Saturday, January 23, 2021 05:27 PM

तिब्बत में छिपा है तंत्र ज्ञान

‘‘सवेरे मेरे साथ था।’’ ‘‘फिर कहां गया?’’ ‘‘राका के कुएं की तरफ चला गया था।’’ मां ने बड़ा तलाशा पर नर बहादुर का कहीं पता न चला। वह अपने पति के पास गई और बोली नरबहादुर खाना खाने अभी तक नहीं आया। जाने कहां चला गया। मैं उसे सब जगह खोज आई। ‘‘जाएगा कहां? होगा यहीं।’’ शेर बहादुर ने कहा। मां का मन न माना। दोपहर भी ढलने को आई पर नरबहादुर का कोई पता नहीं चला…

-गतांक से आगे…

सुबह का निकला नरबहादुर खाने न आया था। मां उसका इंतजार करते-करते थक गई। नरबहादुर खाना खाने के लिए इतनी देर कभी न करता था। उसे बुलाने की आवश्यकता कभी न पड़ती थी। जहां भी होता, स्वयं आ जाया करता था। यह अनहोनी बात थी। मां स्वयं उसकी तलाश में निकल गई। मार्ग में उसका साथी कृपाचरण दिखलाई पड़ा। मां ने पूछा — ‘‘नर बहादुर कहां है?’’ ‘‘सवेरे मेरे साथ था।’’ ‘‘फिर कहां गया?’’ ‘‘राका के कुएं की तरफ चला गया था।’’ मां ने बड़ा तलाशा पर नर बहादुर का कहीं पता न चला। वह अपने पति के पास गई और बोली नरबहादुर खाना खाने अभी तक नहीं आया। जाने कहां चला गया। मैं उसे सब जगह खोज आई। ‘‘जाएगा कहां? होगा यहीं।’’ शेर बहादुर ने कहा। मां का मन न माना। दोपहर भी ढलने को आई पर नरबहादुर का कोई पता नहीं चला। कई घरों से पूछताछ कर वह निराश घबराई सी घर वापस आ रही थी कि कृपाचरण हांफता हुआ आया। ‘‘नरबा…नरबहादुर… का पता लग गया।’’ उसका स्वर बेहद घबराया हुआ था। ‘‘कहां है वह?’’ ‘‘बसवारी के पास पड़ा है ’’ कृपाचरण ने कांपते हाथ से राका के कुएं की ओर इशारा कर दिया।

   ‘‘वहां क्या कर रहा है?’’ कृपाचार्य ने इसका कोई जवाब न दिया। वह अपने होंठ भींचकर हट गया। शायद उसने कुछ देखा था, उसे दिखाने का साहस उसमें न था। मां तेजी से उसी ओर लपक गई। कृपाचरण पथराया सा खड़ा रह गया। कुछ देर बाद ही नरबहादुर की मां की तेज चीखें दूर-दूर तक गूंज गई। लोग चीख सुनकर उधर दौड़ पड़े। क्या हुआ घबराए से खड़े कृपाचरण से उन्होंने पूछा। वो… नरबहादुर…। कृपाचारण ने बांसों की ओर इशारा कर दिया। सब वहां गए। वहां का दृश्य देखते पल भर के लिए अवाक रह गए। मुंह झाग से भरा हुआ था और पास खड़ी मां पीट-पीटकर रो रही थी। सारे गांव में हंगामा हो गया। स्त्री-पुरुष और बच्चों की भीड़ लग गई। नरबहादुर को सांप ने डस लिया था। वह मर गया था। शेर बहादुर ने सुना तो वह बेहोश हो गया।

(तिब्बत को तंत्र ज्ञान के लिए एक अनुकूल स्थान माना जाता है। जो लोग तंत्र में विश्वास रखते हैं तथा इस क्षेत्र में कुछ अनुसंधान करना चाहते हैं, वे तिब्बत की यात्रा बार-बार करते रहते हैं। हमारी इस सीरीज का लक्ष्य भी यही है कि पाठकों को वह सब कुछ बताया जाए, जो तिब्बत को तंत्र साधना के अनुकूल बनाता है। हम आने वाले दिनों में इस विषय पर पाठकों को रोचक जानकारियां देने की कोशिश करेंगे। आप केवल दिव्य हिमाचल की मैगजीन ‘आस्था’ से निरंतर जुड़े रहें। आपकी इच्छाओं को हम पूरी तरह समझते हैं।)

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