Tuesday, June 15, 2021 11:24 AM

उपेंद्रनाथ अश्क का हिंदी साहित्य को योगदान

जयंती विशेष

उपेंद्रनाथ ‘अश्क’ उपन्यासकार, निबंधकार, लेखक व कहानीकार थे। अश्क जी ने आदर्शोन्मुख, कल्पनाप्रधान अथवा कोरी रोमानी रचनाएं की। उनका जन्म पंजाब प्रांत के जालंधर नगर में 14 दिसंबर 1910 को एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार में हुआ था। अश्क जी छह भाइयों में दूसरे थे। उनके पिता पंडित माधोराम स्टेशन मास्टर थे। जालंधर से मैट्रिक और फिर वहीं से डीएवी कालेज से उन्होंने 1931 में बीए की परीक्षा पास की। बचपन से ही अश्क अध्यापक बनने, लेखक और संपादक बनने, वक्ता और वकील बनने, अभिनेता और डायरेक्टर बनने और थियेटर अथवा फिल्म में जाने के अनेक सपने देखा करते थे। हिंदी-उर्दू के प्रेमचंदोत्तर कथा साहित्य के विशिष्ट कथाकार उपेंद्रनाथ अश्क की पहचान बहुविधावादी रचनाकार होने के बावजूद, कथाकार के रूप में ही है। राष्ट्रीय आंदोलन के बेहद उथल-पुथल से भरे दौर में उनका रचनात्मक विकास हुआ। जलियांवाला बाग जैसी नृशंस घटनाओं का उनके बाल मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ा था।

उनका गंभीर और व्यवस्थित लेखन प्रगतिशील आंदोलन के दौर में शुरू हुआ। उसकी आधारभूत मान्यताओं का समर्थन करने के बावजूद उन्होंने अपने को उस आंदोलन से बांधकर नहीं रखा। यद्यपि जीवन से उनके सघन जुड़ाव और परिवर्तनकामी मूल्य-चेतना के प्रति झुकाव, उस आंदोलन की ही देन थी। साहित्य में व्यक्तिवादी-कलावादी रुझानों से बचकर जीवन की समझ का शऊर और सलीका उन्होंने इसी आंदोलन से अर्जित किया था। भाषा एवं शैलीगत प्रयोग की विराट परिणति उनकी इसी सावधानी की परिणति थी। उनकी कहानियां मानवीय नियति के प्रश्नों, जीवनगत विडंबनाओं व मध्यवर्गीय मनुष्य के दैनंदिन जीवन की गुत्थियों के चित्रण के कारण याद की जाती हैं। बीए पास करते ही उपेंद्रनाथ अश्क जी अपने ही स्कूल में अध्यापक हो गए। पर 1933 में उसे छोड़ दिया और जीविकोपार्जन हेतु साप्ताहिक पत्र ‘भूचाल’ का संपादन किया और एक अन्य साप्ताहिक ‘गुरु घंटाल’ के लिए प्रति सप्ताह एक रुपए में एक कहानी लिखकर दी। 1934 में अचानक सब छोड़ लॉ कॉलेज में प्रवेश ले लिया और 1936 में लॉ पास किया। उसी वर्ष लंबी बीमारी और प्रथम पत्नी के देहांत के बाद उनके जीवन में एक अपूर्व मोड़ आया। 1936 के बाद अश्क के लेखक व्यक्तित्व का अति उर्वर युग प्रारंभ हुआ।

1941 में अश्क जी ने दूसरा विवाह किया। उसी वर्ष ऑल इंडिया रेडियो में नौकरी की। 1945 के दिसंबर में बंबई के फिल्म जगत के निमंत्रण को स्वीकार कर वहां फिल्मों में लेखन का कार्य करने लगे। 1947-1948 में अश्क जी निरंतर अस्वस्थ रहे। पर यह उनके साहित्यिक सर्जन की उर्वरता का स्वर्ण-समय था। 1948 से 1953 तक अश्क जी दम्पत्ति (पत्नी कौशल्या अश्क) के जीवन में संघर्ष के वर्ष रहे। पर इन्हीं दिनों अश्क यक्ष्मा के चंगुल से बचकर इलाहाबाद आए। उन्होंने नीलाभ प्रकाशन गृह की व्यवस्था की जिससे उनके संपूर्ण साहित्यिक व्यक्तित्व को रचना और प्रकाशन दोनों दृष्टि से सहज पथ मिला। उर्दू के सफल लेखक उपेंद्रनाथ अश्क ने मुंशी प्रेमचंद की सलाह पर हिंदी में लिखना आरंभ किया। 1933 में प्रकाशित उनके दूसरे कहानी संग्रह ‘औरत की फितरत’ की भूमिका मुंशी प्रेमचंद ने ही लिखी थी। अश्क ने इससे पहले भी बहुत कुछ लिखा था। 1936 के बाद अश्क जी की कृतियों में सुख-दुःखमय जीवन के व्यक्तिगत अनुभव से अद्भुत रंग भर गया। उन्हें कई साहित्यिक पुरस्कार भी मिले। उर्दू के बाद हिंदी साहित्य को अपनी रचनाएं सौंपने के बाद 19 जनवरी 1996 को उनका देहांत हो गया। आज वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन अपने साहित्य में वह आज भी जिंदा हैं।

सरलता और सादगी

अश्क जी ने सरलता और सादगी से भरपूर जीवन जीया। उनकी सादगी से जुड़ा एक किस्सा है, जब वह 1990 के आसपास धर्मशाला आए। हिमाचल के साहित्यकार डा. प्रत्यूष गुलेरी ने उनसे आग्रह किया कि वह उनके घर पर आएं। अश्क जी ने वादा किया कि वह उनके घर जरूर आएंगे। इस वादे के करीब एक हफ्ते बाद अश्क जी गुलेरी जी के घर पर हांफते-हांफते पहुंच गए। यहां तक पहुंचने के लिए उन्हें जो चढ़ाई मापनी पड़ी, उसके कारण उनकी सांस फूल रही थी। गुलेरी जी ने कहा कि आपने पैदल ही क्यों कष्ट किया? आपने मुझे फोन कर दिया होता तो मैं आपको लेने स्कूटर पर आ गया होता। इसके प्रत्युत्तर में अश्क जी ने कहा कि जब भी मैं अपने दोस्तों के घर जाता हूं, तो इसी तरह पैदल जाता हूं, इसलिए आप मेरे हांफने की चिंता मत करें। वास्तव में गुलेरी जी अश्क जी की सादगी देखकर बहुत प्रभावित हुए। अपने धर्मशाला प्रवास के दौरान अश्क जी ने कई रचनाओं का सृजन भी किया।

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