Sunday, May 09, 2021 07:07 PM

दो बूंद तेल...

अजय पाराशर

लेखक, धर्मशाला से हैं

दसियों बार तेल की कीमतें बढ़ने और दो बार दाम घटने के बाद जब तेल 10 पैसे सस्ता हुआ तो पंडित जॉन अली खुशी से फूले न समाए। महीनों से गैराज में बंद स्कूटर को उन्होंने धूप के दर्शन कराए। झाड़ने-पौंछने के बाद स्कूटर को स़फेद हाथी की तरह नहलाने में जुट गए। अंदर से उनकी श्रीमती चुटकी लेते हुए बोलीं, ‘‘शुक्र है! बेचारे को ताज़ी हवा नसीब हुई। नहीं तो यह नासपीटा भी विपक्ष की तरह अंदर धूल फांक रहा था। आपको कितनी बार कहा है कि इतर की छोटी शीशी में तेल की कुछ बूंदें भरवा कर रख लो। कभी-कभी सुंघा दिया करो, बेचारे की उम्र बढ़ जाएगी। मुझे देखो, जब से खाने के तेल कीमतें दुगनी हुई हैं, मैंने सरसों के तेल की चंद बूंदें बचा कर, इतर की शीशी में भर ली हैं। अगर अब खाने का तेल पांच सौ रुपए लीटर भी हो गया तो कम से कम इतर की शीशी में भरा तेल सुंघनी का काम तो देगा। सोचती हूं कि जब दो बूंद कोवैक्सीन से कोरोना ठीक हो सकता है तो दो बूंद पेट्रोल से स्कूटर क्यों नहीं चल सकता या दो बूंद सरसों के तेल से खाना क्यों नहीं बन सकता? चिंता मत करो, हम जल्द ही दो बूंद तेल उत्सव भी मना रहे होंगे।

 मुझे तो सदी के महानायक का गाया नटवर लाल िफल्म का गाना याद आ रहा है, जिसमें वह कहते हैं, ‘यह जीना भी कोई जीना है लल्लू।’ पता नहीं कब महानायक टीवी विज्ञापन पर चिपक जाएं और ‘दो बूंद ज़िंदगी की’ की तज़र् पर बोलना शुरू कर दें, ‘दो बूंद तेल की।’ अब चाहे इन्हें सूंघ लो या इस्तेमाल कर लो। कई बार सोचती हूं कि वाजा अब्बास अहमद ज़िंदा होते तो दो ‘बूंद पानी की’ तरह ‘दो बूंद तेल’ को भी िफल्म में ढाल देते।’’ पंडिताईन की मनकही सुनते ही पंडित जी की सारी खुशी ‘गरीबी हटाओ’ अभियान की तरह हवा हो गई। बुझे मन से स्कूटर धोते हुए एकालाप में कूद पड़े, ‘‘बड़े दिनों बाद छोटी सी ़खुशी हाथ लगी थी। श्रीमती ने वह भी छीन ली। ये औरतें सोचती ही नहीं कि कम से कम तेल सस्ता तो हुआ, भले ही दस पैसे क्यों न हुआ हो? वैसे सरकार और विपक्ष, परिवार से अलग कहां होते हैं? परिवार में मां-बाप, सरकार और बच्चे, विपक्ष की तरह होते हैं।

 बच्चे तब तक मां-बाप को कोसते रहते हैं, जब तक खुद मां-बाप नहीं बन जाते। वैसे ही जो दल विपक्ष में होता है, वह तब तक सरकार को कोसता रहता है, जब तक खुद चौपाया न हो जाए। काट-पीट कर पच्चीस हज़ार रुपए हाथ में आते हैं। उसमें चाहे घर का खर्च चला लो, बच्चों की फीस जमा करा लो या स्कूटर में तेल डला लो। पर भला हो सरकार का। पैदल चलने से कम से कम शूगर तो कम हुई।’’ उनका एकालाप बीवी के टोकने पर टूटा, ‘‘अरे! बस भी करो। कितना रगड़ोगे पंद्रह साल पुराने स्कूटर को?’’ पंडित जी पैदल स्कूटर ठेलते हुए पेट्रोल पंप तक पहुंचने में उसी तरह सफल रहे, जैसे नैतिकताविहीन नेता निर्वाचित होकर सदन में पहुंच जाता है। वहां खड़ा लड़का पंडित जी को देखते ही चिल्लाया, ‘‘पंडित जी, नमस्कार! कहां थे, साल भर से।’’ पंडित जी अपनी खुशी छिपाते हुए बोले, ‘‘अमां यार! तेल तो डाल दो सौ रुपए का। सुना है सस्ता हो गया कुछ, चुनावों के चलते।’’ लड़का स्कूटर में तेल डालते हुए बोला, ‘‘लो पंडित जी, 10 पैसे में दो बूंद एक्स्ट्रा चली गई हैं टैंक में।’’ घर वापस आते हुए पंडित जी सोच रहे थे जो दो बूंद तेल एक्सट्रा डला है, उसमें वह कहां-कहां और कहां तक जा सकते हैं।