…तो मैं चमचा हूं

अशोक गौतम

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ऑफिस में सदा सुविधा की स्थिति में रहने वाले बंधु कई दिनों से पहली बार दुविधा की स्थिति में थे। औरों को कन्फ्यूज करने वाले खुद ही कंफ्युजियाए हुए थे। असल में उन्हें पता ही नहीं चल रहा था कि वे ऑफिस में साहब के हैं तो हैं, पर आखिर क्या हैं? इस कन्फ्यूज में कई बार उन्हें लगता कि वे साहब के भक्त हैं तो कई बार उन्हें लगता कि वे अपने आराध्य के भक्त नहीं, चमचे हैं। फिर अचानक कहीं से आवाज आती कि वे अपने प्रिय साहब के चमचे नहीं, भक्त हैं। अभी वे अपने को अपने साहब का भक्त घोषित करने को मुंह खोल ही रहे होते कि तभी कहीं से आवाज आती कि वे कुर्सी के भक्त नहीं, चमचे हैं। ऑफिस में अपनी उटपटांग हरकतों से औरों का दिमाग खराब करने वालों के पास इतना तो दिमाग था ही नहीं जो वे खुद तय कर पाते कि भक्त और चमचे में क्या अंतर होता है। जिसने लंबी अवधि तक दिन महीने साल इस उस साहब के चरणों में लोटते पोटते काटे हों, उसकी ऐसा भेद करने की शक्ति जवाब दे चुकी होती है।

उन जैसों के पास ले देकर तब बस एक ही शक्ति बची होती है। साहब की मालिश करने की शक्ति। इसके सिवाय उन्हें कुछ आता भी नहीं। आना भी नहीं चाहिए। अगर उन्हें कुछ और आ गया तो फिर साहब को मालिश करने का काम दूसरे शुरू कर देंगे। और साहब की मालिश जितनी फलदाई होती है उतना फलदाई दसों लोकों में दूसरा कोई भी कृत्य नहीं। परेशान हो उन्होंने एक दिन अपने साहब के चरणों में बैठ उनसे पूछ ही लिया, ‘साहब! पहली बार संकट में हूं। पता ही नहीं चल रहा कि…’ ‘संकट में और मेरा चमचा, मेरा भक्त!’ ‘हां साहब! आपकी तरह मुझे भी पता नहीं चल रहा कि मैं आपका भक्त हूं या आपका चमचा! कि भक्त और चमचा दोनों एक-दूसरे के पर्याय हैं या…’कह वे टुकुर टुकुर साहब का मुंह ताकने लगे तो साहब ने उन्हें सांत्वना देते पूछा, ‘आखिर ये फितूर तुम्हारे दिमाग में पड़ा कैसे?’ ‘साहब! बस, पड़ गया तो पड़ गया। अब यह फितूर शंका का समाधान मांगता है।’ साहब मौन! अब क्या करें, क्या कहें, …कि तभी साहब के ऑफिस में अलमारी के पीछे घुसेड़ी भगवान की तस्वीर से आवाज आई, ‘वत्स! तुम जिसे आज तक साहब भक्ति कहते रहे, भक्ति कह हर साहब को पूजते रहे, वह साहब भक्ति नहीं, साहब की चमचागीरी थी।‘ ‘कैसे?’ वे परेशान! बरसों की कमाई पर मिनट में पानी फिर गया।

‘जब भक्त अपने आदर्श पर अथाह श्रद्धा व्यक्त करता है तो उसे भक्ति कहते हैं। जबकि तुम जैसे चमचों की अपने साहब में कोई श्रद्धा नहीं होती। हर चमचे की तरह तुम्हारा भी तय एजेंडा रहा जिसके माध्यम से तुम अपने स्वार्थों को सिद्ध करते रहे, हर साहब को उल्लू बनाते हुए।’ ‘मतलब?’ वे साहब के पांव छोड़ भगवान की मूरत के चरणों में। ‘हां! हर साहब के प्रिय चमचे! भक्ति में ऑफिस की भलाई के लिए त्याग होता है तो चमचागीरी में कोई न कोई हिडेन लाभ वाला एजेंडा। बिन एजेंडे के चमचागीरी होती ही नहीं। तुम्हारे पास दिल हो तो अपने दिल से पूछो कि तुम जो भी आज तक करते रहे, क्या वह तय एजेंडे के तहत ही नहीं करते रहे? चमचागीरी में तुम्हारी तरह गिरता है। वैसे आज के दौर में जो चमचा नहीं, वह आदमी भी नहीं। या कि आदमी होने के लिए पहली शर्त ज्यों चमचागीरी हो’, कह प्रभु अंतरध्यान तो चमचेजी…

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