Saturday, September 26, 2020 12:47 PM

वेदांत प्रचार का कार्य

स्वामी विवेकानंद

गतांक से आगे…

वे भी स्वामी जी से मिलने के लिए उनके पास आए। वेदांत प्रचार का कार्य सुचारू रूप से चल रहा था, यह जानकर स्वामी जी बेहद खुश हुए। अभेदानंद जी न्यूयार्क लौट गए। 14 अक्तूबर को वेदांत समीति के नए भवन का उद्घाटन हुआ।  इसके बाद एक सप्ताह बाद ही अभेदानंद जी ने वहां पर रोजाना शिक्षण और उपदेश का कार्यक्रम शुरू कर दिया। 5 नवंबर को लिगोट दंपति के साथ स्वामी जी तुरियानंद जी व भगिनी निवेदिता जी के साथ मिलकर कार्य करने लगे। स्वामी तुरियानंद जी अपने कार्य की वजह से जल्दी ही लोकप्रिय हो गए।

10 दिसंबर को कैंब्रिज कान्फ्रेंस की व्यवस्था के अनुसार उन्होंने शंकराचार्य के संबंध में एक लेख पढ़ा। इस गहन पांडित्यपूर्ण लेख का विद्वान मंडली ने खूब जोर-शोर से स्वागत किया। हजारों  अमरीका के लोग जो उनकी पुस्तक पढ़कर स्वामी जी की और आकर्षित हुए थे, उनके   न्यूयार्क में होने की खबर सुनकर उनके दर्शनों के लिए न्यूयार्क आने लगे। स्वामी जी बड़ी खुशी के साथ उनके साथ बातचीत करते थे और अन्य शहरों में लोगों के निमंत्रण पाकर स्वामी जी ने कई स्थानों का भ्रमण किया।  इसके बाद सुदूर कैलिफोर्निया की यात्रा की। रास्ते में भक्तों के कहने पर उन्हें शिकागो उतरना पड़ा। यहां कुछ दिन रहने के बाद कैलिफोर्निया चले गए। यहां की जलवायु उनके स्वास्थ्य के अनुकूल थी। काफी आराम करने के बाद भी उन्हें चैन नहीं मिला। इन्हीं दिनों एक धर्म सभा का आयोजन भी किया गया। सैकड़ों धर्म प्रचारक इस सभा में आए।

 स्वामी विवेकानंद भी इस सभा में आए। उनके भाषण को सुनकर सभी लोग मुग्ध हो गए थे। सानफ्रांसिस्को में उनका विख्यात भाषण सार्वजनिक धर्म का आदर्श तथा कृष्ण, बुद्ध, ईसा और मुहम्मद आदि महापुरुषों के संबंध में धारावाहिक व्याख्यान हुए। इसके अलावा राजयोग पर भी उनका भाषण हुआ। इस समय में उनके भाषणों को लेखनीबद्ध नहीं किया जा सका। कैलिफोर्निया में प्रचार कार्य की देखरेख के लिए स्वामी जी ने स्वामी तुरियानंद जी को बुलवा लिया। कैलिफोर्निया की एक भक्त शिष्या कुमारी भिन्नसी बुक ने मठ की स्थापना के लिए 160 एकड़ के लगभग एक भूमिखंड दान में दिया। बाद में स्वामी जी तुरियानंद जी की कोशिशों से वहां एक आश्रम की व्यवस्था हुई। मई के महीने में स्वामी जी के पास लंदन से मिमेट दंपति का एक पत्र आया। उन्होंने जुलाई के महीने में अपने पेरिस जाने की बात लिखी थी और स्वामी जी को साथ चलने को कहा था, पेरिस में हो रही प्रदर्शनी की धर्मोतिहास सभा की विदेशी प्रतिनिधियों की स्वागत समीति की तरफ से स्वामी जी को शामिल करने का निमंत्रण प्राप्त हो चुका था।

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