Sunday, July 25, 2021 09:15 AM

अदृश्य खौफ के बंजारे

चरित्र हनन की बिसात पर हर बार जब शोशा बिखरता है, तो हिमाचल को यह मालूम हो जाता है कि चुनाव की परिक्रमा में कहीं राजनीतिक अभिलाषा घूम रही है। यही सब बखिया उधेड़ने की फिराक में जयराम सरकार के एक मंत्री के पीछे पड़ा, तो कहीं कोई सकते में नहीं आया, लेकिन सवाल तो बनता है। इसलिए जब पूछा गया, तो मुख्यमंत्री ने मामले के पीछे छिपे भौंडेपन को ललकारते हुए जांच की भट्ठी पर चढ़ाने का ऐलान किया है। इससे यह स्पष्ट हो गया कि इस दुष्प्रचार की फिलहाल कहीं कोई खुजली नहीं और न ही सरकार अपने दामन पर बेवजह शक कर सकती है। हालांकि इससे साफ हो गया कि हिमाचली राजनीति की बदनाम गलियां अपने नजारों को बरकरार रखते हुए, एक बार फिर किसी सरकार को सिफर बनाने का प्रयत्न कर रही हैं। धुंध के बीच आहट चाहे अपने ही कदमों की हो, सफर पर संदेह करना चाहिए। यह इसलिए कि जहां घुप अंधेरे हों, वहां आवाज को माप कर असावधानी से बचा जा सकता है। इसलिए पत्र भले ही गुमनाम हो, लेकिन धुंध में काले साये की तरह मौजूद रहेगा।

 आज की स्थिति में सोशल मीडिया खुद सबसे बड़ा विरोध है, तो इस तरह की चिट्ठियां किन अंगारों पर तपी होंगी। बहरहाल राजनीतिक चरित्रहनन की परंपराओं से क्या कांग्रेस और क्या भाजपा, दोनों ही पार्टियों की सत्ता के दौर गुजरते रहे हैं। कौन नहीं जानता कि अदृश्य खौफ के बंजारे कभी वीडियो रिकार्डिंग, तो कभी गंदे लिफाफों में महिला आचरण को भरते हुए समय-समय के मुख्यमंत्रियों को डसते रहे। पत्र बम कभी छुप के आए, तो कभी इश्तिहार बन कर आए, लेकिन इस मुराद का टीकाकरण हमेशा मीडिया ने ही किया। इस मामले में पहली बार उछलती चिट्ठी को मीडिया के सीधे शब्द नहीं मिले और न ही यह मुद्दा सड़क तक पहुंचा। बेशक यह खत अभी खाक नहीं हुआ और न ही मजमून शांत हुआ है, लेकिन पत्रकारिता के डेस्क पर डाक बन कर पड़ा यह बम पटाखा भी साबित नहीं हुआ। पहली बार कोई सरकार या मुख्यमंत्री इस तरह के प्रहार में, मीडिया के सामने सीधे उत्तर दे रहा है तो यह संदेश भी काफी है। यह इसलिए भी कि राजनीति में मीडिया के बोल अमूमन माप-तोल करने लगे हैं या किस्तों में बंधी मेहनत का एहतिमाम भी होने लगा है। इसी सरकार में सबसे पहले भी पत्र चल चुके हैं और उनकी चपेट में आकर कुछ नेता चुक चुके हैं, लेकिन यहां मांझी खुद आगे आकर भंवर में फंसे एक मंत्री को बचा रहा है, तो इससे कवायद व रिवायत बदल सकती है।

 आश्चर्य यह कि मीडिया में अब खोज खबर के लिए सोशल मीडिया की निरंकुश सत्ता में झांकना पड़ता है, जबकि यह कहा जा सकता है कि वहां न दायित्व बोध है और न ही नैतिकता का कोई मानदंड। यहां सवाल पत्र बमों का नहीं और न ही चरित्र हनन का, फिर भी यह तो सामने आ रहा है कि भाजपा के दालान में अपने ही पर्दे झांक रहे हैं। यह सुगबुगाहट किसी विपक्ष की नहीं, बल्कि दरक रहीं सत्ता की दरी है, जिस पर बैठ कर हर कोई लाभार्थी बनना चाहता है। विडंबना यह है कि पिछले दशकों से सत्ता के भीतर के शह मात ने इस प्रदेश को इसकी वास्तविक मंजिल दिखाई तक नहीं, जबकि वहां तक पहुंचना तो काबिलीयत का प्रश्न है। दुर्भाग्य भी यही है कि जिनके कारण हिमाचल प्रतिष्ठित हुआ या हो रहा है, उनके बजाय वे पूजे जाते हैं जो किसी न किसी तरह सत्ता तक पहुंचे। आश्चर्य यह है कि हिमाचली खेतों के तमाम फूल जिनकी गर्दनों को सहलाते हैं, क्या उस मेहनत का यही श्रम है या हम उन लोगों को कभी सम्मान देंगे जो इसके वास्तविक हकदार हैं। बदलती कार्य संस्कृति या नैतिकता के नए पैमानों में जब स्पष्ट प्रमाण भी कोई हैसियत नहीं रखते, तो किसी गुमनाम पत्र की क्या औकात। अलबत्ता अब तो विरोध के हर्फ मिटाने के लिए नेताओं का कौशल और प्रभाव इतना दबंग हो चुका है कि किसी नियम की चुगली पर भी पीडि़त नागरिक को ही सजा दे सकती है। देश हो या प्रदेश, सत्ता के मंच पर कई नाटक देखने को मिलेंगे, लेकिन जनता का संवाद गूंगा होकर परिस्थितियों का मौन अवलोकन करता रहेगा। न सीधा आंदोलन और न ही सही विरोध।