियासत डा. कर्ण सिंह ने किया और उस पर विशेष वक्तव्य सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने पढ़ा। वह एक अद्भत कृति थी जिसे विद्वानों, समीक्षकों ने बेहद सराहा।  जम्मू-कश्मीर के परिवेश पर अब उनकी तीसरी कृति अंतिम पड़ाव पर है। अपनी कुछेक विशिष्ट उपलब्धियों के लिए चर्चा में बने रहे कवि माधव कौशिक इन दिनों सर्वाधिक परेशान हैं। माधव कौशिक पिछले पांच माह से घर में कैद हैं। बताते हैं कि राष्ट्रीय साहित्य अकादमी पंगु होने लगी है। कोरोना-प्रभाव में बजट में लगभग दो-तिहाई कटौती हो चुकी है। अभी निकट भविष्य में इस बात के कोई आसार भी नहीं हैं कि साहित्यिक हलचलें सामान्य पटरी पर लौट पाएं।

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