Sunday, January 17, 2021 09:00 AM

अनलॉक के बंद ताले

हिमाचल मंत्रिमंडल के फैसलों में चिंता का सबब बनकर चार जिलों में नाइट कर्फ्यू का लगना बता रहा है कि अनलॉक से लॉकडाउन के बीच अब फिर से अंतर घट रहा है। कहीं आधा दिन तो कहीं आधी रात या गिलास आधा भरा या आधा खाली वाली स्थिति में हम सकारात्मक दृष्टि रख सकते हैं, लेकिन तेजी से हॉट-स्पॉट बनते हिमाचल के लिए ताजा घटनाक्रम किसी नए जोखिम से कम नहीं। ऐसे में हिमाचल सरकार ने अनलॉक हुए कई ताले फिर से बंद करने का रास्ता बताया है। सबसे अहम किरदार में शैक्षणिक संस्थाओं को 31 दिसंबर तक छात्रों के लिए बंद रखते हुए ऑनलाइन पढ़ाई का माध्यम बरकरार रखा है। ऐसे में अब जरूरी यह होगा कि ऑनलाइन शिक्षा की प्रक्रिया में सरकार विद्युत आपूर्ति तथा इंटरनेट सेवाओं के आधार को सौ फीसदी दुरुस्त रखने का जरिया बने। मास्क न पहनने पर हजार रुपए का जुर्माना फिर से जनता को ताकीद कर रहा है, जबकि बसों में पचास फीसदी यात्रियों की अनुमति से यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि सामाजिक दूरी न घटे। कुल मिलाकर मंत्रिमंडल के फैसलों से मास्क, सामाजिक दूरी तथा भीड़ पर नियंत्रण की नई मुहिम शुरू हो रही है।

 शादियों में जश्न की शुमारी पर पाबंदियों के साथ जुर्माने की सख्त हिदायत अगर कारगर होगी, तो सरकारी कार्यालयों में भी तृतीय व चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी संख्या को भी आधी करके काम लिया जाएगा। राजनीतिक तौर पर भी जनसभाओं तथा सरकार के जनमंच जैसे कार्यक्रमों पर रोक का लबादा ओढ़ाया जा रहा है। इन तमाम पाबंदियों के विषयों में चेतावनियां नत्थी हैं और यह भी कि कोविड की लौटती लहरों में घातक उन्माद छिपा है। भले ही प्रथम चरण में कांगड़ा, मंडी, कुल्लू और शिमला जिलों में नाइट कर्फ्यू लग रहा है, लेकिन इसका असर प्रदेश स्तरीय रहेगा। आबादी के हिसाब से भी आधे से अधिक लोग नाइट कर्फ्यू की जद में आ गए हैं, तो इसका प्रत्यक्ष व परोक्ष प्रभाव आर्थिकी पर पड़ेगा। नाइट कर्फ्यू से पर्यटन, होटल व परिवहन व्यवसायों पर सीधे असर को रोका नहीं जा सकता। ऐसी घोषणा से धीमे चल रहे रेस्तरां, मॉल या थियेटर अब कितनी खामोशी ओढ़ लेते हैं, यह एक अलग किस्सा बनेगा। जाहिर है शादियों के मुहूर्त पर रात्रि कर्फ्यू का साया भयभीत करेगा, जबकि तमाम प्रक्रियाओं में बढ़ते दबाव से पुनः जिंदगी के विराम परेशान करेंगे। दूसरी ओर ये तमाम फैसले मानवीय लापरवाही के खिलाफ हैं ताकि लोग फिलहाल यह न भूलें कि जिंदगी की राहें सामान्य नहीं हुई हैं। विडंबना यह भी रही कि अनलॉक होते माहौल में सबसे पहले सियासी घूंघट ही निरंकुश हुए और सत्ता की चमक भी सार्वजनिक मंचों पर अठखेलियां करते दिखाई दी। इस बीच जनमंच जैसी प्रथाओं में सरकार ने खुद ही वर्जनाओं की नकाब हटाई, तो आम लोग भी जश्न की बारात में हिदायतें भूल गए। महामारी के बीच आर्थिकी को संबल देने के लिए ही अनलॉक के दरवाजे खुलते गए, लेकिन त्योहारी, सामाजिक, सांस्कृतिक, व्यापारिक, राजनीतिक व आर्थिक हसरतों ने फिर खतरे मोल ले लिए।

एक ओर स्कूल खोलने तक पहुंचा हमारा काफिला अब सरकार की फाइल को भी शक की निगाह से देख रहा है। ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग, फेस कवर व सेनेटाइजेशन की ताजा मुहिम को बरकरार रखने की कसौटी पर पुनः आर्थिकी के कितने खंभे गिरेंगे, यह आहत भरी खबर है। क्या नाइट बसों के पहिए रुक जाएंगे या हिम्मत दिखा रहे पर्यटक बढ़ती चौकसी के बीच हिमाचल आ पाएंगे, एक बड़ा प्रश्न है। जोश में झूमते सियासी कुनबे या राष्ट्रीय अध्यक्ष के जलसे में शरीक सत्तारूढ़ दल क्या खुद पर अंकुश लगा पाएंगे। स्थानीय निकायों के चुनावों को मिली हरी झंडी, विधानसभा के शीतकालीन सत्र को आहूत करती घोषणा से अब मुकरने की बारी आ गई है या कोरोना के खिलाफ जाहिर किए गए इरादों की रोशनी में कुछ आवश्यक विराम देकर हिमाचल सरकार नई पहरेदारी को ही अहमियत देगी, यह सभी को व्यक्तिगत आचरण में महसूस करना होगा।

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