Tuesday, August 11, 2020 12:25 AM

‘विस्तारवादी’ की घेराबंदी

प्रधानमंत्री मोदी के लेह दौरे पर रक्षा विशेषज्ञों का विश्लेषण है कि कुछ बड़ा होने वाला है। वह बड़ा क्या होगा, इसका निर्णय प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख ही करेंगे। बड़े का अर्थ यह भी है कि क्या तनाव युद्ध की नौबत तक पहुंच गया है? हम अब भी आश्वस्त हैं कि भारत और चीन युद्ध की विभीषिका तक नहीं जाएंगे। सैन्य और राजनयिक स्तर पर लगातार बातचीत जारी है। बेशक सहमतियों को चीन लगातार नकारता भी रहा है, लेकिन उसे यह भी एहसास होगा कि दक्षिण चीन सागर, हिंद महासागर, प्रशांत महासागर में उसे किस तरह घेर लिया गया है। अमरीका और जापान के युद्धपोत सक्रिय हो चुके हैं। वे युद्धाभ्यास भी कर रहे हैं। अमरीका और जापान के अलावा फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और ऑस्टे्रलिया सरीखे देशों ने भारत का खुलेआम समर्थन किया है। बेशक रूस और चीन का ‘भाईचारा’ विख्यात है, लेकिन रूस और भारत का ‘दोस्ताना’ भी वक्त की कसौटी पर खरा उतरता रहा है। इतनी शक्तियों की घेरेबंदी का जोखिम चीन नहीं उठाना चाहेगा। इधर लेह के सरहदी इलाकों में भारत के 45,000 से ज्यादा सैनिक तैनात हो चुके हैं। चीनी सेना भी दस्ते बढ़ा रही है। तोपखाने, टैंक, मिसाइल और लड़ाकू विमान भी युद्ध की स्थितियां बनाए रखे हैं। ऐसे माहौल में प्रधानमंत्री मोदी का अचानक लेह जाना भी बड़ा रणनीतिक फैसला है। कमोबेश उन्हें जमीनी हकीकत की जानकारी मिल गई होगी कि आखिर दोनों ओर तनाव और टकराव किस स्तर पर हैं? चीन के साथ बातचीत किन तेवरों के साथ और किस हद तक करनी है? और अंततः सरकार को फैसला क्या करना है? करीब 11,000 फुट की ऊंचाई वाले क्षेत्र नीमू में सैनिकों और जनरलों, कमांडरों के बीच प्रधानमंत्री की मौजूदगी और उन्हें संबोधन के चित्र चीन और पाकिस्तान समेत सभी प्रमुख देशों ने भी देखे होंगे! प्रधानमंत्री के प्रवास का सबसे अहम रणनीतिक संदेश यही था कि भारतीय सेना मजबूती से अड़ी और खड़ी है। वह किसी भी हालत में झुकने को तैयार नहीं है। चीन की गलतफहमी है कि कोरोना भारत और उसकी सेनाओं के मनोबल को तोड़ सकता है। प्रधानमंत्री ने सेना के बड़े अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि चीन का डर निकालना है। अब सख्ती से काम करना है और पूरी ताकत के साथ ‘दुश्मन’ से निपटना है। बेशक सार्वजनिक तौर पर प्रधानमंत्री ने अभी तक चीन का नाम नहीं लिया। उसे ‘विस्तारवादी’ करार दिया है। युद्ध के माहौल में ‘बांसुरीधारी’ और ‘सुदर्शन चक्रधारी’ को भारतीयों के पूज्य और आदर्श मानते हुए प्रधानमंत्री ने गहरे मायनों के संकेत दिए। एक सवाल बार-बार उभरता है कि आखिर हमारा नेतृत्व चीन से कब तक उपमाओं में बात करेगा? क्या हमारे पास सामरिक और कूटनीति की भाषा नहीं है? लेकिन ‘विस्तारवादी’ कहने पर चीन की ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ वाली स्थिति उजागर हो गई, क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन के थोड़ी देर बाद ही चीन के विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया आ गई। सफाई दी गई कि चीन ‘विस्तारवादी’ नहीं है। उसने 14 में से 12 देशों के साथ अपने सीमा विवाद सुलझाए हैं। एक बड़ा अर्द्धसत्य…! दोनों देशा में से किसी को भी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए, जिससे हालात और भी ज्यादा बिगड़ें। बहरहाल प्रधानमंत्री के कुछ घंटों के दौरे से ही सैनिकों की भुजाएं फड़फड़ाने लगी होंगी। मनोबल सुदृढ़ होकर मां भारती की रक्षा के लिए शिद्दत से तैयार होने लगा होगा! प्रधानमंत्री ने अस्पताल जाकर घायल और इलाज करवा रहे सैनिकों से मुलाकात भी की। उनके शौर्य और साहस को ‘पराक्रम की पराकाष्ठा’ करार दिया। जब प्रधानमंत्री ने उन सैनिकों की पीठ थपथपाई, उनके हाथ छुए और तसल्ली दी कि समूचा देश उनके साथ खड़ा है, तो यकीनन वे पल ऐतिहासिक होंगे। पहले भी हमारे प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी और अटलबिहारी वाजपेयी अग्रिम मोर्चों पर जाकर सैनिकों का हौसला बढ़ाते रहे हैं। प्रशासनिक भाषा में प्रधानमंत्री सेनाओं के ‘सेनानायक’ ही होते हैं। युद्ध जैसे माहौल में ऐसे दौरों से सैनिकों की रगों में बिजली कौंधने लगती है, लिहाजा प्रधानमंत्री का जाना बेहद सकारात्मक रहा, लेकिन अब स्पष्ट होना चाहिए कि चीन से हमारे समीकरण क्या रहेंगे? उसे आर्थिक झटके तो दिए जा रहे हैं, लेकिन ये अस्थायी और तात्कालिक नहीं होने चाहिए। चीन के खिलाफ  इस समय वैश्विक लामबंदी बनती दिख रही है। भारत को उसका फायदा लेना चाहिए। चीन की जो घेराबंदी की जा रही है, उसके भी ठोस निष्कर्ष आने चाहिए।

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