Monday, November 30, 2020 04:24 AM

वजूद से लड़ती परंपरागत कुश्ती: प्रताप सिंह पटियाल, लेखक बिलासपुर से हैं

प्रताप सिंह पटियाल

लेखक बिलासपुर से हैं

हालांकि अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग’ परंपरागत कुश्ती को नई पहचान देने का प्रयास कर रही है, लेकिन देश में कुछ समय से आम लोगों से लेकर सियासत तक क्रिकेट के ग्लैमर का खुमार हावी हो चुका है जिसके आगे हमारी खेल संस्कृति का हिस्सा रहे कुश्ती, हॉकी, वॉलीबाल व एथलेटिक्स आदि खेल दम तोड़ने पर आमादा हैं। 135 करोड़ की आबादी वाला भारत मात्र दस या बारह देशों में खेले जाने वाले क्रिकेट के इर्द-गिर्द ही घूम रहा है…

यदि प्राचीन भारत के परंपरागत खेलों का जिक्र किया जाए तो सबसे लोकप्रिय खेल कुश्ती का नाम ही सबसे पहले आएगा। परंपरागत कुश्ती यानी ‘छिंज’ को देश के कई राज्यों में एक पर्व के तौर पर माना जाता है। भारतीय पौराणिक ग्रंथों में बलराम, जरासंध तथा कर्ण जैसे योद्धाओं के मल्लयुद्धों का उल्लेख मिलता है। हिमाचल प्रदेश में बिलासपुर रियासत काल से परंपरागत कुश्ती का गढ़ रहा है। बिलासपुर की धरा में परंपरागत कुश्ती के कई रूसतम हुए जिन्होंने देश के कई नामी पहलवानों को मिट्टी के अखाड़ों में चित करके अपने खेल हुनर का लोहा मनवाकर जिला व राज्य को भी गौरवान्वित किया। घुमारवीं में दशकों से आयोजित होने वाला मशहूर ‘चैहड़’ दंगल देश की सबसे बड़ी परंपरागत कुश्ती प्रतियोगिताओं में शुमार करता है जिसमें देश के कई अंतरराष्ट्रीय पहलवान अपना जौहर दिखाते हैं। मगर इस वर्ष शातिर मुल्क चीन से निकले कोरोना वायरस ने खेल जगत को भी अपनी जद में ले लिया जिसमें सबसे ज्यादा नुकसान परंपरागत कुश्ती करने वाले पहलवानों को हुआ। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मैट पर आयोजित होने वाली कुश्ती को ही मान्यता प्राप्त है, मगर मिट्टी में आयोजित दंगल लड़ने वाले पहलवानों का भविष्य वहां मिलने वाली सीमित धनराशि या खिताबी जीत तथा दंगल में मौजूद दर्शकों द्वारा दिए जाने वाले इनाम पर निर्भर करता है। प्रदेश के कई पहलवान पड़ोसी राज्यों में होने वाले छिंज व मेलों में हिस्सा लेकर अपने प्रदर्शन से राज्य का मान बढ़ाते हैं, मगर अफसोसजनक कि कुछ दिन पहले समाचार पत्रों में बेरोजगारी की मार झेल रहे प्रदेश के कुछ पहलवानों के नाम सामने आए जो परंपरागत कुश्ती के साथ राष्ट्रीय स्तर पर हिमाचल का प्रतिनिधित्व भी कर चुके हैं।

 गौर रहे पहलवान चाहे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करे या मिट्टी के अखाड़ों में जोर-आजमाइश करके हमारी प्राचीन धरोहर परंपरागत कुश्ती के वजूद को बचाने की जद्दोजहद में लगे हों, उनका तहेदिल से सम्मान होना चाहिए। स्मरण रहे यदि आज भारतीय पहलवान कुश्ती में वैश्विक स्तर पर मैडल जीत रहे हैं तो उसके पीछे माटी के अखाड़ों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। देश को भारतीय शैली की कुश्ती से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्टाइल की कुश्ती तक कई अंतरराष्ट्रीय पहलवान देने वाले भारतीय कुश्ती का आधार स्तम्भ रहे गुरु हनुमान (पद्मश्री) ने सर्वप्रथम पहलवानों को रोजगार देने के लिए सरकारों का ध्यान आकर्षित किया था, मगर कुश्ती के प्रति हमारे खेल मंत्रालयों व खेल संघों की बेरुखी का ही नतीजा है कि खशावा जाधव ने 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में कुश्ती में आजाद भारत का पहला व्यक्तिगत पदक (ब्रांज मैडल) जीतकर अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारतीय कुश्ती की बुनियाद रखी थी। मगर उसके बाद ओलंपिक में कुश्ती का अगला पदक सुशील कुमार ने 2008 के बीजिंग ओलंपिक में जीत कर कुश्ती को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खोया हुआ रुतबा वापस दिलाया। कैप्टन उदय चंद कुश्ती के प्रथम अर्जुन अवार्डी पहलवान भारतीय कुश्ती का एक बड़ा नाम रहा है। उदय चंद ने 1961 में योकोहामा (जापान) में आयोजित ‘वर्ल्ड’ रेसलिंग चैंपियनशिप में ब्रांज मैडल जीता था जो कुश्ती की विश्व चैंपियनशिप में देश के लिए पहला पदक था। उदय चंद ने तीन ओलंपिक में भी भाग लिया था, मगर 1970 के एडिनबर्ग (स्कॉटलैंड) राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर देश का परचम फहराया था। लीला राम (पद्मश्री) ने 1958 के ‘कार्डिफ’ राष्ट्रमडंल खेलों में हैवीवेट में स्वर्ण पदक जीता था। कैप्टन चांदरूप (द्रोणाचार्य अवार्ड) का भारतीय कुश्ती के लिए अहम योगदान रहा है। इन तीनों दिग्गज पहलवानों का संबंध भारतीय सेना की ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट से रहा है और इन ओलंपियन पहलवानों की बुनियादी तालीम माटी के अखाड़ों में ही हुई थी।

 इसलिए ये परंपरागत कुश्ती में भी पारंगत थे। रविंद्र खत्री (जाट रेजिमेंट) 2016 ओलंपिक में भाग ले चुके हैं तथा सूबेदार दीपक पुनियां टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालिफाई कर चुके हैं। देश का प्रतिनिधित्व करने वाले हरियाणा के ज्यादातर खिलाडि़यों को भारतीय सेना ने मंच प्रदान किया है। लिखने का भावार्थ है कि खेल क्षेत्र में उभरती प्रतिभाओं के भविष्य के लिए भारतीय सेना बेहतर विकल्प है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग’ परंपरागत कुश्ती को नई पहचान देने का प्रयास कर रही है, लेकिन देश में कुछ समय से आम लोगों से लेकर सियासत तक क्रिकेट के ग्लैमर का खुमार हावी हो चुका है जिसके आगे हमारी खेल संस्कृति का हिस्सा रहे कुश्ती, हॉकी, वॉलीबाल व एथलेटिक्स आदि खेल दम तोड़ने पर आमादा हैं। 135 करोड़ की आबादी वाला भारत मात्र दस या बारह देशों में खेले जाने वाले क्रिकेट के इर्द-गिर्द ही घूम रहा है। देश में आईपीएल के जरिए विदेशी खिलाडि़यों पर करोड़ों रुपए बहाए जाते हैं, लेकिन यदि इसी आईपीएल की तर्ज पर परंपरागत कुश्ती के आयोजन करके हमारे गांव व देहात के पहलवानों को अवसर प्रदान किए जाएं तो भारतीय कुश्ती अंतरराष्ट्रीय पटल पर एक नया मुकाम हासिल करेगी तथा पहलवानों की वित्तीय स्थिति भी सुधरेगी। इसके लिए कुश्ती संघों पर विराजमान सरवराह तथा देश के खेल मंत्रालय को पहल करनी होगी। बहरहाल जो पहलवान राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, उनमें विश्व के खेल मानचित्र पर देश का तिरंगा फहराने की पूरी कुव्वत है, बशर्ते सरकारें पहलवानों को रोजगार देकर उनका आर्थिक पक्ष मजबूत करे।

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